लेखक : कुंवर नियाज़ मुहम्मद, इस्लामिक स्कॉलर, एडवोकेट, पत्रकार
इस्लाम धर्म में दो त्योहार हैं पहला ईदुल फित्र और दूसरा ईदुल अज़हा। ईदुल फित्र पहली मरतबा 01 शव्वालुल मुकर्रम सन हिजरी 02 यानी 25 मार्च 624 और ईदुल अज़हा पहली मरतबा इस्लामी कलेण्डर के बारहवें महीने जिल-हज्ज की 10 तारीख को सन हिजरी 02 यानी 03 मार्च 624 को मदीना में मनाई गई।
ईदुल फित्र माह रमज़ानुल मुबारक के महीने में शिद्दत की गर्मी और शिद्दत की सर्दी के 30 रोजे भूख और प्यास बरदाश्त करने के बाद शुक्राने के तौर पर अल्लाह की तरफ से मुसलमानों को ईद का इनआम अता फरमाया गया और इसी तरह से ईदुल अज़हा हज जैसे मुक़्क़द्दस सफर मुकम्मल करने और हज जैसा फरीज़ा अदा करने के बाद ईदुल फित्र के 70 दिन बाद इनआम फरमाई है। ये दोनों इस्लाम में ईद और खुशी के दिन हैं। जिन में दो रकअत नमाज़ बतौर शुक्राने के पढ़ी जाती है।
ईद लफ्ज़े “अऊद” से लिया गया है जिसके माअनी है बार-बार आना, चुनांचे इस दिन को ईद इसलिए कहा जाता है कि यह दिन बार-बार यानी हर साल आता है। कई हज़रात कहते हैं कि इस दिन का नाम “ईद” इसलिए है कि अल्लाह ताअला “अऊद” करता है यानी बंदों पर अपनी रहमत और बख्शीश के साथ मुतवज्जेह होता है।
“अऊद” ईद से है जिसके माअनी हैं लौटना, बार-बार आना, क्यूंकि यह मफहूम इस इस दिन के अंदर मौजूद है, इसलिए वोह दिन जो हर साल माहे शव्वालुल मुकर्रम की पहली तारीख और माहे जिलहिज्जा की दसवीं तारीख को आता है, यौम-ए-ईद कहलाता है।
ईदुल अज़हा का मतलब है “मैंने कुरबानी दी” ईदुल अज़हा को अलग-अलग मुल्कों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है। हिन्दुस्तान, पाकिस्तान और बंगलादेश में बकर ईद, बकरीद, ईदे कुरबां, या कुरबानी की ईद, जानवर की कुरबानी की मुनासिबत से मशहूर है। ईदुल फित्र को छोटी ईद और ईदुल अज़हा को बड़ी ईद कहते हैं। ईदुल नहर- अरबी ज़बान में नहर कुरबानी देना है, इसलिए अरब मुमालिक में इसे ईदुल नहर नाम से भी पुकारा जाता है। हज का त्योहार यह ईद फरीज़ा-ए-हज के दौरान आती है इसलिए हज से मनसूब कर के याद किया जाता है।
कुरबानी पैगम्बरे इस्लाम हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की याद से जुड़ी हुई है। हज़रत इब्राहीम अलैहिस्स्लाम और हज़रत साराह के यहां एक बेटा हुआ जिनका नाम हज़रत इस्माईल था, जब बेटा पैदा हुआ उस वक़्त हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की उम्रे मुबारक तक़रीबन 100 साल और आपकी ज़ौजा हज़रत साराह की उम्र तकरीबन 95 साल की थी। जब हज़रत इसमाईल अलैहिस्सलाम चलने फिरने की उम्र में हुए तब हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने बताया कि मैं ख्वाब में देखता हूं कि मैं आपको ज़िबह कर रहा हूं, यह ख्वाब तीन रात तक आया। यह तैशुदा बात है कि अम्बिया अलैहिमुस्सलाम का ख्वाब “वहीय” होता है। इसलिए इस ख्वाब का मतलब यह था कि कि अल्लाह की तरफ से हुक्म हुआ है कि अपने इकलोते बेटे को ज़िबह कर दे।
यूं यह हुक्म किसी फरिश्ते के ज़रीए से भी नाज़िल किया जा सकता था लेकिन ख्वाब में दिखाने की हिकमत बज़ाहिर यह थी कि हज़रत इब्राहीम की आज्ञाकारिता पूर्णरुप से प्रदर्शित करना था, ख्वाब के ज़रीए दिए हुए हुक्म में इन्सानी नफ्स के लिए व्याख्या करने की बड़ी गुंज़ाइश थी लेकिन हज़रत इब्राहीम ने तावीलात का रास्ता अख्तियार करने के बजाए अल्लाह के हुक्म के आगे सरे तसलीम ख़म कर दिया।
इसके अलावा यहां अल्लाह ताअला का असल मक़सद न हज़रत इसमाईल को ज़िबह करना था और न हज़रत इब्राहीम अलै को यह हुक्म देना कि उन्हें ज़िबह कर ही डालो, बल्कि मन्शा हुक्म यह देना था कि अपनी तरफ से उन्हें ज़िबह करने के सारे सामान तैयार कर के उनके ज़िबह करने के लिए कदम बढ़ाओ और काम कर गुज़रो। अब अगर यह हुक्म ज़बानी दिया जाता तो इस में आज़माईश न होती इसलिए उन्हें ख्वाब में दिखाया कि वोह बेटे को ज़िबह कर रहे है। इस से हज़रत इब्राहीम यह समझे कि ज़िबह का हुक्म हुआ है और वे पूरी तरह से ज़िबह करने पर आमादा हो गए। इस तरह आज़माईश भी पूरी हो गई और ख्वाब भी सच्चा हो गया।
यह बात ज़बानी हुक्म के ज़रीए से आती तो यह आज़माईश नहीं होती या हुक्म को बाद में मनसूख करना पड़ता। यह इम्तिहान किस कद्र सख्त था। इसकी तरफ इशारा करने के लिए यहां अल्लाह ने ये अलफाज़ पढ़ाए यानी अरमानों से मांगे हुए इस बेटे को क़ुरबान करने का हुक्म उस वक़्त दिया गया था जब यह बेटा अपने बाप के साथ चलने फिरने के क़ाबिल हो गया और परवरिश की मशक़्क़तें बरदाश्त करने के बाद अब वक्त आया था कि वोह क़ुव्वते बाज़ू बन कर बाप का सहारा साबित हो, उस वक्त हज़रत इस्माईल अलै की उम्र मुबारक 13 साल की थी।
बेटे से मश्विरा- सो तुम भी सोच लो तुम्हारी क्या राय है? हज़रत इब्राहीम अलै ने हज़रत इस्माईल अलै से इसलिए यह बात नहीं पूछी कि आपको हुक्मे इलाही की तामील में कोई असमंजस था बल्कि एक तो वोह अपने बेटे का इम्तिहान लेना चाहते थे कि वोह इस आज़माईश में किस तरह पूरा उतरता है? दूसरा अम्बिया अलैहिमुस्सलाम का तर्ज हमेशा यह रहा है कि वोह अहकामे इलाही की इताअत के लिए हर वक्त तैयार रहते है मगर इताअत के लिए हमेशा रास्ता वोह अख्तियार करते है कि जो हिकमत और हत्तल मक़दूर यानी यथा संभव सहूलत पर मबनी (निर्भर) हो।
अगर हज़रत इब्राहीम अलै. पहले से कुछ कहे बगैर बेटे को जिबह करने लगते तो यह दोनों के लिए मुश्किल का सबब होता। अब यह बात मश्विरे के अंदाज में बेटे से इसलिए ज़िक्र की कि बेटे को पहले से अल्लाह का यह हुक्म मालूम हो जाएगा तो वोह ज़िबह होने की अज़ीयत सहने के लिए पहले से तैयार हो सकेगा। नीज़ अगर बेटे के दिल में झिझक हुई भी तो उसे समझाया जा सकेगा कि वोह बेटा भी अल्लाह के ख़लील का बेटा था और उसे खुद मनसबे रिसालत पर फाइज़ होना था।
