खेजड़ली की धरती से निकली वह पुकार, जिसने दुनिया को प्रकृति प्रेम का अर्थ समझाया
दिलीप कुमार पुरोहित. जोधपुर
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आज पूरी दुनिया पर्यावरण संरक्षण, जलवायु परिवर्तन और पेड़ों की सुरक्षा की बातें कर रही है। सरकारें अभियान चला रही हैं, बड़े-बड़े मंचों पर प्रकृति बचाने के संकल्प लिए जा रहे हैं, लेकिन राजस्थान की रेतीली धरती पर लगभग तीन सौ वर्ष पहले एक ऐसा इतिहास लिखा गया था, जिसने मानवता को प्रकृति के प्रति समर्पण का सबसे बड़ा संदेश दिया। यह कहानी है राजस्थान के जोधपुर क्षेत्र के खेजड़ली गांव की और उस महान महिला अमृता देवी विश्नोई की, जिन्होंने पेड़ों की रक्षा के लिए अपना सिर कटवा दिया, लेकिन प्रकृति से समझौता नहीं किया।
जब पेड़ परिवार बन गए थे
विश्नोई समाज सदियों से प्रकृति और जीवों की रक्षा को अपना धर्म मानता आया है। समाज के संस्थापक गुरु जम्भेश्वर भगवान द्वारा दिए गए 29 नियमों में पेड़ों और वन्यजीवों की रक्षा को विशेष महत्व दिया गया। यही कारण था कि राजस्थान के रेगिस्तानी क्षेत्रों में भी विश्नोई समाज ने हरियाली को बचाए रखा।
खेजड़ी का पेड़ राजस्थान के रेगिस्तान में जीवन का आधार माना जाता है। यह पेड़ पशुओं के लिए चारा देता है, मिट्टी को सुरक्षित रखता है और भीषण गर्मी में जीवन को सहारा देता है। इसलिए विश्नोई समाज के लिए खेजड़ी केवल पेड़ नहीं, बल्कि परिवार का हिस्सा थी।
सन 1730 का वह दिन जिसने इतिहास बदल दिया
साल 1730 में जोधपुर राज्य के राजा के आदेश पर सैनिक खेजड़ली गांव पहुंचे। उन्हें महलों और निर्माण कार्यों के लिए लकड़ी चाहिए थी। सैनिकों ने गांव के खेजड़ी पेड़ों को काटना शुरू कर दिया। उस समय गांव की महिला अमृता देवी विश्नोई अपने घर के कार्यों में व्यस्त थीं। जैसे ही उन्हें यह सूचना मिली, वह तुरंत घटनास्थल पर पहुंचीं।
अमृता देवी ने सैनिकों से विनती की कि इन पेड़ों को न काटा जाए। उन्होंने कहा कि ये पेड़ गांव और प्रकृति के जीवन का आधार हैं। लेकिन सैनिकों ने उनकी बात मानने से इनकार कर दिया।
“सर साठे रुख रहे तो भी सस्तो जान”
जब सैनिक नहीं माने, तब अमृता देवी ने खेजड़ी के पेड़ को गले लगा लिया। उसी समय उन्होंने वह ऐतिहासिक वाक्य कहा, जो आज भी पर्यावरण संरक्षण की सबसे बड़ी प्रेरणा माना जाता है—
“सर साठे रुख रहे तो भी सस्तो जान”
अर्थात यदि पेड़ बचाने के लिए मेरा सिर भी कट जाए तो यह सौदा सस्ता है।
सैनिकों ने उन्हें डराने की कोशिश की, लेकिन अमृता देवी अपने निर्णय से पीछे नहीं हटीं। अंततः सैनिकों ने उनका सिर काट दिया। यह केवल एक महिला की हत्या नहीं थी, बल्कि प्रकृति की रक्षा के लिए दिया गया अमर बलिदान था।
जब पूरा गांव पेड़ों से चिपक गया
अमृता देवी की शहादत के बाद उनकी तीन बेटियां—आशु, रत्नी और भागू—भी आगे आईं। उन्होंने भी पेड़ों को गले लगाया और अपने प्राण न्योछावर कर दिए। यह दृश्य देखकर पूरा विश्नोई समाज उमड़ पड़ा। गांव के बुजुर्ग, महिलाएं, युवा और बच्चे सभी एक-एक पेड़ से चिपक गए। सैनिक पेड़ काटने जाते तो पहले किसी इंसान की जान लेनी पड़ती। लेकिन लोग हटने को तैयार नहीं थे। यह संघर्ष लगातार चलता रहा और अंततः 363 लोगों ने पेड़ों की रक्षा करते हुए अपने प्राणों की आहुति दे दी। इतिहास में इसे “खेजड़ली बलिदान” के नाम से जाना जाता है।
दुनिया के पहले पर्यावरण आंदोलन की मिसाल
इतिहासकार मानते हैं कि खेजड़ली का यह आंदोलन दुनिया के शुरुआती पर्यावरण आंदोलनों में से एक था। बाद में उत्तराखंड का प्रसिद्ध “चिपको आंदोलन” भी इसी विचारधारा से प्रेरित माना गया, जहां लोग पेड़ों से चिपककर उन्हें बचाने के लिए खड़े हो गए थे। आज जब जंगल तेजी से खत्म हो रहे हैं, नदियां सूख रही हैं और जलवायु परिवर्तन पूरी दुनिया के लिए खतरा बन चुका है, तब अमृता देवी और विश्नोई समाज का यह बलिदान और भी अधिक प्रासंगिक हो जाता है।
आज भी जीवित है वह बलिदान
राजस्थान में आज भी विश्नोई समाज वन्यजीवों और पेड़ों की रक्षा के लिए पूरी निष्ठा से कार्य करता है। घायल हिरणों और अन्य जीवों की सेवा से लेकर अवैध शिकार रोकने तक, यह समाज प्रकृति संरक्षण की परंपरा को आगे बढ़ा रहा है। खेजड़ली गांव आज एक प्रेरणा स्थल बन चुका है। यहां हर वर्ष मेले और कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, जहां हजारों लोग अमृता देवी और 363 शहीदों को श्रद्धांजलि देने पहुंचते हैं।
नई पीढ़ी के लिए सबसे बड़ा संदेश
आज के दौर में लोग विकास के नाम पर पेड़ों की कटाई को सामान्य मानने लगे हैं। लेकिन खेजड़ली का इतिहास बताता है कि प्रकृति केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवन का आधार है। यदि पेड़ नहीं बचेंगे, तो आने वाली पीढ़ियां भी सुरक्षित नहीं रहेंगी। अमृता देवी विश्नोई का बलिदान हमें यह सिखाता है कि पर्यावरण संरक्षण केवल सरकारी जिम्मेदारी नहीं, बल्कि हर व्यक्ति का कर्तव्य है। जब भी कोई व्यक्ति किसी पेड़ की छांव में खड़ा हो, उसे उस मां को जरूर याद करना चाहिए जिसने पेड़ों की रक्षा के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए।
आज भी राजस्थान की हवाओं में वह संदेश गूंजता है—
“सर साठे रुख रहे तो भी सस्तो जान।”




