यदि पर्यावरण संरक्षण पर लगातार योजनाएँ बनीं, बजट खर्च हुए, विभाग खड़े किए गए और अभियान चलाए गए, तो आज नदियाँ संकट में क्यों हैं? अरावली दबाव में क्यों है? मरुस्थलीय जैव विविधता पर खतरा क्यों है? और पारंपरिक वनस्पतियाँ तथा घासभूमियाँ सिकुड़ने की शिकायतें क्यों सुनाई देती हैं?
विशेष रिपोर्ट. दिलीप कुमार पुरोहित
9783414079 diliprakhai@gmail.com
5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाएगा। सरकारी कार्यालयों में पौधे लगाए जाएंगे। सोशल मीडिया पर हरियाली बचाने के संदेश चलेंगे। विज्ञापनों में पर्यावरण संरक्षण के दावे दिखाई देंगे। लेकिन राजस्थान की धरती एक ऐसा सवाल पूछ रही है जिसका जवाब पिछले 79 वर्षों से कोई सरकार स्पष्ट रूप से नहीं दे पाई है।
यदि पर्यावरण संरक्षण पर लगातार योजनाएँ बनीं, बजट खर्च हुए, विभाग खड़े किए गए और अभियान चलाए गए, तो आज नदियाँ संकट में क्यों हैं? अरावली दबाव में क्यों है? मरुस्थलीय जैव विविधता पर खतरा क्यों है? और पारंपरिक वनस्पतियाँ तथा घासभूमियाँ सिकुड़ने की शिकायतें क्यों सुनाई देती हैं?
आजादी के बाद पर्यावरण संरक्षण का सफर
स्वतंत्रता के बाद राजस्थान में विभिन्न स्तरों पर वन संरक्षण, वृक्षारोपण, मरुस्थल नियंत्रण, वन्यजीव संरक्षण, जलग्रहण विकास, सामाजिक वानिकी, मरुस्थलीकरण रोकने, जल संरक्षण और जैव विविधता संरक्षण से जुड़ी अनेक योजनाएँ चलाई गईं। इनमें प्रमुख रूप से:
– सामाजिक वानिकी कार्यक्रम
– मरुस्थल विकास कार्यक्रम
– जलग्रहण क्षेत्र विकास योजनाएँ
– वन महोत्सव अभियान
– वन्यजीव संरक्षण योजनाएँ
– राष्ट्रीय वनीकरण कार्यक्रम
– हरित राजस्थान अभियान
– जल संरक्षण मिशन
– अरावली पुनरुद्धार प्रयास
– मनरेगा के तहत जल एवं हरित संरचना कार्य
– जैव विविधता संरक्षण कार्यक्रम
जैसी अनेक पहलें शामिल रही हैं। इन योजनाओं पर दशकों में राज्य और केंद्र सरकारों द्वारा हजारों करोड़ रुपये खर्च किए गए। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि इन खर्चों के बदले राजस्थान को वास्तव में क्या मिला? पौधे लगे, लेकिन क्या जंगल बने? राजस्थान में हर वर्ष लाखों पौधे लगाने के दावे किए जाते हैं।हर मानसून में अभियान चलते हैं। फोटो खिंचते हैं। प्रेस विज्ञप्तियाँ जारी होती हैं।
लेकिन पर्यावरण विशेषज्ञ वर्षों से एक प्रश्न उठाते रहे हैं—क्या पौधे लगाना और जंगल बनाना एक ही बात है? यदि लगाए गए पौधों का बड़ा हिस्सा कुछ वर्षों में नष्ट हो जाता है, यदि स्थानीय प्रजातियों की जगह अनुपयुक्त प्रजातियाँ लगती हैं, यदि रखरखाव कमजोर रहता है, तो केवल पौधारोपण के आंकड़े वास्तविक हरित आवरण का सही चित्र नहीं देते।
अरावली का सवाल
अरावली भारत की सबसे प्राचीन पर्वतमालाओं में गिनी जाती है। इसके संरक्षण के लिए अनेक कानून, नीतियाँ और न्यायिक हस्तक्षेप हुए। फिर भी आम नागरिक पूछ रहा है—यदि संरक्षण व्यवस्था प्रभावी थी, तो अवैध खनन और अतिक्रमण की शिकायतें बार-बार क्यों उठीं? यदि अरबों रुपये पर्यावरण प्रबंधन पर खर्च हुए, तो अरावली की स्थिति को लेकर चिंता क्यों बनी रही?