फरमांबरदार बेटे का जवाब- अब्बा जान ! जिस बात का आपको हुक्म दिया गया है उसे कर गुजरीए। इससे हज़रत इस्माईल के बे-मिसाल जज़्ब-ए-जां सिपारी की तो शहादत मिलती ही है इसके अलावा यह भी मालूम होती है कि इस कमसीनी ही में अल्लाह ने उन्हें कैसी ज़हानत और कैसा इल्म अता फरमाया था। हज़रत इब्राहीम ने उनके सामने अल्लाह के किसी हुक्म का हवाला नहीं दिया था बल्कि महज़ एक ख्वाब का तज़करा फरमाया था मगर हज़रत इस्माईल समझ गए कि अम्बिया अलैहिमुस्सलाम का ख्वाब वहीय-ए-इलाही होता है और ख्वाब भी दर हक़ीक़त हुक्मे इलाही की ही एक शक्ल है चुनांचे उन्होंने जवाब में ख्वाब के बजाए हुक्मे इलाही का तज़करा फरमाया। हज़रत इस्माईल अलै. ने अपनी तरफ से वालिदे बुज़ुर्गवार को यह यक़ीन भी दिलाया कि इन्शा अल्लाह आप मुझे सब्र करने वालों में से पाएंगे।
इस जुम्ले में हज़रत इस्माईल के हद दर्जे का अदब और हद दर्जे का आदर देखिए एक तो इन्शा अल्लाह कह कर मामला अल्लाह के हवाले कर दिया और इस वादे में दावे की जो ज़ाहिरी सूरत पैदा हो सकती थी उसे खत्म फरमा दिया। दूसरे, आप यह भी फरमा सकते थे कि आप मुझे इन्शा अल्लाह सब्र करने वाला पाएंगे लेकिन आपने इसकी जगह फरमाया आप मुझे सब्र करने वालों में से पाएंगे। जिस से इस बात की तरफ इशारा फरमाया कि ये सब्र-ओ-जब्त तन्हा मेरा कमाल नहीं है बल्कि दुनिया में और भी बहुत से सब्र करने वाले हुए है।
इन्शा अल्लाह मैं भी उन में शामिल हो जाउंगा। इस तरह आपने इस जुमले में अहंकार, घमण्ड, आत्म प्रेम, और अभिमान, के हर अंश को मिटा दिया और उसे सर्वोच्च और बुलंद मक़ाम पर पंहुचा दिया और नम्रता और विनम्रता का परिचय दिया।
इससे यह सबक़ मिलता है कि इन्सान को किसी मामले में अपने ऊपर ख्वाह कितना ही ऐतमाद हो लेकिन उसे ऐसे बुलंद बांग दावे नहीं करने चाहिए, जिन से ग़ुरुर और तक़ब्बुर टपकता हो अगर कहीं कोई ऐसी बात कहने की ज़रुरत हो तो अल्फ़ाज़ में उनकी रिआयत होनी चाहिए कि इन में अपने बजाए अल्लाह पर भरोसे का इज़हार हो । जिस हद तक मुमकिन हो तवाज़े के दामन को न छोड़ा जाए। इस मामले में हज़रत इब्राहीम अलै. को शैतान ने तीन बार बहकाया तो हर बार सात कंकरियां मार कर शैतान को भगा दिया। आज तक मीना के तीन जुमरात पर कंकरियां मार कर इसी महबूब अमल की याद मनाई जाती है।
ज़िबह की तैयारी कर के दोनों क़ुरबान गाह पहुंचे तो बेटे ने कहा अब्बा जान! मुझे अच्छी तरह बांध दें ताकि ज़ियादा तड़प न सकूं। अपने कपड़ों को भी बचाईए, ऐसा न हो कि खून के छींटे कपड़ों पर पड़े तो मेरा सवाब घट जाएगा। मेरी वालिदा खून देखेगी तो उन्हें ग़म ज़ियादा होगा, और अपनी छुरी भी तेज़ कर लीजिए और उसे मेरे हल्क पर जल्दी-जल्दी फेरिएगा ताकि आसानी से मेरा दम निकल जाए, मौत बड़ी सख्त चीज़ है और जब आप मेरी वालिदा के पास जाएं तो मेरा सलाम कह देना, मेरा कमीज़ वालिदा के पास ले जाना चाहें तो ले जाएं, शायद तसल्ली हो।
इकलोते बेटे की ज़बान से यह सुन कर बाप के दिल पर क्या गुज़र सकती है। इब्राहीम पहाड़ बन कर जवाब यह देते हैं। बेटे ! तुम अल्लाह का हुक्म पूरा करने के लिए मेरे कितने अच्छे मददगार हो। यह कहकर बेटे को बौसा दिया पुरनम आंखों से उसे बांधा।
पहले सीधा लिटाया, फिर पेशानी के बल लिटाया, गला कटा नहीं। अल्लाह ने पीतल का टुकड़ा छूरी और गले के बीच में रख दिया। बेटे ने कहा करवट के बल लिटाएं, आप को मेरा चेहरा नज़र आता है, छूरी चलती नहीं है। अल्लाह ने फरमाया-हम ने उन्हें आवाज़ दी, कि इब्राहीम ! तुमने ख्वाब सच्चा कर दिखाया। ख्वाब में भी यही दिखाया कि छूरी चला रहे हैं, आज़माइश पूरी हो चुकी है अब इन्हें छोड दो।
कुरबानी की तारीख (इतिहास)- किसी हलाल जानवर को अल्लाह ताअला का तक़र्रुब और नज़दीकी हासिल करने की नियत से ज़िबह करना उस वक़्त से शुरु हुआ है जब से हज़रत आदम अलैहिस्सलाम दुनिया में तशरीफ लाए और दुनिया आबाद हुई। सबसे पहले कुरबानी हज़रत आदम अलै. के दो बेटों हाबील और काबील ने दी। (सुरह माईदा पारा-6)। हाबील ने एक मींढ़े की कुरबानी पेश की और काबील ने अपने खेत की पैदावार से कुछ गल्ला वगैरा सदक़ा कर के कुरबानी पेश की। हस्बे दस्तूर आसमान से आग नाज़िल हुई, हाबील के मीढे को खा लिया और काबील की कुरबानी को छोड़ दिया। कुरबानी के कुबूल होने की निशानी यह होती थी कि आसमान से आग आती और उसको जला देती। (सूरह आले इमरान)
सूरह कौसर में अल्लाह ताअला ने फरमाया कि जिस तरह से नमाज़ अल्लाह के अलावा किसी और के लिए नहीं हो सकती वैसे ही कुरबानी भी अल्लाह ही के नाम से होनी चाहिए। हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम मदीना में 10 साल रहे और हर साल पाबंदी से क़ुरबानी फरमात रहे। इस से मालूम हुआ कि कुरबानी सिर्फ मक्का मुअज़्ज़मा के लिए ही नहीं बल्कि हर शख्स, हर शहर में कुरबानी करने की ताकीद फरमाई गई है।
अल्लाह फरमाता है कि जानवर की कुरबानी का खून ज़मीन पर गिरने से पहले ही कुरबानी कुबूल कर ली जाती है। क़यामत के दिन कुरबानी का जानवर सींगों, बालों, खुर्रों के साथ (नेकियों के तराज़ू में) लाया जाएगा। पहली बार अल्लाह के रसूल ने कुरबानी के लिए दो मीढे किए।
कुरबानी अपनी इस्तताअत के हिसाब से सबको करनी चाहिए। अल्लाह की नज़र में जानवर का खून और गोश्त अल्लाह तक नहीं पहुंचता बल्कि तक़वा पहुंचता है। यह त्योहार सुन्नते इब्राहीमी है।
ईदुल अज़हा की दो रकअत नमाज़ अदा करने के फौरन बाद कुरबानी की जाती है। कुरबानी 10, 11, 12 तारीख तक की जा सकती है। ईद की नमाज़ से पहले और बाद में बुलंद आवाज़ में तक़बीरें पढ़ी जाती है।
कुरबानी की हक़ीक़त- असल में कुरबानी की हक़ीक़त तो यह थी कि आशिक़ खुद अपनी जान को खुदा ताअला के हुजूर में पेश करता मगर अल्लाह की रहमत देखिए उनको यह गवारा नहीं हुआ। इसलिए हुक्म हुआ कि तुम जानवर ज़िबह कर दो, हम यही समझेंगे कि तुम ने खुद अपने आप को कुरबान कर दिया।
हज़रत इब्राहीम अलै. को अल्लाह की तरफ से ख्वाब के ज़रीए बशारत दी गई कि आप अपने इकलोते बेटे हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम की कुरबानी पेश करें। अब दखिए कि यह हुक्म अव्वल तो औलाद के बारे में दिया गया और औलाद भी कैसी, फरज़ंद इकलौता, फरजंद भी नालायक नहीं, नबी-ए- मासूम है। ऐसे बच्चे की कुरबानी करना बड़ा मुश्किल काम है।
हक़ीक़त में इन्सान को अपनी कुरबानी पेश करना इतना ज़ियादा मुश्किल नहीं, मगर अपने हाथ से अपनी औलाद को ज़िबह करना बड़ा सख्त मुश्किल काम है मगर चुंकि हुक्मे खुदावंदी था इसलिए आप ने अपने बेटे की मुहब्बत पर हुक्मे खुदावंदी को मुक़द्दम रखते हुए फरमाने इलाही के सामने सरे तसलीम ख़म कर दिया। हज़रत इस्माईल अलै. को मिना की कुरबानगाह में ले गए और फरमाया बेटा! मुझे खुदा ताअला ने हुक्म दिया है कि मैं तुझ को जिबह कर दूं।
इस्माईल अलै. ने फौरन यह फरमाया-अब्बा जान! जो आपको हुक्म हुआ है ज़रुर कीजिए। अगर मेरी जान की ज़रुरत है तो जान क्या? अगर हज़ार जानें भी हों तो निसार हैं। चुनांचे हज़रत इब्राहीम अलै. ने रस्सियों से पहले उनके हाथ पांव बांधे फिर छूरी तेज़ की। अब बेटा भी खुश है कि मैं खुदा की राह में कुरबान हो रहा हूं और इधर बाप भी खुश है कि मैं अपने हाथ से बेटे की कुरबानी पेश कर रहा हूं, चुनांचे हुक्मे खुदावंदी की तामील में अपने बेटे की गरदन पर छुरी चला दी।
जब छुरी कुंद हो गई तो उस वक़्त हुक्मे इलाही हुआ (सूरह सफात पारा-23) “बेशक आपने अपना ख्वाब सच कर दिखाया, हम नेकोकारों को इसी तरह जज़ा दिया करते है। अब हम इसके एवज में जन्नत से एक मींढ़ा भेजते हैं और तुम्हारे बेटे की जान के एवज़ एक दूसरी जान की कुरबानी मुर्कार करते हैं। चुनांचे इसी दिन से ऊंट, भैंस, गाय, मीढ़ा, बकरा वगैरा कुरबानी के लिए बदला मुक़र्र हो गया।
अन्य धर्मों में मान्यता- कुरबानी इस्लाम के अलावा अन्य धर्मों में भी दी जाती है। यहूदी और इसाई धर्मों में ईदुल अज़हा में याद की जाने वाली पैगम्बर इब्राहीम अलै. मान्यता प्राप्त है। यह इब्राहीम अलै. की भावना को सम्मान देते है। इस्लाम में कुरबानी को इबादत के साथ-साथ सामाजिक भईचारे को मज़बूत करने का एक ज़रीआ माना जाता है।
कुरबानी से बहुत से फायदे होते है। जैसे-सांस्कृतिक संदर्भ- भाईचारा ईदुल अज़हा समाज में भाईचारा और न्याय का संदेश देता है. जहां लोग गिले-शिकवे भूला कर एक दूसरे से गले मिलते हैं, और बधाई देते हैं। यह कुरबानी इस बात की प्रतीक है कि मुसलमान अपनी सब से प्रिय वस्तु का त्याग कर अल्लाह के आदेशों का पालन करने के लिए तैयार रहते हैं।
कुरबानी से वैश्विक फायदे-
कुरबानी न केवल धार्मिक अनुष्ठान है बल्कि इसके दुनिया भर में गहरे सामाजिक आर्थिक और मानवीय फायदे भी हैं।
गरीबी और भूख में कमी-
कुरबानी का सबसे बड़ा फायदा यह है कि यह दुनिया भर के ग़रीब और ज़रुरतमद लोगों तक पौष्टिक भोजन पहुंचता है। यह उन लोगों के लिए खुशी का ज़रीआ बनता है जो आम दिनों में गोश्त नहीं खरीद सकते।
सामाजिक एकता और भाईचारा-
कुरबानी के गोश्त का एक हिस्सा अपने लिए, एक हिस्सा रिश्तेदारों के लिए, और एक हिस्सा ग़रीबों के लिए होता है। यह अमल समाज में मसावात और समानता और हमदर्दी को फरोग़ देता है। यह दिन साझा करने और प्रोपकार और एकता का प्रतीक है अमीर और गरीब को एक साथ लाता है, जिस से समाज में एकता की भावना बढ़ती है। यह त्योहार सामाजिक सौहार्द और ग़रीब-अमीर के बीच खाई को कम करने का एक अवसर भी माना जाता है जहां मिल बांट कर खाने की परंपरा है।
आर्थिक लाभ-
ईदुल अज़हा के दिन (कुरबानी) से मुल्क को होने वाले फायदे बहुआयामी है। जो न केवल धार्मिक भावनाओं से जुड़े हैं बल्कि देश की अर्थ व्यवस्था में भी महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।
यहां मुख्य फायदे दिए गए हैं।
भारी उछाल Economic Boost-
ईदुल अज़हा के इस मौके़ पर कुरबानी के जानवरों का खरबों रुपयों का कारोबार होता है, जो ग्रामीण अर्थ व्यवस्था को सीधे मज़बूती देता है।
किसानों और पशुपालकों को आय-
किसानों और पशुपालकों को उनके जानवरों की बहुत अच्छी क़ीमत मिलती है जिस से उनकी आय में वृद्धि होती है और ग्रामीण अर्थ व्यवस्था को बढ़ावा मिलता है।
रोज़गार के अवसरः-
चारे के व्यापारी, ट्रांस्पोर्टर (गाड़ियों में जानवर ले जाने वाले) और क़साई इस सीजन में अरबों रुपए कमाते हैं, जिस से रोज़गार के बड़े अवसर पैदा होते हैं।
चमड़ा उद्योग को फायदा-
कुरबानी के बाद मिलने वाली खालें, चमड़ा, फेक्ट्रियों के लिए कच्चा माल तैयार करती है जिस से इस चमड़ा उद्योग को काफी बढ़ावा मिलता है। पशु व्यापार से जुड़े कई लोगों के लिए आय का साधन है।
मानवीय सहायता-
Human Appeal जैसी कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं दुनिया भर के संघर्ष ग्रस्त, युद्ध प्रभावित और ग़रीब देशों में कुरबानी का गोश्त पहुंचाती है। ईदुल अज़हा अल्लाह के प्रति विश्वास, आज्ञाकारिता और समर्पण का प्रतीक है जो दिल में नम्रता लाता है। संक्षेप में, कुरबानी निःस्वार्थता, अल्लाह का आज्ञापालन और जरुरतमंदों की सहायता का एक शक्तिशाली माध्यम है।
सांकेतिक बलिदान- यह अपनी प्रिय वस्तु अंहकार, और नकारात्मकता को अल्लाह के लिए त्यागने का प्रतीक है। भारतीय संदर्भ में कुरबानी क़ानूनी दिशा-निर्देश- भारत में जानवर की कुरबानी के राज्य सरकारों द्वारा दिशा-निर्देश जारी किए जाते हैं इसके तहत प्रतिबंधित पशुओं की कुरबानी पर रोक है। जिस किसी जानवर को प्रतिबंधित किया जाता है उसकी कुरबानी नहीं दी जाती है। इस तरह कानूनी दिशा-निर्देशों का पूर्णरुप से खयाल रखा जाता है।
अल्लाह के प्रति समर्पण- यह दर्शाता है कि एक मुसलमान अपनी जान माल सब कुछ अल्लाह की राह में कुरबान करने के लिए तैयार है।
कुरबानी का मूल उद्देश्य-कुरबानी सिर्फ जानवर काटना नहीं है बल्कि अपने नफ्स (अंहकार) की कुरबानी देकर अल्लाह को प्रसन्न करना होता है।
आध्यात्मिक व सामाजिक संदेश-खून बहाना मक़सद नहीं बल्कि दिल का तक़वा (पवित्रता) और अल्लाह का डर, हुक्म की तामील सुन्नत है जो रज़ा और त्याग की भावना पैदा करना, वफादारी और आज्ञाकारिता और समर्पण दर्शाता है और समाज में समानता और जरुरतमंदों की सहायता का संदेश देती है।
आधुनिक संदर्भ-प्रेम और भाईचारे का संदेश-आज कई संस्थाओं के माध्यम से लोग दूर दराज़ के क्षेत्रों में जहां लोग ग़रीबी के कारण गोश्त नहीं खा सकते हैं। इस्लाम में कुरबानी को इबादत के साथ-साथ सामाजिक भाईचारे को मज़बूत करने का एक ज़रीआ माना जाता है। यह पर्व त्याग, सेवा और इंसानीयत का संदेश देता है जो समाज में एकता सद्भावना और प्रेम को बढ़ावा देता है। संक्षेप में ईदुल अज़हा न केवल एक धार्मिक त्योहार है बल्कि यह एक ऐसा समय है जब अरबों रुपयों की आर्थिक गतिविधियां होती हैं जो देश के विकास और सामाजिक सदभाव में मदद करती है।




