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Friday, July 10, 2026, 8:44 pm

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जोधपुर का चितेरा जग चावा बना : आराधना सेठ की किताब ‘सड़क’ में शामिल हुई पेंटिंग्स, जीवनी भी लिखी

2006 में ‘द दार्जिलिंग लिमिटेड’ की शूटिंग में सेट के दौरान परख था आर्टिस्ट प्रवीण का हुनर

विकास माथुर. जोधपुर

आठवीं क्लास में पढ़ते समय प्रवीण चौहान को चित्रकला का ऐसा शौक था कि वे 10वीं-12वीं कक्षा के स्टूडेंट्स के लिए चार्ट पर साइंस के प्रोजेक्ट बनाने लगे थे। एक-दो के लिए नहीं बल्कि पूरी क्लास के बच्चे उनसे ही अपने प्रोजेक्ट बनवाते। वे हर बच्चे के लिए कुछ नया और अलग सोचते और यही सोच धीरे-धीरे उन्हें आर्ट की तरफ खींचती चली गई। उन्होंने पढ़ाई के साथ चित्रकला पेंटिंग स्टूडियो में पेंटिंग करना शुरू कर दिया था।
इसी तरह उनका ध्यान खींचा हॉलीवुड फिल्म प्रोड्यूसर और जानी-मानी आर्ट डायरेक्टर आराधना सेठ ने। सेठ की हा​ल ही में रिलीज हुई किताब सड़क में देश के चुनिंदा उन 4 कलाकारों की बनाई पेंटिंग्स को शामिल किया है जो​ चित्रों को फोटो की तरह बना रहे हैं। किताब में दुकान के शटर, दरवाजे, संकेत और दीवारों पर ढेर सारी खूबसूरत डिजाइन्स शामिल किए हैं जिनमें जोधपुर के प्रवीण चौहान के बनाए कई क्रिएटिव डिजाइन भी शामिल हैं। किताब में इन चारों की जीवनी भी लिखी गई है।
प्रवीण ने बताया, वे खेल-खेल में चित्रकारी से जुड़े और बाद में पेंटिंग ही उनका प्रोफेशन और​ बिजनेस बन गया। उन्होंने बताया, मैंने 1999 में जालोरी गेट के अंदर अपनी खुद की दुकान भी खोल ली थी। हालांकि उन दिनों में दुकान में दो लोग होते तो भी लगता था कि आज तो भीड़ है। दुकान छोटी थी तो हम सड़क पर बैठकर ही साइन बोर्ड के साथ कपड़े पर बैनर, बोर्ड और बैकड्रॉप बनाते और पेंटिंग करते। काम खूब काम मिल रहा था लेकिन विनाइल पेंट और फ्लैक्स आए तो हाथों से पेंटिंग का काम कम हो गया। प्रवीण ने बताया, हाथ से पेंट की गई डिजाइन 10 साल तक बरकरार रहती हैं जबकि विनाइल पेंट और फ्लैक्स तो छह महीने में ही खराब हो जाते हैं लेकिन ग्राहकों को विनाइल पेंट और फ्लैक्स पसंद आ रहे थे। इसका असर बिजनेस पर भी असर पड़ा। धीरे-धीरे स्टाफ कम करना पड़ा।
प्रवीण ने बताया, जब हाथ से पेंटिंग का काम कम हुआ तो मैं स्कप्चलर बनाकर उन्हें पेंट करने लगा। उनकी एक-एक डिटेल पर खूब मेहनत की। प्रवीण को जहां पहले अक्षरों के साथ अच्छे डिजाइन बनाने में महारथ हासिल थी वहीं धीरे-धीरे वे देवी-देवताओं की बेहतरीन तस्वीरें उकरने में एक्सपर्ट हो गए। घरों में पेंट करते समय वे अपनी आर्टिस्टिक सोच के साथ एक दीवार पर डिजाइन बनाते। यह आइडिया काम कर गया और काम भी मिलने लगा। आज शहर की सभी बड़ी स्कूलों में दीवारों पर उन्हीं की बनाई पेंटिंग सबका ध्यान खींच रही है। प्रवीण ने बताया, सेठ के साथ फिल्मों में सेट डिजाइन करने का मौका पहली बार मिला था तो काफी कुछ सीखने को मिला। वे सेठ के साथ 4 फिल्मों व एक एड में काम कर चुके हैं। सेठ ने किताब में प्रवीण की जीवनी में यह भी लिखा है कि वे खुद को पिकासो की तरह आर्टिस्ट मानते हैं और एक सा​​थ एक ही समय में पेंटिंग की कई विधाओं पर काम कर सकते हैं।

सेठ के साथ कई फिल्में और एग्जिीबिशन कर चुके हैं प्रवीण

प्रवीण ने बताया कि फिल्म ‘द दार्जिलिंग लिमिटेड’ में सेट डिजाइन करने के लिए कई आर्टिस्ट बुलाए थे जिसमें मैं भी शामिल था। मैं बिजी था तो आखिरी दिन पहुंचा और 2 पेंटिंग्स बनाकर रवाना होने लगा तो सेठ के सहायक ने गेट से वापस बुलाया और इस फिल्म में काम करने का ऑफर दिया। मैं आर्टिस्ट (डिजाइन) के रूप में जुड़ा। करीब दो महीने अपनी टीम के साथ फिल्म यूनिट के साथ बाजार, ट्रेन के साथ रेलवे स्टेशन आदि जगहों पर काम किया। फिल्म 2007 में रिलीज हुई। फिर उनके साथ उदयपुर में वाल्ट डिज्नी की सीरीज ‘द चीता गर्ल वनवर्ल्ड’ सहित 3 फिल्मों व एड में भी काम किया। 2013-14 में गोवा में लगी एग्जीबिशन के लिए भी उन्होंने मुझसे डिजाइन करवाई। हिंदी मूवी ‘शुद्ध देशी रोमांस’ में भी आर्टिस्ट के रूप में काम किया।”

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor