लोकतंत्र के माथे पर कलंक बन गया जैसलमेर का यह घटनाक्रम
दिलीप कुमार पुरोहित. जैसलमेर
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जैसलमेर में नगर परिषद, पुलिस प्रशासन और जिला प्रशासन के रवैये ने लोकतंत्र, मानवाधिकार और प्रशासनिक संवेदनशीलता पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं। एक परिवार के शौचालय को कथित रूप से अवैध बताकर तोड़ने पहुंची नगर परिषद की टीम ने जिस प्रकार का व्यवहार किया, उसने पूरे घटनाक्रम को प्रशासनिक कार्रवाई कम और शक्ति प्रदर्शन अधिक बना दिया।
सबसे गंभीर और शर्मनाक पहलू यह रहा कि पीड़ित परिवार लगातार गुहार लगाता रहा कि उन्हें समय दिया जाए, दस्तावेज देखने का अवसर दिया जाए और मानवीय आधार पर सुनवाई की जाए, मगर नगर परिषद की टीम और पुलिस ने संवेदनशीलता दिखाने के बजाय कठोरता, धौंस और दबाव का रास्ता अपनाया। परिवार की महिलाएं रोती-बिलखती रहीं, बुजुर्गों ने हाथ जोड़कर विनती की, लेकिन प्रशासनिक अमले का दिल नहीं पसीजा।
राइजिंग भास्कर इस पूरे मामले को लोकतंत्र के माथे पर काला धब्बा मानता है और इस घटनाक्रम के लिए जिला प्रशासन को सीधे तौर पर जिम्मेदार ठहराता है।
बिना नोटिस कार्रवाई के आरोप, पड़ोसी की छत से पहुंची टीम
पीड़ित परिवार का आरोप है कि उन्हें किसी प्रकार का वैधानिक नोटिस नहीं दिया गया। इसके बावजूद नगर परिषद की टीम भारी पुलिस जाब्ते के साथ मौके पर पहुंच गई। बताया जाता है कि घर पर ताला लगा होने के कारण टीम पड़ोसी की छत के रास्ते पीड़ित परिवार की छत पर पहुंची और कार्रवाई शुरू कर दी।
यह सवाल अब पूरे शहर में चर्चा का विषय बन गया है कि क्या किसी भी प्रशासनिक संस्था को कानून और प्रक्रिया को ताक पर रखकर इस प्रकार किसी के घर में प्रवेश करने का अधिकार है? यदि निर्माण अवैध था तो क्या नोटिस, सुनवाई और वैधानिक प्रक्रिया का पालन नहीं किया जाना चाहिए था?
घंटों तक घटनास्थल पर हंगामा चलता रहा। स्थानीय लोग तमाशबीन बने रहे, लेकिन प्रशासनिक मशीनरी किसी भी कीमत पर कार्रवाई रोकने को तैयार नहीं दिखी।
बीमार और बुजुर्गों से धक्कामुक्की के आरोप
सबसे पीड़ादायक पहलू यह बताया जा रहा है कि मौके पर मौजूद पुलिसकर्मियों ने बीमार और वरिष्ठ नागरिकों तक को नहीं बख्शा। परिवार के लोगों का आरोप है कि महिलाओं के साथ अभद्र व्यवहार किया गया और बुजुर्गों से धक्कामुक्की की गई।
यदि ये आरोप सही हैं तो यह केवल प्रशासनिक असंवेदनशीलता नहीं बल्कि मानव गरिमा पर सीधा हमला है। लोकतंत्र में पुलिस और प्रशासन का काम सुरक्षा और न्याय देना होता है, भय और अपमान पैदा करना नहीं।
लोकतंत्र की हत्या : राइजिंग भास्कर के तीखे सवाल
क्या प्रशासन केवल कमजोरों पर ही चलता है?
- क्या बिना नोटिस कार्रवाई करना उचित है?
- क्या पड़ोसी की छत से घर में प्रवेश करना कानूनसम्मत था?
- क्या महिलाओं और बुजुर्गों के साथ अभद्रता प्रशासनिक अधिकार है?
- क्या जैसलमेर में केवल कमजोर परिवार ही निशाने पर हैं?
- क्या बड़े अवैध निर्माणों पर कार्रवाई करने का साहस प्रशासन में नहीं है?
सैकड़ों अवैध निर्माणों पर चुप्पी, एक परिवार पर शक्ति प्रदर्शन!
जैसलमेर में वर्षों से अवैध निर्माणों की चर्चा होती रही है। शहर में कई बहुमंजिला और प्रभावशाली लोगों के निर्माणों को लेकर सवाल उठते रहे हैं। लेकिन उन पर कार्रवाई करने में नगर परिषद की कथित निष्क्रियता हमेशा चर्चा में रही है।
ऐसे में एक सामान्य परिवार के शौचालय को तोड़ने के लिए पूरा प्रशासनिक अमला सक्रिय हो जाना कई सवाल खड़े करता है। क्या प्रशासन केवल उन लोगों पर सख्ती दिखाता है जिनकी राजनीतिक या आर्थिक पहुंच नहीं होती?यह मामला अब केवल एक शौचालय का नहीं रहा, बल्कि प्रशासनिक निष्पक्षता और सत्ता के दुरुपयोग का प्रतीक बन गया है।
कलेक्टर अनुपमा जोरवाल की भूमिका पर उठे गंभीर प्रश्न
पूरे घटनाक्रम में सबसे अधिक सवाल अनुपमा जोरवाल की भूमिका को लेकर उठ रहे हैं। जिले की सर्वोच्च प्रशासनिक अधिकारी होने के नाते यह उनकी जिम्मेदारी थी कि कार्रवाई कानूनसम्मत, संवेदनशील और मानवीय तरीके से हो। लेकिन जिस प्रकार घटनाक्रम सामने आया, उससे यह धारणा बनी कि जिला प्रशासन ने या तो स्थिति को गंभीरता से नहीं लिया या फिर मौन सहमति दी। दोनों ही स्थितियां चिंताजनक हैं।
राइजिंग भास्कर का मानना है कि यदि किसी जिले में प्रशासनिक कार्रवाई अमानवीयता और दमन का प्रतीक बनने लगे तो उसकी नैतिक जिम्मेदारी जिला कलेक्टर की भी बनती है।
कौन लेगा एक्शन? : राइजिंग भास्कर की मांगें
तत्काल प्रभाव से ये कदम उठाए जाएं
- जैसलमेर कलेक्टर अनुपमा जोरवाल को तत्काल निलंबित किया जाए।
- कार्रवाई में शामिल नगर परिषद अधिकारियों को सस्पेंड किया जाए।
- महिलाओं और बुजुर्गों से अभद्रता करने वाले पुलिसकर्मियों पर विभागीय कार्रवाई हो।
- पूरे मामले की न्यायिक जांच कराई जाए।
- पीड़ित परिवार को सुरक्षा और न्याय दिया जाए।
भाजपा शासन पर भी उठे सवाल
सीएम भजनलाल शर्मा लगातार कानून के राज की बात करते हैं, लेकिन जैसलमेर की यह घटना प्रशासनिक तानाशाही और कथित गुंडाराज की तस्वीर पेश कर रही है। शहर में चर्चा यह भी है कि तीन बार विधायक बने छोटू सिंह भाटी इस पूरे मामले में जनता के प्रतिनिधि की भूमिका निभाने में विफल रहे। लोगों का कहना है कि जब एक परिवार प्रशासनिक उत्पीड़न का आरोप लगा रहा था, तब जनप्रतिनिधियों को आगे आकर संवेदनशीलता दिखानी चाहिए थी।
लोकतंत्र में कानून प्रक्रिया से चलता है, ताकत से नहीं
यह संभव है कि पीड़ित परिवार की ओर से किसी प्रकार की त्रुटि हुई हो या निर्माण नियमों के विरुद्ध रहा हो। लेकिन लोकतंत्र का मूल सिद्धांत यही है कि हर कार्रवाई कानूनन प्रक्रिया के तहत हो। यदि नोटिस नहीं दिया गया, सुनवाई का अवसर नहीं मिला, महिलाओं और बुजुर्गों के साथ कठोर व्यवहार हुआ और शक्ति प्रदर्शन की मानसिकता दिखाई गई, तो यह प्रशासनिक कार्रवाई नहीं बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों का अपमान माना जाएगा।
पूर्व की घटनाओं ने भी बढ़ाई चिंता
जैसलमेर में प्रशासनिक कार्रवाई को लेकर पहले भी विवाद सामने आते रहे हैं। कुछ समय पूर्व पूर्व कलेक्टर प्रताप सिंह नाथावत पर भी एक पत्रकार के रेस्टोरेंट को कथित रूप से गैर-कानूनी तरीके से तोड़ने के आरोप लगे थे।लगातार सामने आ रही ऐसी घटनाएं यह संकेत देती हैं कि जिले में प्रशासनिक जवाबदेही और पारदर्शिता को लेकर गंभीर पुनर्विचार की आवश्यकता है।
शर्मनाक : लोकतंत्र बनाम प्रशासनिक दमन
लोकतंत्र कहता है:
- नोटिस दो
- सुनवाई करो
- मानवीय व्यवहार करो
- कानून का पालन करो
लेकिन जैसलमेर में आरोप क्या लगे?
- बिना नोटिस कार्रवाई
- पुलिस दबाव
- महिलाओं से अभद्रता
- बुजुर्गों से धक्कामुक्की
- संवेदनहीन प्रशासन
प्रधानमंत्री तक पहुंची कार्रवाई की मांग
स्थानीय स्तर पर कार्रवाई नहीं होने से लोगों में आक्रोश बढ़ता दिखाई दे रहा है। अब मांग उठ रही है कि मामले में उच्चस्तरीय जांच हो और यदि राज्य सरकार कार्रवाई नहीं करती तो केंद्र सरकार और नरेंद्र मोदी को हस्तक्षेप करना चाहिए। लोगों का कहना है कि यदि प्रशासनिक तंत्र इसी प्रकार कमजोर परिवारों पर शक्ति प्रदर्शन करता रहा तो लोकतंत्र में जनता का भरोसा कमजोर होगा।
इंतिहा : क्या जैसलमेर में कानून का राज बचा है?
जैसलमेर की यह घटना केवल एक प्रशासनिक विवाद नहीं है, बल्कि यह सवाल है कि क्या कानून सभी के लिए समान है? क्या गरीब और कमजोर परिवारों को भी सम्मान और न्याय मिलेगा? क्या प्रशासन संवेदनशीलता के साथ काम करेगा या शक्ति प्रदर्शन ही शासन का चेहरा बन जाएगा? राइजिंग भास्कर स्पष्ट रूप से मानता है कि यदि इस मामले में निष्पक्ष जांच और कठोर कार्रवाई नहीं हुई तो यह संदेश जाएगा कि सत्ता और प्रशासन जनता की सेवा के लिए नहीं बल्कि भय पैदा करने के लिए इस्तेमाल हो रहे हैं।लोकतंत्र में जनता सबसे ऊपर होती है। प्रशासन जनता का सेवक होता है, मालिक नहीं।
Author: Dilip Purohit
Group Editor




