पत्रकारिता की लक्ष्मणरेखा… जब आतंकवाद से लड़ाई चल रही हो, तब मीडिया की भूमिका कहाँ तक और पुलिस की जिम्मेदारी कहाँ से शुरू होती है?
विशेष रिपोर्ट | दिलीप कुमार पुरोहित
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13 मई 2008। जरा आपका ध्यान पीछे की ओर ले चलते हैं। जब जयपुर 13 मई 2008 (मंगलवार) को लगभग 7:15 बजे से 7:45 बजे के बीच दहल उठा। जयपुर का परकोटा क्षेत्र (जौहरी बाजार, बड़ी चौपड़, त्रिपोलिया बाजार, चांदपोल सहित कई स्थान) दहल उठे। अब हमारी बात यहीं से शुरू होती है। आतंकवाद किसी एक व्यक्ति, शहर या राज्य पर हमला नहीं होता, बल्कि वह पूरे राष्ट्र की सुरक्षा, लोकतांत्रिक व्यवस्था और नागरिकों के मनोबल पर सीधा प्रहार होता है। जब किसी शहर में बम विस्फोट होता है या आतंकवादी हमला होता है, तब पूरा सरकारी तंत्र सक्रिय हो जाता है। पुलिस, एटीएस, एनआईए, खुफिया एजेंसियां और प्रशासन दिन-रात एक कर अपराधियों तक पहुंचने में जुट जाते हैं। इसी समय मीडिया भी घटनास्थल पर मौजूद होता है और जनता तक जानकारी पहुंचाने का दायित्व निभाता है।
लेकिन यहीं से एक महत्वपूर्ण प्रश्न जन्म लेता है—क्या पत्रकार केवल सूचना देने तक सीमित रहे, या वह पुलिस की तरह “समानांतर पड़ताल” भी करे? यह प्रश्न नया नहीं है। वर्षों से भारतीय पत्रकारिता में यह बहस समय-समय पर उठती रही है। विशेषकर बड़े आतंकी हमलों के बाद कुछ मीडिया संस्थानों ने अपनी स्वतंत्र खोजबीन को “समानांतर पड़ताल” जैसे शीर्षकों के साथ प्रस्तुत किया। एक लीडिंग न्यूज पेपर ने जयपुर बम धमाकों के बाद अपने रिपोर्टर्स को फील्ड में उतार दिया और ऐसा व्यवहार किया जैसे वे पुलिस के समानांतर एजेंसी हो। क्या यह भारतीय संविधान में प्रेस को दिए अधिकारों की लक्ष्मण रेखा का उल्लंघन है? या खोजी पत्रकारिता के नाम पर इसे इजाजत मिलनी चाहिए। आज से कुछ वर्ष पहले हमने यही सवाल एक पूर्व डीजीपी राजस्थान के समक्ष रखा था, मगर उन्होंने भी उस लीडिंग न्यूज पेपर की इस कथित खोजी पत्रकारिता का सवाल हंसकर टाल दिया था। अब हमारा यही सवाल आम पाठक से है कि क्या ऐसे आतंकवादी हमलों में किसी अखबार के रिपोर्टर्स को समानांतर पड़ताल की इजाजत दी जानी चाहिए। वो भी तब जबकि मीडिया और कानून दो अलग-अलग विषय हैं और दोनों का दायरा अलग है। इससे पत्रकारिता की भूमिका, उसकी सीमाओं और कानूनी दायित्वों पर गंभीर चर्चा होनी चाहिए।
पत्रकारिता और जांच एजेंसी—दोनों की भूमिका अलग
लोकतंत्र में पुलिस और मीडिया दोनों आवश्यक संस्थाएं हैं, लेकिन दोनों के अधिकार और जिम्मेदारियां अलग-अलग हैं। पुलिस का उद्देश्य अपराध की जांच कर साक्ष्य जुटाना, आरोपियों की गिरफ्तारी करना और न्यायालय में अपराध सिद्ध करना होता है। वहीं पत्रकारिता का उद्देश्य जनता को तथ्यपरक, सत्यापित और निष्पक्ष सूचना उपलब्ध कराना होता है। यहीं सबसे बड़ा अंतर है। पत्रकार किसी व्यक्ति को अपराधी घोषित नहीं कर सकता। पत्रकार किसी संदिग्ध से पूछताछ नहीं कर सकता। पत्रकार किसी का मोबाइल जब्त नहीं कर सकता। पत्रकार किसी के घर की तलाशी नहीं ले सकता। पत्रकार किसी को हिरासत में नहीं ले सकता। ये सभी अधिकार केवल कानून द्वारा अधिकृत एजेंसियों के पास हैं।
तो पत्रकार क्या कर सकता है?
घटनास्थल का निरीक्षण। प्रत्यक्षदर्शियों से बातचीत। सार्वजनिक दस्तावेजों का अध्ययन। आरटीआई से जानकारी प्राप्त करना। स्वतंत्र तथ्य-जांच (Fact Verification) करना। सरकारी दावों पर प्रश्न उठाना। पीड़ितों और समाज की आवाज बनना।
पत्रकार क्या नहीं कर सकता?
किसी को गिरफ्तार करना। तलाशी लेना। इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य जब्त करना। पूछताछ के लिए मजबूर करना। जांच एजेंसी का स्थान लेना। राष्ट्रीय सुरक्षा को प्रभावित करने वाली गोपनीय जानकारी सार्वजनिक करना।
“समानांतर पड़ताल” आखिर है क्या?
यह शब्द सुनने में आकर्षक लगता है, लेकिन इसका अर्थ स्पष्ट होना चाहिए। यदि कोई पत्रकार घटनास्थल पर जाकर तथ्यों का सत्यापन करता है, प्रत्यक्षदर्शियों से बात करता है, दस्तावेज जुटाता है और जनता के सामने सत्य प्रस्तुत करता है, तो यह खोजी पत्रकारिता है। लेकिन यदि वही प्रक्रिया अपराधियों की तलाश, संदिग्धों की पहचान, जांच की दिशा तय करने और अपराध सिद्ध करने तक पहुंच जाती है, तो वह पत्रकारिता नहीं बल्कि आपराधिक जांच के क्षेत्र में प्रवेश करने लगती है। यहीं से विवाद शुरू होता है। खोजी पत्रकारिता लोकतंत्र की ताकत है। यह भी उतना ही सत्य है कि यदि खोजी पत्रकारिता नहीं होती तो अनेक बड़े घोटाले शायद कभी सामने नहीं आते। भारत में अनेक मामलों में मीडिया ने—
- भ्रष्टाचार उजागर किया।
- प्रशासनिक लापरवाही सामने लाई।
- मानवाधिकार उल्लंघनों को प्रकाशित किया।
- संगठित अपराधों पर सवाल उठाए।
दुनिया में भी वाटरगेट कांड से लेकर पनामा पेपर्स तक खोजी पत्रकारिता ने इतिहास बदल दिया। इसलिए खोजी पत्रकारिता लोकतंत्र का आवश्यक स्तंभ है। लेकिन आतंकवाद अलग विषय है। आतंकवादी हमलों में परिस्थितियां सामान्य अपराधों जैसी नहीं होतीं। यह राष्ट्रीय सुरक्षा का विषय होता है। यदि मीडिया जल्दबाजी में—
- किसी व्यक्ति को आतंकवादी घोषित कर दे,
- किसी एजेंसी की कार्रवाई लाइव दिखा दे,
- किसी गुप्त अभियान का खुलासा कर दे,
- या किसी अपुष्ट सूचना को प्रकाशित कर दे,
तो इससे जांच भी प्रभावित हो सकती है और निर्दोष व्यक्ति की प्रतिष्ठा भी नष्ट हो सकती है। इसलिए आतंकवाद संबंधी रिपोर्टिंग में अतिरिक्त जिम्मेदारी अपेक्षित होती है।
आतंकवादी घटनाओं की रिपोर्टिंग में पत्रकार की जिम्मेदारी
केवल पुष्ट जानकारी प्रकाशित करें। आधिकारिक पुष्टि और स्वतंत्र सत्यापन दोनों का संतुलन रखें। अफवाहों से बचें। पीड़ितों की निजता का सम्मान करें। सुरक्षा अभियानों का सीधा प्रसारण करने से बचें। ऐसी जानकारी प्रकाशित न करें जिससे आतंकियों या जांच पर प्रभाव पड़े। क्या केवल सरकारी ब्रीफिंग ही पर्याप्त है? इसका उत्तर भी “नहीं” है। यदि मीडिया केवल सरकारी प्रेस नोट छापने लगे तो लोकतंत्र कमजोर हो जाएगा। पत्रकारिता का उद्देश्य सत्ता से प्रश्न पूछना भी है। यदि जांच में देरी हो रही है—यदि सुरक्षा व्यवस्था में चूक हुई है—यदि खुफिया तंत्र विफल रहा—यदि पीड़ितों को न्याय नहीं मिल रहा—तो मीडिया को इन प्रश्नों को जनता के सामने लाना चाहिए। यही खोजी पत्रकारिता का दायित्व है।
सोशल मीडिया ने बढ़ाई चुनौती
आज सबसे बड़ी समस्या गति की हो गई है। पहले अखबार अगले दिन प्रकाशित होते थे। आज मोबाइल पर दस सेकंड में सूचना पूरी दुनिया में फैल जाती है। ऐसे में कई बार अपुष्ट सूचनाएं भी समाचार बन जाती हैं। फिर उनका खंडन कभी उतनी तेजी से नहीं पहुंचता। इस कारण पत्रकार की जिम्मेदारी पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है। क्या पत्रकार पुलिस से आगे निकलने की होड़ में है? डिजिटल युग में “सबसे पहले खबर” देने की प्रतिस्पर्धा बढ़ी है। यहीं सबसे बड़ा खतरा है। जब प्रतिस्पर्धा सत्य से बड़ी हो जाती है तो पत्रकारिता कमजोर पड़ने लगती है। इसलिए प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि कौन पहले पहुंचा। प्रश्न यह होना चाहिए कि कौन सही जानकारी लेकर पहुंचा।
खोजी पत्रकारिता बनाम आपराधिक जांच
| खोजी पत्रकारिता | आपराधिक जांच |
| जनता को सूचना देना | अपराध सिद्ध करना |
| तथ्य जुटाना | साक्ष्य एकत्र करना |
| प्रश्न पूछना | पूछताछ करना |
| रिपोर्ट प्रकाशित करना | चार्जशीट प्रस्तुत करना |
| जनहित सर्वोपरि | न्यायिक प्रक्रिया सर्वोपरि |
भविष्य की पत्रकारिता कैसी हो?
विशेषज्ञ मानते हैं कि आने वाले समय की पत्रकारिता को तीन सिद्धांत अपनाने होंगे—
पहला—सत्यापन।
दूसरा—संयम।
तीसरा—जवाबदेही।
समानांतर पड़ताल के नाम पर दादागिरी खत्म हो
यदि मीडिया इन तीन सिद्धांतों पर कायम रहता है तो वह लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति बना रहेगा। आतंकवादी घटनाओं के बाद “समानांतर पड़ताल” शब्द चाहे जितना आकर्षक लगे, लेकिन पत्रकारिता और पुलिस की संवैधानिक भूमिकाओं के बीच की रेखा कभी धुंधली नहीं होनी चाहिए। खोजी पत्रकारिता लोकतंत्र की आत्मा है, परंतु आपराधिक जांच राज्य का विधिक दायित्व है। पत्रकार का कार्य सत्ता, प्रशासन और जांच एजेंसियों से सवाल पूछना, तथ्यों का सत्यापन करना और जनता को प्रमाणिक जानकारी देना है; जबकि अपराधियों को पकड़ना, साक्ष्य जुटाना और न्यायालय में अभियोजन चलाना पुलिस और अन्य वैधानिक एजेंसियों का कार्य है। इसलिए आवश्यकता “समानांतर जांच” की नहीं, बल्कि सशक्त, निर्भीक, जिम्मेदार और तथ्यपरक खोजी पत्रकारिता की है। यही पत्रकारिता लोकतंत्र को मजबूत करती है, नागरिकों का विश्वास बनाए रखती है और राष्ट्रीय सुरक्षा के हितों का सम्मान करते हुए सत्ता की जवाबदेही भी सुनिश्चित करती है। ऐसी संतुलित पत्रकारिता ही स्वतंत्र प्रेस की वास्तविक पहचान है।

