दो दशक की सीएलजी व्यवस्था पर नई बहस, क्या सामुदायिक पुलिसिंग अपने मूल उद्देश्य से भटक गई है? पिछले दो दशक में प्रदेश में सैकड़ों दंगे हुए, हजारों बलात्कार हुए और सीएलजी की भूमिका कैसी रही यह सर्वविदित है। अब जबकि इसमें राजनीतिक चेहरे भी शामिल किए जाएंगे तो क्या आम आदमी के साथ न्याय हो पाएगा?…आज इसी पर राइजिंग भास्कर की विशेष रिपोर्ट।
दिलीप कुमार पुरोहित. जयपुर
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राजस्थान सरकार ने पुलिस सीएलजी (कम्युनिटी लाइजन ग्रुप) के गठन से जुड़े लगभग 18 वर्ष पुराने प्रावधान में संशोधन कर राजनीतिक दलों के पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं को भी सीएलजी का सदस्य बनाए जाने का रास्ता खोल दिया है। सरकार का तर्क है कि इससे अधिक लोगों की भागीदारी सुनिश्चित होगी, जबकि आलोचकों का कहना है कि इससे सीएलजी की निष्पक्षता प्रभावित हो सकती है। इसी निर्णय ने पिछले दो दशकों से संचालित सीएलजी व्यवस्था की उपयोगिता, प्रभावशीलता और उद्देश्य पर नई बहस छेड़ दी है। गौरतलब है कि प्रदेश में पिछले दो दशक में सैकड़ों दंगे हुए और हजारों बलात्कार हुए। अनेक मामलों में मानवाधिकारों का उल्लंघन हुआ। क्या अब नई व्यवस्था से आम आदमी के साथ न्याय हो पाएगा? फिर से एक नई बहस का मुद्दा है।
क्या है नया संशोधन?
एक अखबार में प्रकाशित समाचार के अनुसार, राजस्थान सरकार ने राजस्थान पुलिस अधिनियम, 2008 के तहत लागू उस शर्त को हटा दिया है, जिसमें राजनीतिक दलों अथवा उनसे जुड़े संगठनों के पदाधिकारियों एवं सदस्यों को सीएलजी का सदस्य बनाए जाने पर रोक थी। संशोधन के बाद अब पुलिस अधीक्षक और संबंधित थाना प्रभारी की अनुशंसा पर राजनीतिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्तियों को भी सीएलजी में शामिल किया जा सकेगा। अनुमान है कि राज्यभर के एक हजार से अधिक थानों और पुलिस इकाइयों में लगभग 75 हजार से अधिक सदस्य इस व्यवस्था से जुड़े हो सकते हैं।
सीएलजी का मूल उद्देश्य क्या था?
सीएलजी अर्थात कम्युनिटी लाइजन ग्रुप की अवधारणा पुलिस और आम जनता के बीच विश्वास कायम करने के लिए विकसित की गई थी।
इसका उद्देश्य था—
- स्थानीय विवादों का प्रारंभिक स्तर पर समाधान।
- सांप्रदायिक तनाव की पूर्व सूचना देना।
- कानून-व्यवस्था बनाए रखने में सहयोग।
- पुलिस और नागरिकों के बीच संवाद स्थापित करना।
- अपराध रोकथाम में सामाजिक भागीदारी बढ़ाना।
यानी यह व्यवस्था पुलिस की समानांतर संस्था नहीं बल्कि सहयोगी तंत्र के रूप में बनाई गई थी।
दो दशक बाद सबसे बड़ा सवाल
करीब दो दशक बाद सबसे बड़ा प्रश्न यह उठ रहा है कि क्या सीएलजी अपने उद्देश्य में सफल रही? कई सामाजिक कार्यकर्ताओं, पूर्व पुलिस अधिकारियों और नागरिक संगठनों का मानना है कि अधिकांश स्थानों पर सीएलजी समितियाँ केवल औपचारिक बैठकों तक सीमित होकर रह गईं। नियमित बैठकें नहीं होना, निष्क्रिय सदस्य, जनसमस्याओं पर प्रभावी कार्रवाई का अभाव और सीमित सामाजिक प्रतिनिधित्व जैसी शिकायतें वर्षों से सामने आती रही हैं।
क्या सीएलजी आम आदमी तक पहुंच पाई?
सीएलजी का उद्देश्य आम नागरिक की आवाज पुलिस तक पहुंचाना था। लेकिन कई स्थानों पर यह धारणा बनी कि समितियों में वही लोग शामिल होते रहे जिनका स्थानीय प्रशासन और पुलिस से पहले से संपर्क था।
इस कारण यह प्रश्न समय-समय पर उठता रहा कि—
- क्या मजदूर, किसान, गरीब, महिलाएं और युवाओं की पर्याप्त भागीदारी रही?
- क्या झुग्गी बस्तियों, ग्रामीण क्षेत्रों और कमजोर वर्गों की समस्याएं प्राथमिकता बन सकीं?
- क्या सीएलजी वास्तव में समाज का प्रतिनिधित्व करती रही?
इन प्रश्नों पर समय-समय पर सार्वजनिक चर्चा होती रही है।
वीआईपी संस्कृति का आरोप
कई सामाजिक संगठनों का आरोप रहा है कि कुछ स्थानों पर सीएलजी सदस्यता सामाजिक सेवा से अधिक प्रतिष्ठा का माध्यम बन गई। आलोचकों का कहना है कि कुछ समितियों में सक्रिय जनप्रतिनिधित्व के बजाय प्रभावशाली व्यक्तियों का वर्चस्व दिखाई दिया। हालांकि यह स्थिति पूरे राज्य में समान रही हो, इसका कोई आधिकारिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है। विभिन्न जिलों में कार्यप्रणाली अलग-अलग रही है।
क्या अपराध रोकने में मिली सफलता?
राजस्थान में पिछले दो दशकों के दौरान—
- महिलाओं के विरुद्ध अपराध,
- साम्प्रदायिक तनाव,
- दंगे,
- सड़क अपराध,
- साइबर अपराध,
- हत्या एवं अन्य गंभीर अपराध
जैसी घटनाएं लगातार सामने आती रही हैं। हालांकि इन घटनाओं के लिए केवल सीएलजी को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता, क्योंकि अपराध नियंत्रण का प्राथमिक दायित्व पुलिस और प्रशासन का होता है। फिर भी विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि सीएलजी अधिक सक्रिय और प्रभावी होती, तो स्थानीय स्तर पर कई तनावपूर्ण परिस्थितियों की समय रहते जानकारी पुलिस तक पहुंच सकती थी।
राजनीतिक सदस्यों की एंट्री पर उठ रहे सवाल
नए संशोधन के बाद सबसे बड़ा विवाद इसी बात को लेकर है कि क्या राजनीतिक दलों से जुड़े लोगों की सदस्यता से समिति की निष्पक्षता प्रभावित होगी?
आलोचकों की आशंकाएं हैं—
- स्थानीय विवादों में राजनीतिक प्रभाव बढ़ सकता है।
- विरोधी विचारधारा वाले नागरिक स्वयं को असहज महसूस कर सकते हैं।
- समिति की स्वतंत्र छवि प्रभावित हो सकती है।
- पुलिस पर अप्रत्यक्ष राजनीतिक दबाव बढ़ने की आशंका व्यक्त की जा रही है।
हालांकि यह आशंकाएं हैं; इनका प्रभाव भविष्य में समितियों के वास्तविक संचालन पर निर्भर करेगा।
सरकार का संभावित पक्ष
सरकार का दृष्टिकोण यह हो सकता है कि लोकतंत्र में किसी व्यक्ति को केवल राजनीतिक विचारधारा के आधार पर सामाजिक भागीदारी से वंचित नहीं किया जाना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति सामाजिक रूप से सक्रिय है और उसके विरुद्ध कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है, तो उसे भी सीएलजी में योगदान देने का अवसर मिलना चाहिए।संशोधित प्रावधानों में महिलाओं, अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के प्रतिनिधित्व पर भी विशेष बल दिया गया है।
विशेषज्ञ क्या कहते हैं?
सामुदायिक पुलिसिंग पर कार्य करने वाले विशेषज्ञ मानते हैं कि किसी भी सीएलजी की सफलता केवल सदस्यता से तय नहीं होती।
उसकी सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि—
- बैठकें नियमित हों।
- पुलिस सुझावों पर कार्रवाई करे।
- आम नागरिकों की शिकायतें सुनी जाएं।
- समिति में विविध सामाजिक वर्गों का संतुलित प्रतिनिधित्व हो।
- पारदर्शिता और जवाबदेही बनी रहे।
क्या सुधार की जरूरत है?
विशेषज्ञों के अनुसार सीएलजी को अधिक प्रभावी बनाने के लिए—
- सदस्य चयन की पारदर्शी प्रक्रिया।
- निश्चित कार्यकाल।
- वार्षिक प्रदर्शन मूल्यांकन।
- बैठकों की सार्वजनिक कार्यवाही।
- ऑनलाइन शिकायत एवं सुझाव प्रणाली।
- युवाओं और महिलाओं की अधिक भागीदारी।
- सामाजिक कार्यकर्ताओं, शिक्षकों, चिकित्सकों और विधि विशेषज्ञों को प्राथमिकता।
जैसे सुधार उपयोगी हो सकते हैं।
खानापूर्ति का मंच बनकर रह गई है सीएलजी, बदलाव की जरूरत
राजस्थान सरकार द्वारा सीएलजी नियमों में किया गया संशोधन केवल सदस्यता का परिवर्तन नहीं, बल्कि सामुदायिक पुलिसिंग की दिशा में एक महत्वपूर्ण नीतिगत बदलाव माना जा रहा है। यह निर्णय कितना सफल होगा, इसका आकलन इसके वास्तविक क्रियान्वयन के बाद ही संभव होगा। वहीं, पिछले दो दशकों के अनुभव यह संकेत देते हैं कि केवल समिति का गठन पर्याप्त नहीं है। यदि सीएलजी को वास्तव में पुलिस और जनता के बीच प्रभावी सेतु बनाना है, तो उसे औपचारिक बैठकों की व्यवस्था से आगे बढ़ाकर सक्रिय, जवाबदेह और पारदर्शी जनभागीदारी मंच के रूप में विकसित करना होगा। राजनीतिक भागीदारी से इस व्यवस्था को नई ऊर्जा मिलेगी या निष्पक्षता पर नए प्रश्न खड़े होंगे, इसका उत्तर आने वाले समय में समितियों के कार्य और उनके परिणाम ही देंगे।

