कवि : राजगोपाल करवा, सोलापुर
अब खुद तक लौट आया हूं…
अपनी हुई गलतियों से आज भी डर जाता हूं,
हालाँकि सबसे माफी मांग चुका हूं मैं…
फिर भी कुछ निगाहों में
आज भी जैसे अपराधी ही ठहरा हूं।
लेकिन एक सुकून है दिल में —
अब मन और दिल दोनों साफ हैं।
कहीं किसी का भरोसा फिर से न टूट जाए,
यही सोचकर अक्सर बेचैन हो जाता हूं।
बस इतनी सी गुजारिश है आप सबसे…
अपना प्यार यूँ ही बनाए रखना।
लोगों की उम्मीदों का बोझ
कभी-कभी बहुत थका देता है।
चाहते हुए भी हर किसी के लिए
वैसा नहीं कर पाता जैसा वे चाहते हैं।
शायद गलती मेरी ही थी…
क्योंकि आदत मैंने ही डाली थी
हर बार सबके लिए खड़े रहने की।
लोगों को खुश करते-करते,
खुद से बहुत दूर चला गया था,
अब खुद से रिश्ता जोड़ लिया है
तो कुछ लोगों को मैं बदल गया लगता हूं।
अब थोड़ा खुद से जुड़ गया हूं,
दुनियादारी से थोड़ा दूर रहने लगा हूं।
अपने भीतर जो शांति मिल रही है,
वही अब मेरी सबसे बड़ी दौलत है।
मैं तो उसमें बहुत खुश हूं…
पर शायद लोगों को
मेरा बदल जाना पसंद नहीं।
अब जो जैसा चल रहा है,
उसे वैसा ही स्वीकारना सीख रहा हूं।
शायद मेरे स्वास्थ्य के लिए
यही सबसे सही है।
खुद को बदलने की कोशिश कर रहा हूं,
और शायद उसी से
घर में भी… और मन में भी
थोड़ी शांति बनी हुई है।
मेरे स्वाभिमान की फिक्र करना,
मेरे लिए वही सबसे बड़ा सम्मान है।
अब दूसरों से सम्मान पाने की
न जरूरत बची है… न उम्मीद।
क्योंकि इंसान जब खुद की नजरों में गिरता नहीं,
तब दुनिया की राय उतनी मायने नहीं रखती।
“अब दिल में बस इतनी सी इच्छा बाकी है —
जहाँ तक हो सके,
किसी के काम आता रहूं।”
शुक्र है…
हिम्मत आज भी कहीं भीतर जिंदा है।
अब खुद को खुद ही संभालना है।
बस भगवान से यही प्रार्थना है —
जो साहस अब तक दिया है,
वह आख़िरी सांस तक बना रहे।
“अब भी टूटता हूं कभी-कभी,
पर बिखरना छोड़ दिया है…
जो हर दर्द में हँस देता था,
वो अब चुप रहने लगा है।”
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“स्वयं… सुकून का पता”
अब घर पर कोई ख़त नहीं आता,
न ही दरवाज़े पर किसी अपने की आहट सुनाई देती है।
कभी जिन आवाज़ों से घर भरा रहता था,
आज वही घर ख़ामोशी से बातें करता है।
शायद हमने भी दूरियाँ चुन ली हैं,
अब हर बात पर “हाँ में हाँ” नहीं मिलाता।
क्योंकि उम्र के इस मोड़ पर समझ आया—
हर रिश्ता निभाना ज़रूरी नहीं है,
कुछ रिश्तों से ख़ुद को संभालना भी ज़रूरी है।
अब घर से बाहर भी कम निकलता हूँ,
मतलबी भीड़ से अब मैं थक गया हूं।
दुनिया को जितना करीब से देखा है,
उतना ही ख़ुद के भीतर लौटना चाहता हूं।
मैं अब अपने काम से मतलब रखता हूँ,
दुनिया की उलझनों से ख़ुद को थोड़ा दूर रखता हूँ।
अब मैं किसी को सलाह नहीं देता,
क्योंकि लोग अब दिल से नहीं दिमाग से जीते हैं,
रिश्तेदारों के साथ अब संभलकर चलता हूँ,
घरवालों की खुशी में अपनी खुशी ढूँढता हूँ।
लेकिन दोस्तों के बीच आज भी दिल खुल जाता है,
क्योंकि सच्ची हँसी अब भी वहीं ज़िंदा है।
अब पूरी दुनिया को थोड़ा-बहुत पहचान लिया है,
लेकिन ख़ुद को समझना अभी बाकी है।
इसलिए अब भीतर झाँकता हूँ,
और ख़ुद से मिलने का प्रयास करता हूँ।
और अब महसूस होता है—
अब किसी से शिकायत भी नहीं रहती,
क्योंकि अपेक्षाएँ धीरे-धीरे शांत हो गई हैं
अब जिंदगी को सुकून से जीने का
एक नया अंदाज मिल गया है
ज़िंदगी…
और आनंद…
कहीं बाहर नहीं थे।
वे तो हमेशा मेरे ही भीतर थे,
बस मैं दुनियादारी की भीड़ में
उन्हें महसूस नहीं कर पाया।
अब दुनियादारी से थोड़ा दूर होकर,
मैं ख़ुद के और भी करीब आ गया हूँ।
जहाँ न कोई दिखावा है,
न किसी को साबित करने की बेचैनी…
बस….
एक सुकून है,
एक शांति है,
एक समाधान है
और ख़ुद से मिलने का सुंदर एहसास।
भीड़ में रहकर भी तन्हा थे हम,
हर चेहरे में अपनापन ढूँढते रहे।
जब थककर ख़ुद के पास बैठकर सुना,
तब पता चला—
सुकून तो भीतर ही खामोशी से रहता था।
सच को यह है की –
“जीवन का सबसे सुंदर सफ़र
….स्वयं तक पहुँचने का होता है।”




