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Thursday, July 9, 2026, 12:22 am

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Lifestyle

कविता :  डॉ. राजगोपाल करवा, सोलापुर

कवि : डॉ. राजगोपाल करवा, सोलापुर

“भूली-बिसरी कुछ यादें…”

भूली-बिसरी कुछ यादें,
कुछ फसाने याद आए,
तुम याद आए और तुम्हारे साथ,
अपने वो जमाने याद आए।

चंद शरारतें जो की थी मैंने,
उन पर तेरी वो प्रतिक्रिया,
और हल्का-सा मुस्कुराना,
आज बैठा हूँ तो याद आए।

कभी-कभी जो नाराज़गी के पल,
हमने साथ गुज़ारे थे,
अब लगता है शायद वो बेवजह थे,
अब उनके मायने समझ आने लगे हैं।

बिना वजह हँसने का सिलसिला,
सालों तक यूँ ही चलता रहा,
उस छोटे-छोटे आनंद का महत्व,
अब दिल को छूने लगा है।

सालों तक मेरे आने की राह तकती,
घर में चुपचाप रहती थी,
पर तेरे दिल की वो परेशानियाँ,
अब मुझे उसका दर्द महसूस होने लगा हैं।

एक हल्की-सी मुस्कान से,
प्यार भरी नज़रों से देखना,
तेरा वो अपनापन भरा अंदाज़,
अब बहुत याद आने लगा है।

दिन तो तेरे बिना यूँ ही गुजर रहे हैं,
पर अब भी लगता है
तेरी परछाई मेरे साथ है,
तेरा न होना ही अब होना है,
जिसे मुझे स्वीकारना पड़ रहा है।

“कुछ लोग दूर होकर भी दूर नहीं होते,
यादों में रहकर भी दिल से जुदा नहीं होते।
बस उनकी यादों के साए में ही
जिंदगी हल्की सी होकर गुजर जाती है”

इसलिए ….

साथ रहतै हुई, साथ चलना सीखो
यादें होने से पहले जीना सीखो
समझना और समझाना
यही तो रिस्तों की खूबसूरती होती है
बस…. यही तो जिंदादिल जिंदगी होती है।

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor