जीवन प्रबंधन गुरु पंडित विजय शंकर मेहता ने प्रवचन में जताई चिंता, कहा— संवाद से शुरू हुआ विवाद अब परिवारों को तोड़ रहा
जोधपुर। आधुनिक जीवनशैली, बदलती पारिवारिक व्यवस्था और तकनीक के बढ़ते प्रभाव के बीच आज बच्चों का पालन-पोषण माता-पिता के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। जीवन प्रबंधन गुरु पंडित विजय शंकर मेहता ने अपने प्रेरणादायी प्रवचन में इसी गंभीर विषय पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि भारतीय समाज में संतानों के संस्कार और पालन-पोषण की परंपरा तेजी से बदल गई है और यही बदलाव आज परिवारों के संकट का कारण बन रहा है।
उन्होंने कहा कि “देवियों और सज्जनों, पहले मेरी बात पर विचार कीजिए, फिर कथा में चलेंगे। क्योंकि आज हम संतानों की चर्चा करने वाले हैं और यह विषय अत्यंत गंभीर है।” उनके इस संबोधन ने उपस्थित लोगों को भावुक भी किया और सोचने पर मजबूर भी।
आदेश आधारित संस्कृति से चर्चा आधारित दौर तक
पंडित मेहता ने कहा कि करीब पचास-साठ वर्ष पहले भारतीय परिवारों में बच्चे “आदेश आधारित सिद्धांत” पर पाले जाते थे। परिवार में दादा, पिता या बड़ा भाई जैसे किसी वरिष्ठ सदस्य का निर्णय अंतिम माना जाता था। बच्चों के सामने अनुशासन सर्वोपरि था और उसी अनुशासन ने योग्य पीढ़ी तैयार की।
उन्होंने इसे अंग्रेजी में “इंस्ट्रक्शन बेस्ड थ्योरी” बताया। उनके अनुसार उस समय बच्चे आदेश का पालन करते थे, विरोध की गुंजाइश बहुत कम होती थी और इसी कारण परिवारों में मर्यादा और संस्कार मजबूत बने रहते थे।
लेकिन समय बदलने के साथ परिवारों की संरचना और सोच में भी बड़ा बदलाव आया। अब “डिस्कशन बेस्ड थ्योरी” का दौर शुरू हुआ, जहां हर बात पर चर्चा और तर्क होने लगे। पंडित मेहता ने कहा कि चर्चा करना गलत नहीं है, लेकिन इसी दौर में नई पीढ़ी के भीतर यह भ्रम पैदा हो गया कि उन्हें अपने माता-पिता से अधिक बुद्धि और समझ है। यहीं से पारिवारिक संकट की शुरुआत हुई।
संवाद से विवाद तक पहुंचा परिवार
उन्होंने कहा कि धीरे-धीरे माता-पिता और बच्चों के बीच संवाद की जगह विवाद ने ले ली। घरों में टकराव बढ़ने लगे और पीढ़ियों के बीच दूरी पैदा हो गई। “अब स्थिति यह हो गई है कि माता-पिता अपने ही बच्चों को देखकर डरने लगे हैं,” उन्होंने कहा।
उनके अनुसार पहले जब बच्चे बड़े होते थे तो पिता गर्व से भर जाता था और मां का चेहरा खुशी से खिल उठता था। लेकिन आज परिस्थितियां उलट गई हैं। अब जवान होते बच्चों को देखकर माता-पिता चिंता, तनाव और भय महसूस करने लगे हैं।
उन्होंने बेहद भावुक शब्दों में कहा, “ऐसा लगता है जैसे रोशनी अभी दो कदम ही चली थी कि किसी की नजर लग गई। दीपक को किसी की बुरी नजर लग गई हो।”
आधुनिकता की दौड़ में खोते संस्कार
पंडित मेहता ने कहा कि आज तकनीक, मोबाइल, सोशल मीडिया और भौतिकता की अंधी दौड़ ने बच्चों को परिवार और संस्कारों से दूर कर दिया है। बच्चे आभासी दुनिया में ज्यादा जी रहे हैं, जबकि परिवार के साथ उनका संवाद लगातार कमजोर हो रहा है।
उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि यदि परिवारों ने समय रहते बच्चों के साथ संबंधों को मजबूत नहीं किया, तो आने वाले समय में समाज को गंभीर सामाजिक और मानसिक संकटों का सामना करना पड़ सकता है।
उनके अनुसार बच्चों को केवल सुविधाएं देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें समय, संस्कार, अनुशासन और भावनात्मक सुरक्षा देना भी उतना ही जरूरी है।
पंडित विजय शंकर मेहता की प्रमुख बातें
- पहले परिवार “आदेश आधारित संस्कृति” पर चलते थे
- अब हर बात पर बहस और तर्क का दौर बढ़ा
- नई पीढ़ी में “हमें ज्यादा समझ है” की सोच बढ़ी
- माता-पिता और बच्चों के बीच संवाद कम हुआ
- तकनीक और सोशल मीडिया ने दूरी बढ़ाई
- बच्चों को केवल सुविधा नहीं, संस्कार भी चाहिए
समाज के लिए चेतावनी
प्रवचन के अंत में पंडित मेहता ने कहा कि बच्चों को बचाने का एकमात्र उपाय परिवारों में प्रेम, संवाद और संस्कारों की पुनर्स्थापना है। उन्होंने माता-पिता से आग्रह किया कि वे बच्चों पर केवल नियंत्रण न रखें, बल्कि उनके मित्र और मार्गदर्शक भी बनें।
उनके इस प्रवचन ने उपस्थित लोगों को गहराई से प्रभावित किया। कई श्रोता भावुक नजर आए और उन्होंने माना कि आधुनिक जीवन की भागदौड़ में परिवारों के भीतर संवाद की कमी वास्तव में एक बड़ा संकट बन चुकी है।
विशेषज्ञों का भी मानना है कि यदि समाज को मजबूत बनाना है तो परिवारों को मजबूत करना होगा और परिवार तभी मजबूत होंगे जब बच्चों को सही दिशा, संस्कार और समय मिलेगा।




