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खाद्य सुरक्षा के पक्ष में खड़ा एक आईएएस : तुकाराम मुंडे ने खाद्य सुरक्षा को जन आंदोलन बनाया

महाराष्ट्र के तेज तर्रार आईएएस तुकाराम मुंडे की हर तरफ हो रही है चर्चा

दिलीप कुमार पुरोहित. मुंबई

खाद्य पदार्थों की शुद्धता और सुरक्षा आम आदमी के जीवन से सीधे जुड़ा विषय है। हम रोज जो भोजन करते हैं, वह केवल स्वाद और पेट भरने का माध्यम नहीं, बल्कि हमारे स्वास्थ्य की बुनियाद है। इसके बावजूद खाद्य सुरक्षा के नियमों का पालन अक्सर उतनी गंभीरता से नहीं होता, जितनी अपेक्षा की जाती है। ऐसे माहौल में महाराष्ट्र के खाद्य एवं औषधि प्रशासन (FDA) के आयुक्त तुकाराम मुंडे की कार्यप्रणाली चर्चा का विषय बनी है। मई 2026 में जिम्मेदारी संभालने के बाद उन्होंने खाद्य सुरक्षा को केवल निरीक्षण और कार्रवाई तक सीमित रखने के बजाय उसे व्यापक जनहित के मुद्दे के रूप में देखने पर जोर दिया।

नई जिम्मेदारी को नए नजरिए से देखने की कोशिश

तुकाराम मुंडे की कार्यशैली की एक खास बात यह दिखाई देती है कि वे किसी पद को केवल निर्धारित प्रशासनिक जिम्मेदारियों तक सीमित करके नहीं देखते। नई जिम्मेदारी संभालने के बाद उनकी प्राथमिकता यह समझने की रही कि उस पद की वास्तविक सामाजिक भूमिका क्या है और कानूनों का अंतिम उद्देश्य क्या होना चाहिए। खाद्य सुरक्षा के संदर्भ में इसका सीधा अर्थ है—नियमों की किताब में अनुपालन दर्ज करना ही पर्याप्त नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना कि आम नागरिक तक पहुंचने वाला भोजन वास्तव में सुरक्षित और निर्धारित मानकों के अनुरूप हो।

छोटा हो या बड़ा, कानून सबके लिए समान

खाद्य सुरक्षा के क्षेत्र में उनकी कार्यप्रणाली का एक प्रमुख आधार यह है कि किसी खाद्य कारोबारी की पहचान या आकार के आधार पर नियम अलग नहीं हो सकते। छोटा भोजनालय हो अथवा बड़ी वैश्विक फूड चेन, सभी को खाद्य सुरक्षा कानूनों का पालन करना होगा। इस दृष्टिकोण में प्रतिष्ठान के नाम से अधिक महत्वपूर्ण उसकी वास्तविक कार्यप्रणाली है। निरीक्षण केवल रसोई की सफाई देखने तक सीमित नहीं होना चाहिए। कच्चे माल की खरीद, उसकी गुणवत्ता, भंडारण, सफाई, तैयारी और ग्राहक तक भोजन पहुंचने की पूरी प्रक्रिया को जांच के दायरे में लाना आवश्यक है।

किचन से लेकर कच्चे माल के स्रोत तक निगरानी

खाद्य सुरक्षा में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्नों में से एक है—जो सामग्री भोजन में इस्तेमाल हो रही है, वह आई कहां से? इसीलिए किसी खाद्य व्यवसायी के पास कच्चे माल की खरीद और स्रोत से संबंधित रिकॉर्ड होना महत्वपूर्ण है। यदि किसी खाद्य पदार्थ से स्वास्थ्य संबंधी समस्या सामने आती है तो उसकी आपूर्ति की पूरी श्रृंखला को पीछे तक ट्रेस किया जा सके। उपलब्ध सामग्री में खाद्य प्रतिष्ठानों में समाप्त हो चुके उत्पादों के इस्तेमाल और कच्चे माल के स्रोत एवं भंडारण से जुड़ी कमियों का उल्लेख मिलता है। यह दृष्टिकोण खाद्य सुरक्षा को केवल “रसोई साफ है या नहीं” के सवाल से निकालकर पूरी फूड सप्लाई चेन की निगरानी तक ले जाता है।

सिंथेटिक दूध के खिलाफ कार्रवाई ने खींचा ध्यान

खाद्य सुरक्षा की इसी सक्रिय कार्यशैली के बीच सिंथेटिक दूध से जुड़े मामलों पर कार्रवाई विशेष रूप से चर्चा में रही। उपलब्ध इंटरव्यू ट्रांसक्रिप्ट के अनुसार एक मामले की जानकारी मिलने के बाद लगभग एक महीने तक जांच और रणनीति तैयार की गई तथा पुलिस के साथ कार्रवाई की गई। इसमें सिंथेटिक दूध तैयार करने में विभिन्न रासायनिक पदार्थों के इस्तेमाल का उल्लेख हुआ और पांच जिलों तक गतिविधि के फैलाव की बात सामने आई। ट्रांसक्रिप्ट में 13 लोगों की गिरफ्तारी का भी उल्लेख है। इस प्रकरण से एक बड़ा सवाल सामने आता है—क्या उपभोक्ता केवल स्वाद या दिखावट से यह पहचान सकता है कि उसके सामने रखा दूध वास्तविक है या मिलावटी? इसका उत्तर आसान नहीं है। यही कारण है कि खाद्य सुरक्षा व्यवस्था में वैज्ञानिक जांच, निगरानी और आपूर्ति श्रृंखला की जानकारी महत्वपूर्ण हो जाती है।

“स्वाद से पहले सुरक्षा” का विचार

आज के दौर में उपभोक्ता स्वाद, कीमत, सुविधा और ब्रांड को बहुत महत्व देता है। लेकिन सुरक्षित भोजन इन सभी से ऊपर होना चाहिए। उपलब्ध सामग्री में मुंढे की सोच का केंद्रीय बिंदु यही दिखाई देता है कि भोजन की प्राथमिक कसौटी उसका सुरक्षित और निर्धारित मानकों के अनुरूप होना है, केवल स्वादिष्ट होना नहीं। यह विचार इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि आधुनिक जीवनशैली में बाहर का भोजन, फास्ट फूड, पैकेज्ड फूड और तुरंत तैयार होने वाले खाद्य पदार्थों का इस्तेमाल बढ़ा है। ऐसे में उपभोक्ता के लिए यह जानना जरूरी है कि वह क्या खा रहा है और उस भोजन के पीछे पूरी प्रक्रिया क्या है।

पैकेजिंग और विज्ञापन के दावों पर भी नजर

खाद्य सुरक्षा का मतलब केवल मिलावट पकड़ना नहीं है। किसी उत्पाद के पैकेट पर लिखे दावे भी उपभोक्ता के निर्णय को प्रभावित करते हैं। यदि किसी उत्पाद को किसी विशेष गुणवत्ता, शुद्धता या प्राकृतिक विशेषता के साथ प्रस्तुत किया जाता है, तो उसके दावे को नियमों के अनुरूप होना चाहिए। उपभोक्ता को भ्रमित करने वाले दावों पर सवाल उठाना भी खाद्य नियामक की जिम्मेदारी का हिस्सा है। उपलब्ध सामग्री में खाद्य उत्पादों के विज्ञापन और दावों से संबंधित नियमों का उल्लेख इसी संदर्भ में किया गया है।

शिकायत व्यवस्था को बनाया हथियार

खाद्य सुरक्षा की प्रभावी व्यवस्था तभी बन सकती है जब आम नागरिक भी उसका हिस्सा बने। इसी सोच के तहत शिकायतों को महत्व देने की बात सामने आती है। टोल-फ्री माध्यम, ई-मेल और शिकायत पोर्टल जैसे रास्तों से प्राप्त जानकारी को कार्रवाई के लिए इस्तेमाल करने पर जोर दिया गया।

इसका महत्व इसलिए भी है क्योंकि सरकारी अधिकारी हर दुकान, होटल, रेस्टोरेंट या खाद्य इकाई पर हर समय नजर नहीं रख सकते। लेकिन करोड़ों उपभोक्ताओं की सतर्कता को व्यवस्था से जोड़ दिया जाए तो निगरानी का दायरा कई गुना बढ़ सकता है।

कठोर कार्रवाई और कानूनी प्रक्रिया के बीच संतुलन

मुंढे की कार्यप्रणाली पर चर्चा करते समय एक दूसरा पहलू भी महत्वपूर्ण है—कानून लागू करने के साथ निर्धारित प्रक्रिया का पालन। उपलब्ध इंटरव्यू में लाइसेंस निलंबन जैसी कार्रवाई को लेकर उठे सवालों के जवाब में यह बात सामने आती है कि ऐसी शक्तियां कानून में निर्धारित हैं और कार्रवाई मनमाने तरीके से नहीं, बल्कि कानूनी प्रावधानों के तहत की जानी चाहिए।

यानी कठोर प्रशासन का अर्थ केवल कठोरता नहीं है। प्रभावी प्रशासन में कानून, प्रक्रिया, प्रमाण और जनहित—चारों का संतुलन आवश्यक है।

व्यवस्था बदलने के लिए जनभागीदारी जरूरी

तुकाराम मुंढे की कार्यशैली का सबसे व्यापक संदेश शायद यही है कि खाद्य सुरक्षा को केवल सरकारी विभाग का विषय मानने से समस्या पूरी तरह हल नहीं होगी। इसे जनभागीदारी से जोड़ना होगा। जब उपभोक्ता लेबल पढ़ेगा, भोजन के स्रोत को लेकर जागरूक होगा, संदिग्ध खाद्य पदार्थ की शिकायत करेगा और केवल स्वाद के बजाय गुणवत्ता एवं सुरक्षा को प्राथमिकता देगा, तभी बाजार पर वास्तविक दबाव बनेगा। उपलब्ध सामग्री में खाद्य सुरक्षा को जनआंदोलन बनाने की आवश्यकता पर विशेष जोर दिखाई देता है।

अधिकारी की कार्रवाई से आगे एक सोच

तुकाराम मुंढे की कार्यप्रणाली को केवल छापेमारी, लाइसेंस निलंबन या मिलावट के खिलाफ कार्रवाई के रूप में देखना अधूरा होगा। इसका बड़ा पक्ष यह है कि वे खाद्य सुरक्षा को जनस्वास्थ्य, प्रशासनिक जवाबदेही और नागरिक जागरूकता से जोड़कर देखने की कोशिश करते हैं। उनकी कार्यशैली से यह सवाल भी सामने आता है कि देश में खाद्य सुरक्षा का मॉडल केवल “मिलावट पकड़ी गई या नहीं” तक सीमित रहना चाहिए या फिर “मिलावट होने की स्थिति ही न बने” ऐसी व्यवस्था विकसित की जानी चाहिए। यदि उपभोक्ता जागरूक हो, कारोबारी जिम्मेदार हो और नियामक सक्रिय एवं पारदर्शी हो, तो खाद्य सुरक्षा केवल सरकारी फाइल का विषय नहीं रहेगी। वह समाज की सामूहिक जिम्मेदारी बन जाएगी। यही किसी भी खाद्य सुरक्षा अभियान की वास्तविक सफलता होगी—जब सुरक्षित भोजन मांगने के लिए किसी अधिकारी की कार्रवाई का इंतजार न करना पड़े, बल्कि सुरक्षित भोजन स्वयं उपभोक्ता का अधिकार और समाज की प्राथमिकता बन जाए।

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor