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Thursday, July 9, 2026, 4:10 am

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‘कुछ बाकी है’…मनीष मूंदड़ा की एक कविता में मनुष्य जीवन का सार, जहां सपने भी निशब्द हो जाते हैं…

‘कुछ अधूरी बातें मन की’…काव्य संग्रह में मनीष जी की 108 कविताएं हैं। पर ‘कुछ बाकी है’ कविता में जीवन की अपूर्णता और उम्मीद का सुंदर संगम दिखाई देता है।

दिलीप कुमार पुरोहित. जोधपुर

9783414079 diliprakhai@gmail.com

परमात्मा के अलावा इस संसार में कोई पूर्ण नहीं है। हर व्यक्ति के जीवन में कुछ न कुछ अधूरा, अनकहा और अप्राप्त रह जाता है। भारतीय फिल्म निर्माता, लेखक, कवि, चित्रकार और फोटोग्राफर मनीष मूंदड़ा की कविता ‘जो बाकी है’ इसी जीवन-सत्य को अत्यंत सहज और संवेदनशील शब्दों में अभिव्यक्त करती है। उनके चर्चित काव्य संग्रह ‘कुछ अधूरी बातें मन की’ में शामिल यह कविता अधूरे सपनों, रिश्तों, जिम्मेदारियों और जीवन के निरंतर प्रवाह की कहानी कहती है।

कविता में कवि स्वीकार करता है कि कुछ कार्य अभी पूरे होने बाकी हैं, कुछ रूठों को मनाना बाकी है और कुछ सपनों को मंजिल तक पहुंचाना शेष है। यह रचना निराशा नहीं, बल्कि आशा, संघर्ष और आगे बढ़ते रहने की प्रेरणा देती है। अंतिम पंक्ति— “थमूंगा नहीं मैं, देखो मुझमें अभी थोड़ी सांस बाकी है”— कविता की आत्मा है, जो जीवन के प्रति अटूट जिजीविषा का संदेश देती है।

मनीष मूंदड़ा, दृश्यम फिल्म्स के संस्थापक तथा मसान, न्यूटन, धनक और कदवी हवा जैसी सार्थक फिल्मों के निर्माता रहे हैं। उनकी यह कविता भी उनके सिनेमा की तरह संवेदनशील, मानवीय और गहरे जीवनबोध से परिपूर्ण है।

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor