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जैन चातुर्मास और पर्युषण : जैन धर्म की सभी परम्पराओं का एक समग्र दृष्टिकोण

लेखक : अनिल के. जैन

9810046108. जोधपुर

जैन धर्म मूलतः अहिंसा, आत्म-संयम, तपस्या, अपरिग्रह, क्षमा और आत्म-शुद्धि का धर्म है। इसलिए जैन पर्व केवल बाहरी उत्सव या उल्लास के अवसर नहीं, बल्कि आत्मचिंतन, आत्मनिरीक्षण और आंतरिक परिवर्तन के पवित्र अवसर हैं। जैन धार्मिक परम्परा में चातुर्मास, श्वेताम्बर परम्परा का पर्युषण महापर्व तथा दिगम्बर परम्परा का दशलक्षण महापर्व अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। यद्यपि श्वेताम्बर मूर्तिपूजक, स्थानकवासी, तेरापंथी, दिगम्बर तथा अन्य जैन परम्पराओं की धार्मिक विधियों और आचार-पद्धतियों में कुछ भिन्नताएँ हैं, तथापि इन सभी का मूल उद्देश्य समान है—कषायों पर नियंत्रण, कर्म-बंधन को कम करना, सद्गुणों का विकास, आत्मा की शुद्धि तथा अंततः मोक्ष की ओर अग्रसर होना।

जैन चातुर्मास: पवित्र वर्षाकालीन प्रवास

‘चातुर्मास’ का शाब्दिक अर्थ है—चार महीनों की अवधि। यह मुख्यतः भारत के वर्षाकाल से संबंधित है। जैन साधु-साध्वियाँ सामान्यतः एक स्थान से दूसरे स्थान तक पैदल विहार करते हैं, किंतु वर्षा ऋतु में वे एक निश्चित स्थान पर निवास करते हैं। इसे वर्षावास अथवा वर्षायोग भी कहा जाता है। इस परम्परा का मूल आधार अहिंसा है। वर्षा ऋतु में वनस्पति तेजी से विकसित होती है तथा कीट-पतंगों और असंख्य सूक्ष्म जीवों की उत्पत्ति बढ़ जाती है। ऐसे समय में अधिक विहार करने से अनजाने में जीव हिंसा की संभावना बढ़ जाती है। इसलिए जैन साधु-साध्वियाँ अपनी यात्रा सीमित करके एक स्थान पर रहते हैं।

इस प्रकार चातुर्मास केवल यात्रा रोकने की व्यवस्था नहीं है, बल्कि एक अत्यंत गहन संदेश देता है—मानवीय सुविधा से अधिक महत्वपूर्ण प्रत्येक जीव के जीवन के प्रति सम्मान है।

चातुर्मास: आध्यात्मिक जागरण का काल

चातुर्मास के दौरान साधु-साध्वियों के एक स्थान पर रहने से श्रावक-श्राविकाओं को उनके सान्निध्य और मार्गदर्शन का विशेष अवसर मिलता है। इस अवधि में प्रवचन, स्वाध्याय, सामायिक, प्रतिक्रमण, तप, त्याग, ध्यान, धर्म-चर्चा और आत्मचिंतन जैसी धार्मिक गतिविधियाँ विशेष रूप से बढ़ जाती हैं। गृहस्थों के लिए भी चातुर्मास सांसारिक भोग-विलास और अनावश्यक उपभोग को कम करने का अवसर है। अनेक श्रावक-श्राविकाएँ भोजन, यात्रा, मनोरंजन, उपभोग तथा दैनिक जीवन से संबंधित अतिरिक्त नियम और संकल्प ग्रहण करते हैं। इस दृष्टि से चातुर्मास एक प्रकार का वार्षिक ‘आध्यात्मिक विश्वविद्यालय’ बन जाता है, जिसमें साधु-साध्वी, श्रावक-श्राविका, युवा और बच्चे अपनी क्षमता के अनुसार धर्म-साधना में सहभागी होते हैं।

विभिन्न जैन सम्प्रदायों में चातुर्मास

श्वेताम्बर मूर्तिपूजक परम्परा में चातुर्मास के दौरान प्रवचन, शास्त्र-अध्ययन, जिनालय में पूजा-अर्चना, सामायिक, प्रतिक्रमण, तपस्या तथा अन्य धार्मिक अनुष्ठानों का विशेष महत्व होता है। इसी अवधि में पर्युषण महापर्व आध्यात्मिक साधना के शिखर के रूप में आता है।

स्थानकवासी परम्परा मूर्ति-पूजा नहीं करती। इसलिए इसमें सामायिक, प्रतिक्रमण, ध्यान, तप, उपवास, धार्मिक प्रवचन, शास्त्र-अध्ययन और आंतरिक आत्म-शुद्धि पर विशेष बल दिया जाता है।

तेरापंथ परम्परा में अनुशासित साधु-साध्वी परम्परा, ध्यान, स्वाध्याय, तप, नैतिक आचरण और आध्यात्मिक मार्गदर्शन का विशेष महत्व है।

दिगम्बर परम्परा में भी वर्षाकालीन प्रवास का अत्यंत महत्व है। श्रावक-श्राविकाएँ पूजा, स्वाध्याय, उपवास, ध्यान और संयम को अधिक महत्व देते हैं। इसी पवित्र काल में दशलक्षण महापर्व विशेष आध्यात्मिक महत्व रखता है।

इस प्रकार बाहरी विधियों में अंतर होते हुए भी अहिंसा, संयम, तप और आत्म-शुद्धि सभी जैन परम्पराओं के समान आधार हैं।

पर्युषण महापर्व

पर्युषण जैन धर्म के सर्वाधिक पवित्र आध्यात्मिक पर्वों में से एक है और श्वेताम्बर परम्पराओं में इसका विशेष महत्व है। यह सामान्यतः आठ दिनों तक मनाया जाता है और इसका समापन संवत्सरी के पवित्र दिन होता है। पर्युषण का वास्तविक अर्थ बाहरी गतिविधियों से स्वयं को कुछ समय के लिए हटाकर अपनी आत्मा की ओर लौटना है। यह व्यक्ति को स्वयं से प्रश्न करने के लिए प्रेरित करता है—मैंने किसे दुःख पहुँचाया? मुझसे क्या गलतियाँ हुईं? मेरे भीतर कौन-से कषाय प्रबल हैं? मुझे किसे क्षमा करना चाहिए? मुझे किससे क्षमा माँगनी चाहिए?  इन दिनों में उपवास, सामायिक, प्रतिक्रमण, स्वाध्याय, ध्यान, प्रवचन, दान, त्याग और आत्मनिरीक्षण का विशेष महत्व होता है। इस साधना का वास्तविक उद्देश्य चार प्रमुख कषायों—क्रोध, मान, माया और लोभ—को कम करना और अंततः उन पर विजय प्राप्त करना है।

कल्पसूत्र और शास्त्र-अध्ययन

श्वेताम्बर परम्परा, विशेषकर मूर्तिपूजक परम्परा में, पर्युषण के दौरान कल्पसूत्र का विशेष महत्व है। इसमें तीर्थंकरों, विशेष रूप से भगवान महावीर, के जीवन से संबंधित महत्वपूर्ण विवरण तथा जैन साधु-परम्परा और अनुशासन से संबंधित विषय सम्मिलित हैं। कल्पसूत्र का वाचन और विवेचन पर्युषण को धार्मिक शिक्षा और स्वाध्याय का भी महान अवसर बनाता है। जैन दर्शन का संदेश है कि ज्ञान का अंतिम उद्देश्य आचरण में परिवर्तन होना चाहिए। इसलिए स्वाध्याय केवल बौद्धिक ज्ञान नहीं, बल्कि आत्म-शुद्धि का साधन है।

तपस्या: उपवास और आत्म-संयम

तप पर्युषण की सबसे प्रमुख विशेषताओं में से एक है। जैन अनुयायी अपनी क्षमता, स्वास्थ्य, परम्परा और धार्मिक मार्गदर्शन के अनुसार विभिन्न प्रकार के उपवास और आहार-संयम करते हैं। परंतु उपवास स्वयं अंतिम लक्ष्य नहीं है। यदि कठोर उपवास करने के बाद भी व्यक्ति के भीतर क्रोध, अहंकार और अभिमान बना रहता है, तो तपस्या का वास्तविक आध्यात्मिक उद्देश्य अधूरा रह जाता है। सच्चा तप केवल भोजन छोड़ना नहीं, बल्कि क्रोध, अहंकार, छल, लोभ, आसक्ति और अनियंत्रित इच्छाओं को छोड़ने का प्रयास है।

सामायिक और प्रतिक्रमण

सामायिक समता और आत्म-संयम की साधना है। निर्धारित अवधि के लिए व्यक्ति सांसारिक आसक्ति से स्वयं को अलग करके सभी जीवों के प्रति समभाव विकसित करने का प्रयास करता है। प्रतिक्रमण जैन धर्म की अत्यंत गहन आत्मनिरीक्षण प्रक्रिया है। इसमें व्यक्ति अपने पिछले आचरण पर विचार करता है, अपनी भूलों को स्वीकार करता है, अनुचित व्यवहार के लिए पश्चात्ताप करता है और भविष्य में अधिक सावधानी रखने का संकल्प लेता है।

सच्चा प्रतिक्रमण व्यक्ति को विचार करने के लिए प्रेरित करता है कि क्या उसने मन, वचन या कर्म से किसी को कष्ट पहुँचाया; कठोर शब्द कहे; छल किया; लोभ या अहंकार के प्रभाव में कार्य किया; अथवा करुणा और अहिंसा के सिद्धांतों का उल्लंघन किया। इसलिए प्रतिक्रमण को उचित रूप से व्यक्ति का ‘आध्यात्मिक एवं नैतिक आत्म-परीक्षण’ कहा जा सकता है।

संवत्सरी और मिच्छामि दुक्कडम्

श्वेताम्बर पर्युषण का अंतिम दिन संवत्सरी कहलाता है। यह वार्षिक आत्मनिरीक्षण, प्रायश्चित्त और क्षमा का महान दिवस है। विशेष संवत्सरी प्रतिक्रमण के पश्चात जैन समाज में एक-दूसरे से जाने-अनजाने में हुई भूलों और अपराधों के लिए क्षमा माँगने की परम्परा है। प्रसिद्ध अभिव्यक्ति ‘मिच्छामि दुक्कडम्’ इसी भावना की प्रतीक है—यदि मैंने अपने मन, वचन अथवा कर्म से, जाने या अनजाने में, आपको किसी प्रकार का दुःख पहुँचाया हो तो मेरे वे दोष निष्फल हों और मुझे क्षमा करें।

इसकी व्यापक भावना है—

मैं सभी जीवों को क्षमा करता हूँ। सभी जीव मुझे क्षमा करें।
मेरी सभी जीवों से मैत्री है। मेरा किसी से वैर नहीं है।

जैन धर्म में क्षमा केवल सामाजिक शिष्टाचार नहीं, बल्कि क्रोध, अहंकार, द्वेष और कर्म-बंधन से मुक्त होने की आध्यात्मिक साधना है।

दिगम्बर दशलक्षण महापर्व

दिगम्बर जैन परम्परा में इस पवित्र काल से संबंधित दशलक्षण महापर्व सामान्यतः दस दिनों तक मनाया जाता है। प्रत्येक दिन एक उत्तम धर्म अथवा सर्वोच्च सद्गुण को समर्पित होता है।ये दस धर्म हैं—उत्तम क्षमा अर्थात सर्वोच्च क्षमाभाव; उत्तम मार्दव अर्थात विनम्रता; उत्तम आर्जव अर्थात सरलता और निष्कपटता; उत्तम शौच अर्थात आंतरिक शुद्धता और संतोष; उत्तम सत्य अर्थात सत्य; उत्तम संयम अर्थात आत्म-नियंत्रण; उत्तम तप अर्थात तपस्या; उत्तम त्याग अर्थात त्याग; उत्तम आकिंचन्य अर्थात अपरिग्रह और अनासक्ति; तथा उत्तम ब्रह्मचर्य अर्थात इन्द्रिय-संयम और शुद्ध आचरण। ये दस धर्म मानव चरित्र के आध्यात्मिक रूपांतरण की व्यवस्थित साधना प्रस्तुत करते हैं। इस पवित्र अवधि से संबंधित क्षमावाणी के अवसर पर क्षमा माँगने और दूसरों को क्षमा करने का विशेष महत्व है।

इस प्रकार संवत्सरी और क्षमावाणी दोनों यह संदेश देते हैं कि वास्तविक आध्यात्मिक उन्नति के लिए मन को द्वेष, क्रोध और प्रतिशोध से मुक्त करना आवश्यक है।

विभिन्न जैन परम्पराओं में एकता

जैन धर्म में अनेक सम्प्रदाय और उप-परम्पराएँ हैं। कुछ परम्पराएँ मूर्ति-पूजा करती हैं, जबकि कुछ नहीं करतीं। शास्त्रीय परम्पराओं, पूजा-विधियों, धार्मिक अनुष्ठानों और पर्वों की तिथियों में भी कुछ अंतर हो सकते हैं। फिर भी इस विविधता के भीतर गहरी दार्शनिक एकता है। सभी प्रमुख जैन परम्पराएँ अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह, संयम, तप, स्वाध्याय, क्षमा और आत्म-शुद्धि को महत्व देती हैं। जैन धर्म का महान सिद्धांत अनेकांतवाद स्वयं विभिन्न दृष्टिकोणों के प्रति सम्मान की प्रेरणा देता है। अतः बाहरी धार्मिक विधियाँ भिन्न हो सकती हैं, लेकिन उनका मूल उद्देश्य राग-द्वेष को कम करके आत्मा की शुद्धि और मुक्ति की दिशा में आगे बढ़ना है।

चातुर्मास, पर्युषण और जैन कर्म सिद्धांत

चातुर्मास और पर्युषण का गहरा महत्व जैन धर्म के कर्म सिद्धांत से समझा जा सकता है। क्रोध, मान, माया और लोभ जैसे कषाय आत्मा के कर्म-बंधन को मजबूत करते हैं। जैन साधना का उद्देश्य संवर, अर्थात नए कर्मों के आस्रव को रोकना, और निर्जरा, अर्थात संचित कर्मों का क्षय करना है। इसलिए अहिंसा, संयम, ध्यान, तपस्या, प्रायश्चित्त, क्षमा और अनासक्ति अलग-अलग धार्मिक क्रियाएँ मात्र नहीं हैं। ये सभी आत्मा को कर्म-बंधन से मुक्त करने की समग्र आध्यात्मिक प्रक्रिया के अंग हैं, जिसका अंतिम लक्ष्य मोक्ष है।

अपरिग्रह और पर्यावरणीय उत्तरदायित्व

चातुर्मास का संदेश आधुनिक युग में भी अत्यंत प्रासंगिक है। वर्षा ऋतु में असंख्य जीवों की रक्षा के लिए जैन साधु-साध्वियों द्वारा विहार सीमित करना इस बात का उदाहरण है कि मनुष्य को अन्य जीवों के जीवन का सम्मान करते हुए अपने व्यवहार में परिवर्तन करना चाहिए। यह सिद्धांत आधुनिक संदर्भ में जैव-विविधता, पशु-कल्याण, खाद्य नैतिकता, जल-संरक्षण, पर्यावरण संरक्षण, जिम्मेदार उपभोग और कचरे में कमी जैसे विषयों से सीधे जुड़ता है। इसी प्रकार अपरिग्रह आधुनिक उपभोक्तावाद को चुनौती देता है। लगातार यह पूछने के स्थान पर कि मैं और क्या प्राप्त कर सकता हूँ?” जैन दर्शन पूछता है—“वास्तव में मेरी आवश्यकता कितनी है?”

इस दृष्टि से जैन जीवन-पद्धति में स्थायी और संतुलित विकास केवल संसाधनों के पुनर्चक्रण से नहीं, बल्कि अनावश्यक इच्छाओं और उपभोग को कम करने से प्रारम्भ होता है।

आधुनिक जीवन में प्रासंगिकता

पर्युषण आधुनिक जीवन की अनेक समस्याओं का व्यावहारिक आध्यात्मिक समाधान प्रस्तुत करता है। आज का जीवन डिजिटल व्यस्तता, प्रतिस्पर्धा, उपभोग और सूचनाओं की अधिकता से प्रभावित है। जैन साधना इसके विपरीत अनुशासन सिखाती है—उपवास भूख और स्वाद पर नियंत्रण सिखाता है; मौन वाणी को अनुशासित करता है; सामायिक मन और ध्यान को नियंत्रित करती है; स्वाध्याय बुद्धि को दिशा देता है; प्रतिक्रमण अंतःकरण को जागृत करता है; अपरिग्रह इच्छाओं को सीमित करता है और क्षमा अहंकार को नियंत्रित करती है।

युवा पीढ़ी इन सिद्धांतों को डिजिटल जीवन में भी अपना सकती है—स्क्रीन पर अनावश्यक समय कम करना, सोशल मीडिया पर कटु भाषा से बचना, भोजन की बर्बादी रोकना, पशुओं के प्रति दया रखना, क्रोध नियंत्रित करना, गलती होने पर सच्चे मन से क्षमा माँगना, ध्यान करना, दान देना तथा आवश्यकता और इच्छा के बीच अंतर समझना।

क्षमा: विश्व के लिए जैन धर्म का महान संदेश

पर्युषण और दशलक्षण का संभवतः सबसे सार्वभौमिक संदेश क्षमा है। परिवारों, समाजों और कभी-कभी राष्ट्रों में भी विवाद और कटुता पीढ़ियों तक चलती रहती है। संवत्सरी और क्षमावाणी हमें सिखाते हैं कि किसी न किसी को क्रोध और प्रतिशोध की इस श्रृंखला को समाप्त करने का साहस करना होगा। क्षमा का अर्थ अन्याय को स्वीकार करना या न्याय का त्याग करना नहीं है। इसका अर्थ है घृणा और प्रतिशोध को अपने मन पर स्थायी अधिकार न देना।

यह जैन सिद्धांत पारिवारिक मेल-मिलाप, सामाजिक सद्भाव, मध्यस्थता, पुनर्स्थापनात्मक न्याय और विश्व शांति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

कर्मकांड से आगे: आत्म-परिवर्तन

पर्युषण का वास्तविक मूल्य केवल इस बात से निर्धारित नहीं किया जा सकता कि किसी व्यक्ति ने कितने उपवास किए अथवा कितने धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लिया। कोई व्यक्ति उपवास कर सकता है, लेकिन उसके भीतर क्रोध बना रह सकता है। कोई प्रतिक्रमण कर सकता है, लेकिन अपनी वास्तविक गलती स्वीकार करने से बच सकता है। कोई सैकड़ों लोगों को ‘मिच्छामि दुक्कडम्’ भेज सकता है, लेकिन जिस व्यक्ति को वास्तव में दुःख पहुँचाया है, उससे सच्चे मन से क्षमा माँगने को तैयार न हो। इसीलिए जैन दर्शन में ‘भाव’ अर्थात आंतरिक भावना का अत्यंत महत्व है। सर्वोच्च तप केवल भोजन का त्याग नहीं, बल्कि कषायों को कम करना है। सच्चा प्रतिक्रमण केवल शब्दों का उच्चारण नहीं, बल्कि अपने आचरण में सुधार करना है। और सच्ची क्षमा केवल ‘मिच्छामि दुक्कडम्’ कहना नहीं, बल्कि मन से वैर और द्वेष का त्याग करना है।

आत्मा का महापर्व

चातुर्मास, पर्युषण और दशलक्षण मिलकर नैतिक तथा आध्यात्मिक परिवर्तन का एक अद्भुत मार्ग प्रस्तुत करते हैं। चातुर्मास संयम सिखाता है। अहिंसा प्रत्येक जीवन के प्रति सम्मान सिखाती है। सामायिक समता सिखाती है। तप इच्छाओं पर विजय सिखाता है। स्वाध्याय ज्ञान और विवेक देता है। प्रतिक्रमण आत्मनिरीक्षण सिखाता है। अपरिग्रह अनासक्ति सिखाता है। दशलक्षण सर्वोच्च सद्गुणों के विकास की प्रेरणा देता है। संवत्सरी और क्षमावाणी क्षमा का मार्ग दिखाते हैं।

आज के विश्व में इन सिद्धांतों की प्रासंगिकता और भी बढ़ गई है। पर्यावरणीय संतुलन की खोज कर रही दुनिया को अपरिग्रह; हिंसा से पीड़ित दुनिया को अहिंसा; वैचारिक संघर्षों से विभाजित दुनिया को अनेकांतवाद; और द्वेष एवं प्रतिशोध से परेशान दुनिया को क्षमा का जैन सिद्धांत महत्वपूर्ण मार्गदर्शन प्रदान करता है। अंततः चातुर्मास और पर्युषण मनुष्य से दूसरों पर विजय प्राप्त करने के लिए नहीं, बल्कि सबसे कठिन विजय—अपने क्रोध, अहंकार, छल, लोभ, राग और आसक्ति पर विजय प्राप्त करने—का आह्वान करते हैं।

इन पवित्र पर्वों की शाश्वत भावना को इन शब्दों में व्यक्त किया जा सकता है—

मैं सभी जीवों को क्षमा करता हूँ। सभी जीव मुझे क्षमा करें।
मेरी सभी जीवों से मैत्री है। मेरा किसी से वैर नहीं है।

मिच्छामि दुक्कडम्।

जय जिनेन्द्र।

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor