लोटस ब्लूम पब्लिकेशन द्वारा सफलता पूर्वक पूरा किया ब्रह्मलीन, युग मनीषी प्रोफेसर हिम्मत सिंह सिन्हा की विश्व ज्ञान-यात्रा का 10वां पड़ाव
दिलीप कुमार पुरोहित. बर्लिन (जर्मनी)
लोटस ब्लूम पब्लिकेशंस और इंडो-जर्मन सोसायटी की ओर से ब्रह्मलीन युग मनीषी हिम्मत सिंह सिन्हा का 10वां पड़ाव फ्रेंकफर्ट में 21 मई को और 25 मई को कायस्थ वंश इंटरनेशनल की ओर से बर्लिन में आयोजित हुआ। इंडो जर्मन सोसायटी में भारतीय और जर्मन के सदस्य भी उपस्थित थे, इसलिए कार्यक्रम अंग्रेजी में आयोजित किया गया तथा प्रो सिन्हा साहब के वीडियो जर्मन भाषा में सब टाइटल करके प्रस्तुत किए गए।
श्रीमती अनुराधा व्यास ने सभी लोगों को संबोधित करते हुए इस कार्यक्रम में यह बताया कि प्रो सिन्हा किस तरह के व्यक्तित्व थे। उन्होंने ना तो अपने घर का मकान बनवाया, ना कोई स्कूटी, स्कूटर या कार ही खरीदी, वरन् इसके उपरांत वे साइकिल पर ही चला करते थे, जबकि वे कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के दर्शन विभाग के विभागाध्यक्ष और डीन भी थे और 26 स्वयंसेवी संस्थाओं के अध्यक्ष या उपाध्यक्ष थे। अनुराधा ने बताया कि वे अपने सारी पूंजी को उन छात्रों की शिक्षा पर खर्च कर देते थे जो ग़रीब घर से होते थे लेकिन पढ़ना चाहते थे। ऐसे बच्चों की फ़ीस, कपड़ा लत्ता, पुस्तकें, खाना पीना आदि सभी व्यय स्वयं ही उठाते थे। ख़ुद उनके अपने लिए तीन जोड़ी धोती और तीन कुर्ता तथा दो जोड़ी सैंडल ही होते थे। यही उनकी चल और अचल सम्पत्ति थी।
इंडो जर्मन सोसायटी कार्यक्रम के अंत में शिक्षा को लेकर बहुत सार्थक चर्चा हुई, जिसमें जर्मन और भारतीय शिक्षा पद्धति पर सभी ने अपने अपने विचार रखे। उसके पश्चात 25 मई को कायस्थ वंश इंटरनेशनल की ओर से प्रो सिन्हा का कार्यक्रम हुआ, जिसमें भारत से विकास शर्मा ने जूम पर आकर प्रो सिन्हा के बारे में बहुत सारी जानकारियां साझा कीं।
उन्होंने बताया कि किस तरह से प्रो सिन्हा के शिष्य आज कई विश्वविद्यालयों के कुलपति हैं, एमपी और एमएलए हैं। उन्होंने यह भी कहा कि यदि उन्हें कायस्थ शिरोमणी कहा जाए तो गलत नहीं होगा क्योंकि उन्होंने कभी भी जाति के आधार पर किसी का भेदभाव नहीं किया। विकास शर्मा ने आपातकाल के दौरान प्रो सिन्हा ने किस तरह से हरियाणा में आंदोलन चलाया उसका भी ज़िक्र किया।
उसके पश्चात केबी व्यास ने बताया कि सनातन, बौद्ध, जैन, इस्लाम, क्रिश्चिएनिटी, सिख आदि के बारे में प्रो सिन्हा का ज्ञान अथाह था। उन्होंने 22 पुस्तकें लिखी, 750 लेख विभिन्न अखबारों में छपे, 70 लोगों को विभिन्न विषयों पर पीएचडी करवाई और वे निरंतर अनेकानेक विषयों पर साहित्य पढ़ते रहते थे, इसीलिए उनका ज्ञान अथाह था। अधिक ज्ञान होने से अहंकार भी आ जाता है लेकिन प्रो सिन्हा साहब को ज्ञान का अहंकार नहीं था, उन्हें अहंकार का ज्ञान प्राप्त हो चुका था, इसलिए उन्होंने उस ज्ञान से अपने भीतर का दिया जला लिया था, उस ज्ञान को आत्मसात कर लिया था।
प्रो सिन्हा के अगले कार्यक्रम कनाडा और अमेरिका में होने हैं। कनाडा में प्रो सिन्हा के दोहिते व्योम रहते हैं जो उनके लिए होने वाले कार्यक्रम का वहां इंतज़ार कर रहे हैं।