मरुस्थल की बदलती तस्वीर
थार मरुस्थल को कभी “खाली जमीन” समझने की भूल की गई। लेकिन यह क्षेत्र खेजड़ी, रोहिड़ा, फोग, गुग्गुल, आक, सेवण घास और अनेक स्थानीय प्रजातियों का घर है। साथ ही गोडावण, सांडा, मरुस्थलीय लोमड़ी, जर्बिल और अनेक पक्षियों का आवास भी है। स्थानीय समुदायों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि कई क्षेत्रों में प्राकृतिक आवासों का स्वरूप बदला है।
यदि यह धारणा गलत है तो सरकारों को विस्तृत और पारदर्शी डेटा जारी करना चाहिए। यदि यह सही है, तो कारणों की सार्वजनिक समीक्षा होनी चाहिए।
नदियों पर खर्च और परिणाम
राजस्थान में जल संरक्षण और नदी पुनर्जीवन पर भी लगातार खर्च हुआ है।तालाबों के पुनर्जीवन से लेकर जलग्रहण विकास तक अनेक योजनाएँ लागू हुईं। लेकिन जल संकट आज भी राज्य की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है।इसका अर्थ यह नहीं कि सभी योजनाएँ विफल रहीं। लेकिन यह अवश्य दर्शाता है कि समस्या का समाधान अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुँचा। सबसे बड़ा प्रश्न: पैसा कहाँ गया? यह वह प्रश्न है जिससे सरकारें अक्सर असहज हो जाती हैं।जनता जानना चाहती है:
– कुल कितना खर्च हुआ?
– किस योजना पर कितना खर्च हुआ?
– कितने पौधे वास्तव में जीवित बचे?
– कितने जल स्रोत स्थायी रूप से पुनर्जीवित हुए?
– कितने वन क्षेत्र वास्तव में मजबूत हुए?
– जैव विविधता में क्या सुधार हुआ?
इन प्रश्नों का उत्तर केवल बजट दस्तावेजों से नहीं मिलेगा। इसके लिए स्वतंत्र मूल्यांकन आवश्यक है। क्या भ्रष्टाचार हुआ? यह कहना कि “इतना पैसा भ्रष्टाचार में चला गया” बिना प्रमाण के संभव नहीं है। लेकिन यह पूछना पूरी तरह उचित है कि:
– कितनी योजनाओं का सामाजिक ऑडिट हुआ?
– कितनी योजनाओं का स्वतंत्र मूल्यांकन हुआ?
– कितने मामलों में अनियमितताएँ पाई गईं?
– कितनी जिम्मेदारियाँ तय हुईं?
यदि जवाब अस्पष्ट हैं, तो पारदर्शिता की मांग और भी मजबूत हो जाती है।
79 वर्षों का रिपोर्ट कार्ड
आजादी के बाद से राजस्थान में पर्यावरण संरक्षण के लिए नीतियाँ बनीं, संस्थाएँ बनीं और बजट बढ़े। लेकिन विश्व पर्यावरण दिवस पर सरकारों को केवल उपलब्धियाँ नहीं गिनानी चाहिए। उन्हें यह भी बताना चाहिए:
– क्या खोया?
– क्या बचाया?
– क्या सुधरा?
– क्या बिगड़ा?
– और आगे की रणनीति क्या है?
जनता का अधिकार
पर्यावरण किसी विभाग की निजी संपत्ति नहीं है। यह जनता की साझा विरासत है। इसलिए जनता को यह जानने का अधिकार है कि उसके कर के पैसे से चलने वाली योजनाओं का वास्तविक परिणाम क्या रहा।
विश्व पर्यावरण दिवस पर अंतिम सवाल
यदि 79 वर्षों में हजारों करोड़ रुपये खर्च हुए, तो राजस्थान की जनता को एक सार्वजनिक पर्यावरणीय श्वेतपत्र क्यों नहीं दिया जाता?
जिसमें साफ-साफ लिखा हो:
– कितना पैसा खर्च हुआ।
– क्या लक्ष्य थे।
– क्या हासिल हुआ।
– क्या नहीं हुआ।
– और जिम्मेदारी किसकी है।
क्योंकि पर्यावरण संरक्षण केवल पौधे लगाने का उत्सव नहीं है।
यह जवाबदेही का विषय है। और जवाबदेही के बिना कोई भी हरित अभियान केवल एक वार्षिक आयोजन बनकर रह जाता है।



