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Thursday, July 9, 2026, 4:10 am

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विश्व पर्यावरण दिवस स्टोरी-3… थार की खामोश मौत: क्या हमने विकास के नाम पर अपना मरुस्थल खो दिया?

सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या हम उस मरुस्थलीय विरासत को समझ पाए, जिसे प्रकृति ने हजारों वर्षों में बनाया था? यदि खेजड़ी कमजोर होती है, यदि फोग और सेवण घास के क्षेत्र घटते हैं, यदि सांडा और गोडावण जैसे जीव संघर्ष करते हैं, तो यह केवल कुछ प्रजातियों का संकट नहीं होगा।

विशेष रिपोर्ट: दिलीप कुमार पुरोहित

9783414079 diliprakhai@gmail.com

जैसलमेर की सुबह अब वैसी नहीं रही जैसी बुजुर्गों की यादों में बसती है। एक समय था जब धोरों के बीच सेवण घास की लहरें दिखाई देती थीं। फोग की झाड़ियाँ हवा के साथ झूमती थीं। खेजड़ी के पेड़ जीवन का प्रतीक थे। आक, बेर, रोहिड़ा और गुग्गुल जैसी वनस्पतियाँ मरुस्थल की पहचान थीं। झाऊ चूहा, सांडा, मरुस्थलीय लोमड़ी, गोडावण और अनगिनत पक्षी इस धरती को जीवंत बनाते थे।

आज भी यह सब पूरी तरह गायब नहीं हुआ है, लेकिन स्थानीय लोगों, पशुपालकों और पर्यावरण प्रेमियों के बीच एक चिंता लगातार सुनाई देती है—क्या थार का मूल स्वरूप हमारी आँखों के सामने बदल रहा है?

विश्व पर्यावरण दिवस पर यह प्रश्न पहले से अधिक महत्वपूर्ण है।

मरुस्थल को बंजर समझने की भूल

स्वतंत्रता के बाद विकास की दौड़ शुरू हुई। सड़कें बनीं, नहरें आईं, नई बस्तियाँ बसीं, खनन बढ़ा और आर्थिक गतिविधियाँ तेज हुईं। इन परिवर्तनों ने लोगों के जीवन में सुविधाएँ भी बढ़ाईं।

लेकिन इसके साथ एक दूसरा पक्ष भी सामने आया।

मरुस्थल को अक्सर “खाली भूमि” समझा गया।

घासभूमियों को अनुपयोगी माना गया।

ओरण और गोचर भूमि सिकुड़ती गई।

और धीरे-धीरे वह प्राकृतिक तंत्र दबाव में आने लगा जो सदियों से इस कठोर भूभाग को जीवित रखे हुए था।

खेजड़ी, फोग और आक की कहानी

खेजड़ी को राजस्थान का जीवन वृक्ष कहा जाता है।

फोग मरुस्थल की मिट्टी को थामे रखने वाली महत्वपूर्ण झाड़ी है।

आक केवल एक जंगली पौधा नहीं, बल्कि अनेक कीटों और स्थानीय जैविक तंत्र का हिस्सा है।

स्थानीय ग्रामीणों का मानना है कि पहले इन वनस्पतियों की उपलब्धता अधिक थी। वैज्ञानिक रूप से हर क्षेत्र के लिए एक समान निष्कर्ष निकालना कठिन है, लेकिन यह स्पष्ट है कि भूमि उपयोग परिवर्तन और बढ़ती मानवीय गतिविधियों ने कई स्थानों पर प्राकृतिक वनस्पति पर दबाव बढ़ाया है।

सांडा और छोटे जीवों का संकट

सांडा (स्पाइनी-टेल्ड लिज़र्ड) कभी पश्चिमी राजस्थान के अनेक क्षेत्रों में सामान्य रूप से देखा जाता था।

स्थानीय लोग बताते हैं कि अब इसे पहले की तुलना में कम देखा जाता है।

ऐसे जीव पारिस्थितिकी तंत्र के स्वास्थ्य के संकेतक होते हैं। जब छोटे जीवों के आवास टूटते हैं, तो पूरा खाद्य जाल प्रभावित होता है।

झाऊ चूहा, रेगिस्तानी कृंतक, कीट और सरीसृप जैसे जीव भले ही सुर्खियों में नहीं आते, लेकिन यही मरुस्थल की असली नींव हैं।

गोडावण की चेतावनी

यदि थार की बदलती कहानी का कोई प्रतीक है तो वह गोडावण है।

यह पक्षी केवल एक प्रजाति नहीं, बल्कि इस प्रश्न का जीवित उत्तर है कि जब प्राकृतिक आवास सिकुड़ते हैं तो क्या होता है।

गोडावण का संघर्ष हमें बताता है कि विकास और संरक्षण के बीच संतुलन बिगड़ने की कीमत कितनी बड़ी हो सकती है।

वन विभाग और कठिन सवाल

वन विभाग ने वृक्षारोपण किया, संरक्षण योजनाएँ चलाईं और कई परियोजनाएँ शुरू कीं।

लेकिन आलोचकों का सवाल है कि क्या केवल पौधे लगाने से प्राकृतिक मरुस्थलीय वनस्पति वापस लाई जा सकती है?

क्या एक कृत्रिम रोपण सदियों पुराने प्राकृतिक तंत्र की भरपाई कर सकता है?

यही बहस आज पर्यावरण नीति के केंद्र में है।

अंतिम सवाल

विश्व पर्यावरण दिवस पर सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि हमने कितने पौधे लगाए। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या हम उस मरुस्थलीय विरासत को समझ पाए, जिसे प्रकृति ने हजारों वर्षों में बनाया था? यदि खेजड़ी कमजोर होती है, यदि फोग और सेवण घास के क्षेत्र घटते हैं, यदि सांडा और गोडावण जैसे जीव संघर्ष करते हैं, तो यह केवल कुछ प्रजातियों का संकट नहीं होगा।

यह पूरे मरुस्थलीय पारिस्थितिकी तंत्र की चेतावनी होगी। और शायद आने वाली पीढ़ियाँ हमसे पूछेंगी—जब थार बदल रहा था, तब हम क्या कर रहे थे?

79 वर्षों का हिसाब कौन देगा?

स्वतंत्र भारत को 79 वर्ष होने जा रहे हैं। इन 79 वर्षों में सरकारें बदलीं।मुख्यमंत्री बदले। प्रधानमंत्री बदले। नीतियाँ बदलीं। योजनाएँ बदलीं। बजट बढ़े।विभागों के नाम बदले।

लेकिन एक सवाल आज भी मरुस्थल की रेत में दबा पड़ा है—क्या थार, अरावली, ओरण, गोचर भूमि और मरुस्थलीय जैव विविधता पहले से अधिक सुरक्षित हुई या अधिक असुरक्षित? यह प्रश्न किसी एक दल से नहीं है। यह प्रश्न उन सभी सरकारों से है जिन्होंने 1947 से लेकर आज तक शासन किया।

यह प्रश्न उन सभी विभागों से है जिन्हें प्रकृति की रक्षा की जिम्मेदारी दी गई।

यह प्रश्न उन सभी संस्थाओं से है जिन्होंने पर्यावरण संरक्षण के दावे किए। आज देश को बताया जाना चाहिए—

– 1947 की तुलना में कितनी प्राकृतिक घासभूमि बची है?
– कितनी ओरण भूमि समाप्त हुई?
– कितने पारंपरिक वनस्पति क्षेत्र सिकुड़े?
– गोडावण, सांडा और अन्य मरुस्थलीय प्रजातियों की स्थिति में क्या बदलाव आया?
– खेजड़ी, गुग्गुल, फोग और सेवण घास के प्राकृतिक विस्तार में क्या परिवर्तन हुए?
– कितने करोड़ रुपये संरक्षण योजनाओं पर खर्च हुए?
– उन खर्चों के मापनीय परिणाम क्या रहे?

यदि अरबों रुपये खर्च हुए हैं, तो जनता को यह जानने का अधिकार है कि उन पैसों से पर्यावरणीय स्थिति कितनी सुधरी।

यदि स्थिति सुधरी है, तो प्रमाण सामने आने चाहिए।

यदि स्थिति नहीं सुधरी, तो कारणों की ईमानदार समीक्षा होनी चाहिए।

थार का बदलता चेहरा

स्थानीय बुजुर्ग बताते हैं कि कई क्षेत्रों में पहले जो प्राकृतिक झाड़ियाँ, घास और जीव-जंतु सामान्य रूप से दिखाई देते थे, वे अब कम दिखाई देते हैं।

यह अनुभव वैज्ञानिक अध्ययन का विकल्प नहीं है, लेकिन इसे पूरी तरह नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता।

जब स्थानीय समाज लगातार यह महसूस करे कि प्रकृति बदल रही है, तो सरकारों का दायित्व है कि वे विस्तृत और पारदर्शी अध्ययन कराएँ और परिणाम जनता के सामने रखें।

विश्व पर्यावरण दिवस पर जनता का प्रश्न

इस वर्ष विश्व पर्यावरण दिवस पर केवल पौधे लगाने की तस्वीरें पर्याप्त नहीं हैं।

जनता को आँकड़े चाहिए।

जनता को परिणाम चाहिए।

जनता को जवाब चाहिए।

और सबसे बढ़कर, जनता को यह जानने का अधिकार है कि 79 वर्षों में प्रकृति के संरक्षण के लिए जो वादे किए गए, उनका वास्तविक हिसाब-किताब क्या है।

क्योंकि पर्यावरण कोई राजनीतिक मुद्दा भर नहीं है।

यह आने वाली पीढ़ियों की विरासत है।

और विरासत के नुकसान का हिसाब कभी न कभी देना पड़ता है।

 

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor