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18वां जन्मदिन आया तो घर छोड़ना पड़ा, अब हजारों ‘केयर लीवर्स’ को दे रही हैं नई पहचान

अनाथालय से निकलने के बाद अनीषा ने गिरीश के साथ शुरू किया CLICK, 240 चाइल्ड केयर संस्थानों तक पहुंचा अभियान

दिलीप कुमार पुरोहित. नई दिल्ली

9783414079 diliprakhai@gmail.com

आमतौर पर 18वां जन्मदिन जीवन के सबसे खास पलों में शामिल होता है। परिवार, दोस्त, केक और उपहार इस दिन को यादगार बनाते हैं। लेकिन अनीषा के लिए 18वां जन्मदिन एक ऐसी हकीकत लेकर आया, जिसे वह आज तक नहीं भूल पाई हैं। उस दिन उन्हें चाइल्ड केयर इंस्टीट्यूशन यानी अनाथालय छोड़ना पड़ा। न रहने के लिए घर था, न पढ़ाई जारी रखने का साधन और न ही आर्थिक सहारा। इसी व्यक्तिगत संघर्ष ने आगे चलकर हजारों ऐसे बच्चों के लिए काम करने का रास्ता बनाया, जो 18 वर्ष की उम्र में संस्थागत देखभाल से बाहर हो जाते हैं।

खुद के संघर्ष से निकला समाधान

अनीषा वर्ष 2017 में दिल्ली के एक ऑर्फनेज से बाहर आई थीं। उनके सामने घर, शिक्षा और आर्थिक सहायता जैसी बुनियादी चुनौतियां थीं। इसी दौरान उनकी मुलाकात गिरीश से हुई, जो राजस्थान के ऑर्फनेज से निकलकर इसी तरह की परिस्थितियों का सामना कर चुके थे। दोनों ने महसूस किया कि हर साल बड़ी संख्या में बच्चे 18 वर्ष की उम्र में चाइल्ड केयर संस्थानों से बाहर आते हैं और अचानक उन्हें आत्मनिर्भर जीवन की ओर बढ़ना पड़ता है। इसी सोच से CLICK यानी Care Leaver Inner Circle Forum की शुरुआत हुई।

‘केयर लीवर’ बच्चों के लिए बनाया प्लेटफॉर्म

CLICK का उद्देश्य ऐसे युवाओं को आत्मनिर्भर बनाने में मदद करना है, जिन्हें संस्थागत देखभाल से बाहर निकलने के बाद अचानक अपने जीवन की जिम्मेदारियां संभालनी पड़ती हैं। संगठन का मूल विचार है—“केयर लीवर्स के लिए, केयर लीवर्स द्वारा” एक ऐसा प्लेटफॉर्म तैयार करना, जहां उन्हें अकेला महसूस न हो और उन्हें आगे बढ़ने के लिए आवश्यक सहयोग मिल सके। अनीषा के अनुसार संस्थान से निकलने के बाद सबसे बड़ी जरूरत केवल आर्थिक मदद नहीं होती, बल्कि पहचान, दस्तावेज, रहने की व्यवस्था, शिक्षा, रोजगार और मानसिक संबल भी जरूरी होता है।

15 से 18 वर्ष के बच्चों के लिए ‘लॉन्चपैड’

CLICK के Care to Career कार्यक्रम में दो प्रमुख प्रोग्राम संचालित किए जाते हैं। पहला Launchpad Programme है, जो 15 से 18 वर्ष की उम्र के उन बच्चों के लिए है, जो अभी चाइल्ड केयर संस्थानों में रह रहे हैं। इस कार्यक्रम में बच्चों को लाइफ स्किल, मानसिक स्वास्थ्य और करियर से जुड़े सत्र उपलब्ध कराए जाते हैं। इसके साथ ही सरकार की आफ्टर-केयर योजनाओं के प्रति जागरूकता पैदा करने और पात्र बच्चों के नामांकन में भी सहायता दी जाती है।

18 वर्ष के बाद ‘Acceleration Programme’

दूसरा कार्यक्रम Acceleration Programme है, जिसके माध्यम से 18 वर्ष से अधिक उम्र के युवाओं को आत्मनिर्भर बनने में मदद दी जाती है। इसके तहत उन्हें आवश्यक वस्तुओं वाली केयर किट, दस्तावेज तैयार कराने में सहायता, ग्रुप हाउसिंग और कौशल एवं प्रशिक्षण जैसे क्षेत्रों में सहयोग दिया जाता है। संगठन की राष्ट्रीय हेल्पलाइन भी संचालित है, जहां आवास, दस्तावेज, नौकरी और आपातकालीन आर्थिक सहायता से संबंधित समस्याओं को लेकर कॉल आती हैं। अनीषा के मुताबिक हेल्पलाइन पर अब तक 30 हजार कॉल प्राप्त हो चुकी हैं। कई बार रात के दो बजे भी जरूरतमंद युवाओं की कॉल आती है।

राजस्थान से शुरू होकर चार राज्यों तक पहुंचा नेटवर्क

पांच वर्षों में CLICK का काम राजस्थान से आगे बढ़कर पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश और उत्तराखंड तक पहुंच चुका है। संगठन के अनुसार अब तक 240 चाइल्ड केयर संस्थानों तक पहुंच बनाई गई है और करीब 3 हजार केयर लीवर्स को नेटवर्क से जोड़ा गया है। यह विस्तार बताता है कि संस्थागत देखभाल से बाहर आने वाले युवाओं की चुनौती किसी एक शहर या राज्य तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के अलग-अलग हिस्सों में मौजूद है।

सरकार के सामने उठाया एड्रेस प्रूफ का मुद्दा

CLICK ने केवल व्यक्तिगत स्तर पर सहायता देने तक खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि व्यवस्था में बदलाव के लिए भी प्रयास किए। वर्ष 2023 में संगठन के प्रतिनिधियों ने तत्कालीन केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री स्मृति ईरानी से मुलाकात कर केयर लीवर्स के एड्रेस प्रूफ की समस्या उठाई। अनीषा के अनुसार इसके बाद सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को पत्र जारी किया गया कि 23 वर्ष की उम्र तक सरकार का पता केयर लीवर के लिए एड्रेस प्रूफ के रूप में स्वीकार किया जा सके।

आफ्टर-केयर योजना को बच्चों तक पहुंचाने की कोशिश

संगठन का एक प्रमुख लक्ष्य सरकारी आफ्टर-केयर योजनाओं को प्रत्येक पात्र केयर लीवर तक पहुंचाना है। अनीषा के मुताबिक इसके लिए सरकार से 40 लाख रुपए की राशि अनलॉक करवाई गई। इस पहल का उद्देश्य यह है कि सरकारी सहायता केवल कागजों और योजनाओं तक सीमित न रहे, बल्कि जिस युवा को इसकी आवश्यकता है, उसे वास्तव में इसका लाभ मिले।

अगले तीन वर्षों में 30 हजार केयर लीवर्स तक पहुंचने का लक्ष्य

CLICK अब अपने कार्यक्रमों को चार राज्यों में मजबूत करने और अगले तीन वर्षों में 30 हजार केयर लीवर्स तक पहुंचने का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रहा है। इसके लिए Launchpad और Acceleration दोनों कार्यक्रमों का विस्तार किया जाएगा। संगठन राष्ट्रीय स्तर की हेल्पलाइन और डेटा इंटेलिजेंस के लिए तकनीकी प्लेटफॉर्म को भी मजबूत करना चाहता है, ताकि जरूरतमंद युवाओं तक सहायता तेजी से पहुंचाई जा सके।

18 साल की उम्र में खत्म हो जाती है संस्थागत सुरक्षा

केयर लीवर उन युवाओं को कहा जाता है जो चाइल्ड केयर इंस्टीट्यूशन में रहने के बाद 18 वर्ष की उम्र में संस्थागत देखभाल से बाहर निकलते हैं। चुनौती यह है कि 18 साल की उम्र में कानूनी तौर पर वयस्क होने के बावजूद हर युवा आर्थिक और सामाजिक रूप से स्वतंत्र जीवन के लिए तैयार हो, यह जरूरी नहीं है।

मुख्य जरूरतें :

  • रहने के लिए सुरक्षित स्थान
  • पहचान और जरूरी दस्तावेज
  • शिक्षा और कौशल प्रशिक्षण
  • रोजगार के अवसर
  • मानसिक एवं भावनात्मक सहयोग
  • सरकारी आफ्टर-केयर योजनाओं से जुड़ाव

अनीषा की पीड़ा बनी मिशन की ताकत

अनीषा के लिए 18वां जन्मदिन आज भी एक भावनात्मक स्मृति है। उनका कहना है कि उस दिन उनके पास केक और मोमबत्तियां नहीं, बल्कि एक बैकपैक और वह दरवाजा था, जो कह रहा था कि यहां उनका समय खत्म हो गया है। यही व्यक्तिगत अनुभव आज उनके मिशन की ताकत बन गया है। उनका संदेश है कि संस्थान से निकलने वाला हर बच्चा केवल मजदूरी या मजबूरी का जीवन जीने के लिए मजबूर न हो, बल्कि अपनी पहचान बनाए, करियर बनाए और आत्मनिर्भर बने।

एक जन्मदिन की कहानी से हजारों जिंदगियों की उम्मीद

अनीषा की कहानी बताती है कि व्यक्तिगत पीड़ा अगर सही दिशा में बदल जाए तो वह सामाजिक बदलाव का माध्यम बन सकती है। जिस 18वें जन्मदिन पर उन्हें अपना घर छोड़ना पड़ा, उसी अनुभव ने उन्हें उन हजारों युवाओं के लिए काम करने की प्रेरणा दी, जो 18 वर्ष की उम्र में अचानक संस्थागत सुरक्षा से बाहर हो जाते हैं। CLICK की कोशिश इसी दूरी को कम करने की है—केयर से करियर तक का ऐसा सफर तैयार करना, जिसमें किसी युवा को अपनी पहचान और भविष्य के लिए अकेले संघर्ष न करना पड़े।

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor