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Thursday, July 9, 2026, 4:10 am

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विश्व पर्यावरण दिवस स्टोरी-2… नदियों की हत्या, पहाड़ों की लूट, जंगलों का जनाजा: आखिर कब तक चलेगा प्रकृति के खिलाफ यह संगठित अपराध?

क्या भारत पर्यावरणीय आपातकाल की ओर बढ़ रहा है?

विशेष रिपोर्ट: दिलीप कुमार पुरोहित

9783414079 diliprakhai@gmail.com

विश्व पर्यावरण दिवस पर जब देशभर में लाखों पौधे लगाने के दावे किए जाएंगे, तब एक ऐसा सच भी हमारे सामने खड़ा होगा जिसे स्वीकार करने का साहस शायद ही किसी सरकार, किसी अधिकारी या किसी प्रभावशाली संस्था में दिखाई दे।

सच्चाई यह है कि भारत का पर्यावरण तंत्र अभूतपूर्व संकट से गुजर रहा है।

नदियाँ दम तोड़ रही हैं।

पहाड़ गायब हो रहे हैं।

जंगल सिकुड़ रहे हैं।

भूजल समाप्त हो रहा है।

वन्यजीवों का अस्तित्व खतरे में है।

हवा जहरीली हो रही है।

तापमान लगातार नए रिकॉर्ड बना रहा है।

और सबसे खतरनाक बात यह है कि इस संकट को पैदा करने वाले कारण सभी की आँखों के सामने हैं।

यह कोई प्राकृतिक आपदा नहीं है।

यह मानव निर्मित संकट है।

यह उन नीतियों, उन निर्णयों, उन चूकों और उन विफलताओं का परिणाम है जिनकी जिम्मेदारी से अब बचना संभव नहीं है।

अरावली की चीख सुनाई क्यों नहीं देती?

यदि भारत की पर्यावरणीय त्रासदी का कोई प्रतीक चुना जाए तो वह अरावली हो सकती है।

करीब करोड़ों वर्ष पुरानी यह पर्वतमाला केवल राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली और गुजरात की भौगोलिक संरचना नहीं है।

यह उत्तर भारत की जीवनरेखा है।

यह भूजल पुनर्भरण करती है।

यह रेगिस्तान के विस्तार को रोकती है।

यह जलवायु संतुलन बनाए रखती है।

यह जैव विविधता का महत्वपूर्ण केंद्र है।

लेकिन पिछले कई दशकों में अरावली पर जो हुआ, वह किसी राष्ट्रीय धरोहर के साथ व्यवहार नहीं कहा जा सकता।

अवैध खनन।

अतिक्रमण।

निर्माण गतिविधियाँ।

भूमि उपयोग परिवर्तन।

राजनीतिक संरक्षण के आरोप।

प्रशासनिक निष्क्रियता के आरोप।

और परिणामस्वरूप लगातार क्षरण।

आज कई क्षेत्रों में अरावली का प्राकृतिक स्वरूप बदल चुका है।

सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि यदि अरावली इतनी महत्वपूर्ण थी तो उसे बचाया क्यों नहीं जा सका?

सुप्रीम कोर्ट, सरकारें और अरावली का सवाल

भारत का लोकतंत्र संस्थाओं पर आधारित है।

पर्यावरण संरक्षण के लिए कानून बने।

नियम बने।

न्यायिक हस्तक्षेप हुए।

विभिन्न स्तरों पर आदेश दिए गए।

फिर भी आम नागरिक के मन में यह प्रश्न उठता है कि यदि इतने प्रयास हुए तो जमीन पर परिणाम अपेक्षित क्यों नहीं दिखाई दिए?

यह कहना उचित नहीं होगा कि किसी एक संस्था ने सब कुछ बिगाड़ दिया।

लेकिन यह पूछना पूरी तरह उचित है कि क्या सभी संस्थाएँ मिलकर वह परिणाम दे सकीं जिसकी पर्यावरण को आवश्यकता थी?

यदि दशकों बाद भी अरावली संकट में है, तो यह केवल एक क्षेत्र की समस्या नहीं, बल्कि शासन व्यवस्था की सामूहिक चुनौती का प्रतीक है।

इतिहास केवल नीयत नहीं देखता।

इतिहास परिणाम देखता है।

और परिणाम अभी भी चिंता पैदा करते हैं।

नदियाँ: सभ्यता की धमनियों में जहर

भारत की महान सभ्यताएँ नदियों के किनारे जन्मीं।

आज उन्हीं नदियों का अस्तित्व संकट में है।

एक तरफ सीवर।

दूसरी तरफ औद्योगिक प्रदूषण।

तीसरी तरफ अवैध रेत खनन।

चौथी तरफ अतिक्रमण।

पाँचवीं तरफ जल दोहन।

नदी के खिलाफ शायद ही कोई अपराध बचा हो जो नहीं किया गया हो।

सरकारी योजनाएँ आती हैं।

बजट खर्च होते हैं।

बैठकें होती हैं।

लेकिन आम नागरिक पूछ रहा है—

यदि नदियों को बचाने के इतने प्रयास हुए हैं तो वे अब भी प्रदूषित क्यों हैं?

यदि निगरानी व्यवस्था प्रभावी है तो प्रदूषणकारी इकाइयाँ बार-बार नियमों का उल्लंघन कैसे करती हैं?

यदि कानून मजबूत हैं तो नदी तंत्र लगातार कमजोर क्यों हो रहा है?

जंगलों के नाम पर आंकड़ों का खेल

सरकारी दस्तावेजों में हरियाली बढ़ने के दावे दिखाई देते हैं।

लेकिन जमीन पर स्थानीय समुदायों की शिकायतें अलग कहानी कहती हैं।

विशेषज्ञ वर्षों से कहते रहे हैं कि प्राकृतिक जंगल और पौधारोपण एक समान नहीं होते।

एक प्राकृतिक जंगल हजारों प्रजातियों का घर होता है।

उसकी मिट्टी जीवित होती है।

उसका जल चक्र जीवित होता है।

उसकी पारिस्थितिकी जीवित होती है।

लेकिन जब जंगलों को केवल भूमि के रूप में देखा जाता है, तब उनका वास्तविक महत्व खो जाता है।

आज विकास और संरक्षण के बीच संतुलन खोजने की चुनौती पहले से कहीं अधिक गंभीर है।

राजनीति: पर्यावरण वोट क्यों नहीं दिलाता?

राजनीति समाज का दर्पण होती है।

लेकिन एक कड़वी सच्चाई यह भी है कि पर्यावरण शायद ही कभी चुनाव जीतने का मुद्दा बनता है।

नेताओं को पता है कि सड़क का उद्घाटन सुर्खियाँ देगा।

लेकिन नदी संरक्षण का दीर्घकालिक कार्यक्रम तत्काल राजनीतिक लाभ नहीं देगा।

इसी कारण पर्यावरण अक्सर भाषणों में रहता है, प्राथमिकताओं में नहीं।

यह समस्या किसी एक दल की नहीं है।

यह समस्या पूरे राजनीतिक ढांचे की है।

सरकारें बदलती रहीं।

नारे बदलते रहे।

लेकिन पर्यावरणीय संकट बना रहा।

नौकरशाही: फाइलों में कार्रवाई, जमीन पर सवाल

देश में पर्यावरण से जुड़े दर्जनों कानून मौजूद हैं।

निगरानी एजेंसियाँ मौजूद हैं।

निरीक्षण तंत्र मौजूद है।

रिपोर्टिंग व्यवस्था मौजूद है।

फिर भी यदि अवैध खनन वर्षों तक चलता है तो नागरिक प्रश्न पूछेंगे।

यदि प्रतिबंधित क्षेत्रों में निर्माण जारी रहता है तो नागरिक प्रश्न पूछेंगे।

यदि नदियाँ प्रदूषित रहती हैं तो नागरिक प्रश्न पूछेंगे।

लोकतंत्र में जवाबदेही का अर्थ ही यही है।

परिणामों के आधार पर मूल्यांकन।

और परिणाम अभी भी संतोषजनक नहीं हैं।

पर्यावरण माफिया आखिर पैदा कैसे होते हैं?

माफिया अचानक पैदा नहीं होते।

वे तब मजबूत होते हैं जब व्यवस्था कमजोर पड़ती है।

वे तब फलते-फूलते हैं जब कानून का भय कम हो जाता है।

वे तब प्रभावशाली बनते हैं जब अवैध लाभ का जोखिम कम और फायदा अधिक दिखाई देता है।

यही कारण है कि पर्यावरणीय अपराध को केवल कानून-व्यवस्था की समस्या मानना पर्याप्त नहीं होगा।

यह शासन और जवाबदेही की भी समस्या है।

राजस्थान की सबसे बड़ी चुनौती

राजस्थान पहले से ही जल संकट वाले राज्यों में गिना जाता है।

ऐसे प्रदेश में यदि पहाड़ कमजोर होंगे, जंगल घटेंगे और भूजल गिरता जाएगा तो परिणाम अत्यंत गंभीर हो सकते हैं।

अरावली का क्षरण केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं है।

यह कृषि का मुद्दा है।

यह पेयजल का मुद्दा है।

यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था का मुद्दा है।

यह भविष्य का मुद्दा है।

जलवायु परिवर्तन अब भविष्य नहीं, वर्तमान है

एक समय था जब जलवायु परिवर्तन को भविष्य का खतरा माना जाता था।

आज यह वर्तमान की वास्तविकता है।

लंबी गर्मी।

असामान्य वर्षा।

अचानक बाढ़।

लंबे सूखे।

तापमान के नए रिकॉर्ड।

ये सब संकेत हैं कि प्रकृति का संतुलन बिगड़ रहा है।

और जब प्राकृतिक संसाधन पहले से कमजोर हों तो संकट और गहरा हो जाता है।

क्या विकास का मतलब विनाश है?

नहीं।

विकास आवश्यक है।

सड़कें चाहिए।

रेलवे चाहिए।

उद्योग चाहिए।

रोजगार चाहिए।

लेकिन विकास का अर्थ यह नहीं हो सकता कि नदियाँ खत्म कर दी जाएँ।

पहाड़ मिटा दिए जाएँ।

जंगल समाप्त कर दिए जाएँ।

सच्चा विकास वही है जो आने वाली पीढ़ियों के अधिकारों को सुरक्षित रखे।

आने वाली पीढ़ियों का मुकदमा

आज का बच्चा शायद यह नहीं जानता कि उसके शहर के पास कभी घना जंगल था।

उसे शायद यह भी नहीं पता कि उसके गाँव के पास बहने वाली नदी कभी बारह महीने बहती थी।

…लेकिन कल जब पानी कम होगा, गर्मी बढ़ेगी और प्राकृतिक संसाधनों पर संघर्ष बढ़ेगा, तब इतिहास का सबसे कठिन मुकदमा शुरू होगा।

उस मुकदमे में अभियुक्त कोई एक व्यक्ति नहीं होगा।

कटघरे में पूरा तंत्र खड़ा होगा।

राजनीति भी।

प्रशासन भी।

संस्थाएँ भी।

और समाज भी।

विश्व पर्यावरण दिवस पर अंतिम चेतावनी

प्रकृति भाषण नहीं सुनती।

वह विज्ञापन नहीं पढ़ती।

वह सरकारी दावे नहीं देखती।

वह केवल परिणाम दर्ज करती है।

यदि पहाड़ कटेंगे तो उसका परिणाम होगा।

यदि नदियाँ प्रदूषित होंगी तो उसका परिणाम होगा।

यदि जंगल समाप्त होंगे तो उसका परिणाम होगा।

और वह परिणाम किसी सरकार, किसी दल, किसी अधिकारी या किसी न्यायालय को देखकर नहीं आएगा।

वह पूरे समाज को प्रभावित करेगा।

विश्व पर्यावरण दिवस पर सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि हमने कितने पौधे लगाए।

सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि हमने जो नदियाँ खो दीं, जो पहाड़ तोड़ दिए, जो जंगल नष्ट कर दिए—उनका हिसाब कौन देगा?

क्योंकि प्रकृति के इतिहास में एक बात बार-बार साबित हुई है—

प्रकृति देर से न्याय करती है, लेकिन उसका फैसला अंतिम होता है।

 

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor