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Thursday, July 9, 2026, 2:36 am

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घी के नाम पर जहर? डेयरी उद्योग की हकीकत पर उठ रहे गंभीर सवाल

विशेषज्ञों का दावा: दूध, घी और डेयरी उत्पादों के पीछे छिपी क्रूरता और स्वास्थ्य जोखिमों को समझना जरूरी

उपभोक्ताओं को जागरूक करने की मांग, प्राकृतिक एवं नैतिक डेयरी व्यवस्था पर जोर

दिलीप कुमार पुरोहित. नई दिल्ली

9783414079 diliprakhai@gmail.com

भारतीय रसोई में घी को शुद्धता, पोषण और स्वास्थ्य का प्रतीक माना जाता है। पूजा-पाठ से लेकर भोजन तक घी का विशेष महत्व है। लेकिन अब विशेषज्ञों का एक वर्ग यह सवाल उठा रहा है कि क्या बाजार में उपलब्ध हर घी वास्तव में उतना ही शुद्ध और सुरक्षित है, जितना उपभोक्ता समझते हैं? उनका कहना है कि केवल मिलावट ही नहीं, बल्कि डेयरी उत्पादन की पूरी प्रक्रिया पर गंभीर चिंतन की आवश्यकता है।

विशेषज्ञों के अनुसार आधुनिक व्यावसायिक डेयरी व्यवस्था में दूध उत्पादन को अधिकतम करने की होड़ ने पशु कल्याण, प्राकृतिक प्रक्रियाओं और खाद्य गुणवत्ता को प्रभावित किया है। उनका मानना है कि उपभोक्ताओं तक पहुंचने वाले दूध, घी, मक्खन, पनीर और अन्य डेयरी उत्पादों के पीछे की वास्तविकता को समझना समय की मांग है।

दूध उत्पादन की प्रक्रिया पर उठ रहे सवाल

विशेषज्ञ बताते हैं कि गाय स्वाभाविक रूप से अपने बछड़े के पोषण के लिए दूध देती है। व्यावसायिक डेयरी व्यवस्था में दूध उत्पादन बढ़ाने के लिए कई स्थानों पर कृत्रिम गर्भाधान, बार-बार गर्भधारण और अधिक उत्पादन के दबाव जैसी प्रक्रियाओं का उपयोग किया जाता है।

उनका कहना है कि दूध उत्पादन को व्यवसायिक दृष्टि से देखने के कारण पशुओं पर अत्यधिक दबाव पड़ता है। कई बार दूध उत्पादन कम होने पर हार्मोन आधारित उपायों और अन्य तकनीकों का सहारा लिया जाता है, जिससे पशुओं के स्वास्थ्य और जीवनकाल पर प्रभाव पड़ सकता है।

विशेषज्ञों का मत है कि पशु कल्याण को नजरअंदाज कर केवल उत्पादन पर ध्यान देना लंबे समय में न तो पशुओं के लिए उचित है और न ही उपभोक्ताओं के लिए।

बछड़ों को मां से अलग करने की प्रक्रिया पर चिंता

पशु कल्याण से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि दूध उद्योग की सबसे संवेदनशील प्रक्रियाओं में से एक नवजात बछड़ों को उनकी मां से अलग करना है। उनका दावा है कि इससे पशुओं में तनाव और मानसिक दबाव उत्पन्न होता है।

विशेषज्ञ मानते हैं कि पशुओं की भावनात्मक आवश्यकताओं को समझे बिना केवल उत्पादन आधारित मॉडल अपनाना नैतिक प्रश्न खड़े करता है। उनका कहना है कि पशुओं के प्रति संवेदनशीलता और सम्मान किसी भी सभ्य समाज की पहचान है।

क्या गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है?

खाद्य विशेषज्ञों का मानना है कि पशुओं का स्वास्थ्य, उनका भोजन, देखभाल और पालन-पोषण सीधे तौर पर दूध की गुणवत्ता को प्रभावित करता है। यदि पशु तनावपूर्ण परिस्थितियों में रहते हैं या उनकी देखभाल पर्याप्त नहीं होती, तो इसका असर उत्पाद की समग्र गुणवत्ता पर पड़ सकता है।

उनके अनुसार उपभोक्ताओं को केवल ब्रांड या पैकेजिंग देखकर संतुष्ट नहीं होना चाहिए, बल्कि उत्पाद के स्रोत और उत्पादन पद्धति के बारे में भी जानकारी प्राप्त करनी चाहिए।

घी खरीदते समय किन बातों का रखें ध्यान?

उत्पाद का स्रोत विश्वसनीय हो।
निर्माण और पैकेजिंग की जानकारी स्पष्ट हो।
अत्यधिक सस्ते उत्पादों से सावधान रहें।
गुणवत्ता प्रमाणन और परीक्षण रिपोर्ट उपलब्ध हो।
स्थानीय और पारदर्शी उत्पादन इकाइयों को प्राथमिकता दें।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों की चेतावनी

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि मिलावटी या निम्न गुणवत्ता वाले घी और डेयरी उत्पाद स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक साबित हो सकते हैं। इनमें कृत्रिम वसा, रासायनिक तत्व या अन्य अवांछित पदार्थों की मिलावट की आशंका रहती है।

विशेषज्ञों के अनुसार उपभोक्ताओं को प्रमाणित उत्पादों का ही उपयोग करना चाहिए और संदेह होने पर प्रयोगशाला परीक्षण का सहारा लेना चाहिए।

प्राकृतिक खेती और पशुपालन पर जोर

कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि गाय केवल दूध का स्रोत नहीं है। गोबर और गौमूत्र का उपयोग प्राकृतिक खेती, जैविक खाद और पर्यावरण संरक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

उनका कहना है कि यदि पशुपालन को केवल दूध उत्पादन तक सीमित न रखकर समग्र कृषि व्यवस्था से जोड़ा जाए तो किसानों को अतिरिक्त आय के अवसर मिल सकते हैं और पशुओं का सम्मानजनक संरक्षण भी संभव हो सकता है।

विशेषज्ञ क्या सुझाव देते हैं?

  • पशु कल्याण आधारित डेयरी मॉडल को बढ़ावा दिया जाए।
  • दूध और घी की ट्रेसबिलिटी व्यवस्था विकसित हो।
  • मिलावट के खिलाफ कठोर कार्रवाई हो।
  • उपभोक्ताओं को जागरूक किया जाए।
  • प्राकृतिक खेती और जैविक उत्पादों को प्रोत्साहन मिले।

उपभोक्ता जागरूकता सबसे बड़ा हथियार

विशेषज्ञों का कहना है कि आज उपभोक्ता केवल स्वाद या कीमत नहीं, बल्कि उत्पाद की गुणवत्ता, नैतिकता और उत्पादन प्रक्रिया को भी महत्व देने लगे हैं। यही बदलाव भविष्य में डेयरी उद्योग को अधिक पारदर्शी और जिम्मेदार बना सकता है।

उनका मानना है कि यदि उपभोक्ता जागरूक होकर सवाल पूछेंगे, प्रमाणित उत्पादों को प्राथमिकता देंगे और पशु कल्याण को महत्व देंगे, तो बाजार भी उसी दिशा में बदलने को मजबूर होगा।

गुणवत्ता को लेकर उठ रहे रहे सवालों को नजरअंदाज ना करें

विशेषज्ञों के अनुसार घी और दूध भारतीय भोजन संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, लेकिन इनके उत्पादन और गुणवत्ता को लेकर उठ रहे सवालों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। आवश्यकता इस बात की है कि उपभोक्ता जागरूक बनें, विश्वसनीय उत्पादों का चयन करें और ऐसी व्यवस्था को समर्थन दें जिसमें पशु कल्याण, खाद्य सुरक्षा और गुणवत्ता तीनों का संतुलन बना रहे।

घी के नाम पर परोसी जा रही किसी भी तरह की मिलावट, अनियमितता या अमानवीय उत्पादन प्रक्रिया पर समय रहते रोक लगाना न केवल उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य बल्कि समाज की नैतिक जिम्मेदारी भी है।

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor