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Thursday, July 9, 2026, 12:48 am

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राजस्थानी भाषा हमारी संस्कृति की आत्मा, इसे संवैधानिक मान्यता मिलनी ही चाहिए: राजवीर सिंह चकलोई

राजस्थानी लेखिका संस्थान के वार्षिक उत्सव में प्रदेशभर के साहित्यकारों और लेखिकाओं का संगम, कवि सत्यदेव संवितेंद्र के गीतों ने बांधा समां, भाषा-संस्कृति के संरक्षण पर हुआ मंथन

दिलीप कुमार पुरोहित. जयपुर

राजधानी जयपुर के झालाना संस्थानिक क्षेत्र स्थित एडल्ट एजुकेशन संस्थान परिसर में आयोजित राजस्थानी लेखिका संस्थान (रालेस) का वार्षिक उत्सव साहित्य, संस्कृति और राजस्थानी भाषा के संरक्षण के संकल्प का सशक्त मंच बनकर उभरा। प्रदेश के विभिन्न जिलों से आईं सौ से अधिक लेखिकाओं, साहित्यकारों, कवियों, गीतकारों, इतिहासकारों तथा भाषा प्रेमियों की उपस्थिति ने कार्यक्रम को गरिमामय बना दिया।

 

पूरे आयोजन के दौरान राजस्थानी भाषा की समृद्ध परंपरा, उसकी साहित्यिक विरासत, लोक संस्कृति तथा नई पीढ़ी में मातृभाषा के प्रति जागरूकता बढ़ाने जैसे विषय प्रमुखता से चर्चा के केंद्र में रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार, सुप्रसिद्ध कवि, लेखक और गीतकार सत्यदेव संवितेंद्र ने की। मुख्य अतिथि के रूप में प्रसिद्ध गज़लकार एवं भारतीय राजस्व सेवा (आईआरएस) के अधिकारी डॉ. दिनेश कुमार सारंग उपस्थित रहे। बीज वक्तव्य इतिहासविद, मोटिवेशनल वक्ता एवं लोकप्रिय यूट्यूबर राजवीर सिंह चकलोई ने दिया। कार्यक्रम का शुभारंभ राजस्थानी लेखिका संस्थान की अध्यक्ष एवं वरिष्ठ कवयित्री डॉ. शारदा कृष्ण के स्वागत उद्बोधन से हुआ। संचालन कवयित्री मोनिका गौड़ (बीकानेर) ने प्रभावशाली ढंग से किया।

राजस्थानी भाषा के संरक्षण का बना मंच

वार्षिक उत्सव केवल एक साहित्यिक आयोजन नहीं रहा, बल्कि यह राजस्थानी भाषा के भविष्य, उसकी संवैधानिक मान्यता तथा सांस्कृतिक पहचान को लेकर गंभीर विमर्श का अवसर भी बना। वक्ताओं ने कहा कि राजस्थानी भाषा का साहित्य अत्यंत समृद्ध है और इसे नई पीढ़ी तक पहुँचाना समय की आवश्यकता है। लोक परंपराओं, लोकगीतों, लोककथाओं तथा लोकसंस्कृति को सहेजने में साहित्यकारों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।

सत्यदेव संवितेंद्र ने गीत से बांधा समां

जैसलमेर के मूल निवासी और सुप्रसिद्ध कवि, लेखक एवं गीतकार सत्यदेव संवितेंद्र ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन के दौरान राजस्थानी गीत की प्रस्तुति देकर उपस्थित श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। उनके मधुर स्वर और भावपूर्ण प्रस्तुति ने पूरे सभागार में उत्साह और आत्मीयता का वातावरण निर्मित कर दिया। गीत समाप्त होने पर सभागार देर तक तालियों की गड़गड़ाहट से गूंजता रहा।

अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि राजस्थानी भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि राजस्थान की सांस्कृतिक चेतना की अभिव्यक्ति है। साहित्य समाज का दर्पण होता है और साहित्यकारों का दायित्व है कि वे अपनी भाषा और संस्कृति को आने वाली पीढ़ियों तक सशक्त रूप में पहुँचाएँ।

राजवीर सिंह चकलोई ने रखे प्रभावी विचार

बीज वक्तव्य देते हुए प्रसिद्ध इतिहासविद एवं यूट्यूबर राजवीर सिंह चकलोई ने राजस्थानी भाषा के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और सामाजिक महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि राजस्थानी केवल एक भाषा नहीं, बल्कि राजस्थान की जीवन शैली, लोक परंपराओं, सांस्कृतिक मूल्यों और सामाजिक पहचान की आत्मा है।

उन्होंने कहा कि राजस्थानी भाषा का साहित्य सदियों पुराना है और इसकी समृद्ध परंपरा विश्व स्तर पर सम्मान की पात्र है। इसलिए इसे संविधान की आठवीं अनुसूची में स्थान मिलना चाहिए। उन्होंने कहा कि भाषा को सम्मान देना केवल साहित्य का प्रश्न नहीं, बल्कि सांस्कृतिक अस्मिता का विषय भी है।

राजवीर सिंह ने युवाओं से मातृभाषा में पढ़ने, लिखने और सृजन करने का आह्वान करते हुए कहा कि जब तक नई पीढ़ी अपनी भाषा से जुड़ी नहीं रहेगी, तब तक सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखना कठिन होगा।

डॉ. दिनेश कुमार सारंग ने साहित्य की भूमिका बताई

मुख्य अतिथि डॉ. दिनेश कुमार सारंग ने अपने संबोधन में कहा कि साहित्य समाज को दिशा देने का कार्य करता है। भाषा किसी भी समाज की पहचान होती है और राजस्थानी जैसी समृद्ध भाषा का संरक्षण हम सभी का दायित्व है। उन्होंने साहित्यकारों की रचनात्मक भूमिका की सराहना करते हुए कहा कि लेखन समाज में संवेदनशीलता, जागरूकता और सकारात्मक परिवर्तन का माध्यम बनता है।

डॉ. शारदा कृष्ण ने दी संस्थान की जानकारी

राजस्थानी लेखिका संस्थान की अध्यक्ष एवं प्रसिद्ध कवयित्री डॉ. शारदा कृष्ण ने स्वागत भाषण में संस्थान की गतिविधियों की विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने बताया कि संस्थान वर्षों से महिला लेखिकाओं को मंच प्रदान कर रहा है तथा राजस्थानी साहित्य के विकास, प्रकाशन, गोष्ठियों, कवि सम्मेलनों और साहित्यिक संवादों के माध्यम से भाषा के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

उन्होंने कहा कि साहित्य समाज को जोड़ने का माध्यम है और महिलाओं की रचनात्मक प्रतिभा को उचित मंच उपलब्ध कराना संस्थान की प्राथमिकता है।

मोनिका गौड़ का प्रभावी संचालन

कार्यक्रम का संचालन बीकानेर की कवयित्री मोनिका गौड़ ने अत्यंत सहज, प्रभावशाली और साहित्यिक शैली में किया। उन्होंने विभिन्न वक्ताओं और साहित्यकारों का परिचय रोचक ढंग से प्रस्तुत किया तथा पूरे कार्यक्रम को व्यवस्थित और गरिमामय बनाए रखा।

नखता राम चांधन ने बढ़ाई आयोजन की गरिमा

जैसलमेर से आए साहित्यकार नखता राम चांधन की उपस्थिति भी कार्यक्रम का विशेष आकर्षण रही। उन्होंने साहित्यकारों से संवाद करते हुए राजस्थानी साहित्य के प्रचार-प्रसार और लोक परंपराओं के संरक्षण की आवश्यकता पर बल दिया।

प्रदेशभर से उमड़े साहित्यकार

कार्यक्रम में जयपुर, जोधपुर, बीकानेर, जैसलमेर, नागौर, अजमेर, पाली, सीकर, चूरू, झुंझुनूं, बाड़मेर सहित प्रदेश के विभिन्न जिलों से आईं सौ से अधिक लेखिकाओं तथा अनेक प्रतिष्ठित साहित्यकारों ने सहभागिता निभाई। इस अवसर पर कविता पाठ, साहित्यिक संवाद, विचार-विमर्श और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के माध्यम से राजस्थानी भाषा की विविधता और समृद्धि का परिचय मिला।

भाषा, साहित्य और संस्कृति के संरक्षण का संकल्प

कार्यक्रम के अंत में वक्ताओं ने एक स्वर में कहा कि राजस्थानी भाषा के संरक्षण और संवर्धन के लिए समाज, साहित्यकारों, शिक्षकों, युवा पीढ़ी तथा सरकारी संस्थाओं को मिलकर कार्य करना होगा। विद्यालयों और महाविद्यालयों में राजस्थानी भाषा के अध्ययन को बढ़ावा देने, नई पीढ़ी को मातृभाषा से जोड़ने तथा साहित्यिक गतिविधियों का विस्तार करने पर भी जोर दिया गया।

साहित्यकारों ने विश्वास व्यक्त किया कि ऐसे आयोजन राजस्थानी भाषा और साहित्य को नई ऊर्जा प्रदान करेंगे तथा भविष्य में इसके संरक्षण और संवर्धन के लिए व्यापक जन-जागरण का आधार बनेंगे। अंत में सभी अतिथियों, प्रतिभागियों एवं आयोजकों का आभार व्यक्त किया गया। पूरे आयोजन ने यह संदेश दिया कि राजस्थानी भाषा केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि राजस्थान की गौरवशाली सांस्कृतिक विरासत की जीवंत पहचान है, जिसके संरक्षण और संवर्धन के लिए सामूहिक प्रयास समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor