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Friday, July 10, 2026, 7:22 pm

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Lifestyle

पूर्व जस्टिस गोपालकृष्ण व्यास की कविताएं

(पूर्व जस्टिस गोपालकृष्ण व्यास जोधपुर ही नहीं देश की जानी मानी हस्ती है। आप राज्य मानवाधिकार आयोग के पूर्व अध्यक्ष रह चुके हैं और साहित्य के क्षेत्र में आपकी विशिष्ट पहचान है। आपकी कविताओं में मानवीय भावों और संवेदनाओं के साथ राष्ट्रीय संस्कारों का समावेश होता है। आप जीवन की राग को शब्दों में पिराेते हैं। पर्यावरण, प्रकृति प्रेम, आदमी का आदमी से रिश्ता, करुणा, सत्य और तमाम मानवीय संवेदनाओं से ओत-प्रोत विषय आपकी कविताओं का हिस्सा होता है। आपकी यहां पर कुछ कविताएं प्रस्तुत हैं। आपकी प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी। -संपादक)

प्रेम की खोज

तन्हाई में बैठोगे
याद जरूर सताएगी,
तासीर सच्चे लम्हों की
जीवन भर तड़पाएगी।

वजह बिना किसी से हम
रुसवा होकर लड़ते हैं,
हकीकत सामने आते ही
मायूस क्यूं होने लगते हैं।

दिल जिनका कमजोर है
ना विश्वास किसी का करते हैं,
कमी अपनी छुपाने के लिए
नीचा सबको दिखाने लगते हैं।

जिसकी नज़र में घृणा हो
ना उनको अच्छा दिखता है,
इंसांन की हर अच्छाई में
वह दोष ढूंढता फिरता है।

सावन आते ही खेतों में
फ़सलें लहराती दिखती है,
प्रेम से जीवन जीने वालों के
व्यवहार में ताक़त होती है।

दही, दूध में गिरने से
स्वरूप बदल जाता है
घर मे तीसरा आ जाने से
अपनों से दूर हो जाता है।

जो दिल को साफ रखते हैं
भगवान वहीँ पर रहते हैं,
मन को साफ रखने वाले ही
विश्वास के काबिल होते है।

000

बदलता जमाना

बेगाने होते लोग देखे,
अजनबी होता शहर देखा,
अपनों को हमने यहॉं
खुद से बेखबर होते देखा,
गैरों के हाथों में मरहम
अपनो के हाथ खंजर देखा,
मत पूछिए जिंदगी में
कौन सा मंजर नहीं देखा,
अपनों को हमने यहाँ
बिन बात के रुसवा देखा,
कमजोर हुए परिदों के
पँखों को धीरे उड़ते देखा,
घोसले बनाने वालों को
शुकुन मन का ढूँढते देखा,
झुकते थे कभी कदमों में
मुंह को छुपाकर जाते देखा,
कहते हैं ये रीत पुरानी है
हमने इसे अभी अभी देखा,
शहंशाह थे जो शहर के
अरमानों को उजड़ते देखा,
रखते थे जब अख्तियार
सबको अपना मानते देखा
जब हुए खाली हाथ हमारे
दूरियां बनाते सबको मैने देखा,
जमाने के हर उसूल को
रुकसत होते जनाजे में देखा,
अपने कहते थे जमाने में
उनको आग से जलाते देखा,

000

जीवन का सच

ढलते सूरज की किरणों जैसी
सौम्यता रखनी चाहिए,
दिनभर चमके शौर्य का अनुभव
साथ ही रहना चाहिए।
अभिमान कभी ना साथ चलता
निर्मल रहना चाहिए,
सच्चाई रूपी राहों पर चलकर
खुशी से जीना चाहिए।
धरती पर है सब कुछ आडम्बर
उसे समझना चाहिए,
जितना लिखा है भाग्य में अपने
संतोष रखना चाहिए।
अपनों के संग समय बिताकर
प्रेम से रहना चाहिए,
मेहनत करके जो हासिल किया
बाँट के खाना चाहिए।
परिवार की पक्की कड़ी बनकर
जोड़कर रखना चाहिए
निर्मोही क्षणभंसुर इन साँसों पर
ना भरोसा रखना चाहिए।
इंसान का सच्चा साथी है आईना
रोजाना देखना चाहिए,
दिखने वाली उन सब कमियों को,
सुधार के जीना चाहिए।
प्रकृति के हर मौसम को समझकर
जीवन को जीना चाहिए।।

0000

अपनों को पहचानो

घर का जोगी जोगीड़ा
बाहर का जोगी सिद्ध,
इस स्वार्थी कहावत को
हम तिलांजली देंगे कब।

जो अपनों को नहीं जानते
वो कहाँ किसी को मानते,
जीवन रूपी इस सागर में
खुद को भी नहीं पहचानते।

पता नहीं कब अपनों से
हम प्रेम की भाषा बोलेंगे।
अपने संगी और साथी का
कब निरादर करना छोड़ेंगे।

निभाकर हम अपणायत को
अपनों के गुण ही भूल गए,
पराये को अपने सर बिठा के
खुद प्रतिभा को कोस रहे।

बदबू को सुगन्ध समझकर
क्यों अपने दिल से लगाते हो,
नीचा दिखाकर अपनों को
क्यूँ प्रतिभाओं को दबाते हो।

बिन माँगे राय देने वाला
समाज में दीमक होता है,
चाट चाट कर खाने वाला
बर्बादी के कारण मरता है।

जो मानव हित को समझेगा
आशीर्वाद भगवान से पायेगा,
मजलूम के मानवाधिकारों से
उनको सम्मान भी दिलवाएगा।

000

नई आशा

गीत नया मैं लिखूंगा
विचार का अमृत डालूँगा
अलंकार और छंद मिलाकर
इतिहास बनाकर जाऊँगा।

गुलामी से आजादी पाकर
प्रजातंत्र में जन्म लिया
विचारों को प्रकट करके मैंने
अपना अधिकार पा लिया।

संघर्ष ही जीवन होता है,
ये मन्तव्य समझ में आया है
मेहनत से जीने वालों ने
खुशियों का अवसर पाया है।

अधिकार और कर्तव्यों से
सम्मान का जीवन पाया है
सबका साथ निभाकर हमने
रिश्ते का मतलब समझाया है।

जो जानता है हारना
एक दिन जीत कर आता है,
हसरतों से भरी इस दुनिया में
पुरुषार्थ का जीवन जीता है।

कुछ दिनों की जिंदगी का
पर्दा भी उठता जाएगा,
जीवन की अंतिम साँस में
इंद्रधनुष बनाकर चमकेगा।

गीतों की छोटी माला में
संयम से मोती पिरोऊँगा,
जीवन के सुनहरे पन्नों में
यादों की बातें ही लिखूँगा।

000

माँ की सीख

मीठे स्वर में गाती थी
अनुशासन में रखती थी,
हमारी जीजी फतहकुमारी
बच्चों को संस्कारित करती थी,

जीवन में अच्छे काम करो
यह बात सदा ही कहती थी,
मेहनत करके जीवन जियो
यह संस्कार हमको देती थी,

ना कभी कोई इच्छा की
ना किसी का अभिमान किया,
निर्मल रहकर सहज रहकर
संयम से सबका सम्मान किया,

जब तक साँसों में साँस रही
पुरुषार्थ से आगे बढती गई
अपना धर्म निभाकर उसने
ना हमको कोई तकलीफ दी,

जब याद जीजी की आती है
आँखोँ से झरना बहता है,
उसकी सूरत को याद करके
दिल का दरिया भी रोता है,

पशुं,पक्षी सब मिलजुल कर
उन गीतों को याद करते हैं,
जिनको गाकर जीजी हमको
प्रकृतिं की सैर करवाती थी,

जीजी के आंचल की सुगंध
हमको बड़ा तडपाती है,
उसके हाथों की दाल और रोटी
याद बहुत ही आती है,

आज उसके जन्म दिवस पर
प्रभु से प्रार्थना करते हैं,
उसके चरणों मे शीश झुकाकर
हम उसकी वंदना करते हैं।

000

मन से निभाओ

निर्मल रहकर जीने से
व्यक्तित्व खिल जाएगा,
दर्द में साथ निभाने से
जीवन सफल हो जाएगा
शबनम में छुपा अक्स,
दिल में उतर ही जाएगा
पत्तों की सिलवटों में,
छुप छुप बिखर जाएगा
जो कहते थे तुम्हारे हैं,
वो साथ नही निभाएगा
दुनिया की इस भीड़ में
अकेला छोड़कर जाएगा
ना करो इजहार प्रेम का
अगर निभा सको ना तुम
मानव जीवन अनमोल है
इसे सम्भालकर रखना तुम,
जिनको कहते हो अपना
उनका तो साथ निभाना तुम,
थामा अगर हाथ किसी का
ना उसको कभी छोड़ना तुम,
चाहे हो जाय गलती कोई
जुबान से गरीब ना होना तुम,
निर्मलता और त्याग को
तराजू से तोलकर जीना तुम,
दुनिया में किरदार बनाकर
सुगन्ध बिखेर कर जाना तुम,

000

जीवन का सच

आज हूँ पर कल ना रहूँगा
एक दिन में इतिहास बनूँगा
लेखक की किसी कहानी में
कोई छोटा सा किरदार बनूँगा।

लिखते समय किरदार मेरा
लेखक मुझ पर कृपा करना
नफरत करने वाले लोगों का
कोई अच्छा सा नाम लिखना।

मुझे दुनिया में लोगों ने
हृदय से पूरा प्यार दिया
छोटी बड़ी सब कमियों को
दिल से नजर अंदाज किया।

धरती पर ऋतुओं को मैने
सपनों में संजोकर जीया है,
बचपन मे माँ की गोदी मैं
ममता का आनन्द लिया है।

जो कुछ पाया अच्छा पाया
मुझको उसका गिला नहीं,
नफरत करने वालों से मुझे
मन मे कोई शिकवा भी नही।

दुनिया के सब साथियों से
में विनती करके कहता हूँ,
रिश्तों को रखो संभालकर
ये समय कभी रुकता नहीं।

दुनिया रूपी इस रंगमंच पर
नियमित नाटक खेले जायेंगे,
सूरज चंद्रमा भी बिना रुके
दिन औऱ रात बनाते जाएंगे।

द्वेष प्रेम की राहें अलग है
ना साथ कभी चल पाती है
संयम रखने वाले लोगों को
जीवन में खुशियां मिलती हैं।

00

पानी, जल, आँसू

नैनों का निर्मल पानी
मूक दर्शक सा होता है
जब भी बाहर बहता है
दिल के भाव बताता है।

ना कलम चलानी पड़ती है
ना स्याही का रँग दिखता है
शबनम से भरे आँसुओं में
एहसासों का खाता होता है।

सुख दुख में जल नैनो का
छलक छलक कर गिरता है,
जल आँखो में सुख सूखकर
पत्थर सा बनाकर रखता है।

जिंदगी की धूप छाँव को
बिन शब्दो के बयां करता है
आँखों का पानी इस दुनिया में
बिन बोले सब कुछ कहता है।

खुशी और गम होने पर
अपना किरदार निभाते हैं
गहराई सागर की आँखों में
अमृत सेतु बनाकर रखते हैं।

पानी की है गति निराली
हर जीव को जीवन देता है
शक्ति पानी की मिलने पर
शक्तिशाली मानव बनता है।

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पतझड़ की आहट

पतझड़ की आहट से
बिछड़न का दर्द सताएगा,
सावन की बौछारों से
बीज अंकुरित हो जाएगा,
होकर जल से सिंचित
पौधा भी वृक्ष बन जायेगा,
प्रकृति के हर नियम में
आत्म सम्बन्ध बन जायेगा,
हर कदम पर मानव को
जीने की कला सिखलाएगा
अपनी राह चलने वाला
एक रोज शिखर पर जाएगा
अभिमान रखने वाला ही
खाकर ठोकर गिर जाएगा
ना पद बड़ा ना तन बड़ा
मानव मिट्टी में समा जाएगा
साँसें अपने हक़ की लेकर
गंगा में एक दिन मिल जाएगा
जब तक रहँगे धरती पर
हम अपना किरदार निभाएंगे,
रहकर सुंदर फूलों के सँग
हम विश्वास से अलख जगायेंगे,
जाते जाते हम किताबों में
नाम अपना लिखवाकर जायेंगे।

000

सबक

जीवन रूपी इस डोर को
कौन समेट सका है
मेहनत से जीने वाले को
कौन रोक सका है
अवसर सबको मिलता है
कौन समझ सका है
संयम से रहने वाले को
कौन हरा सकता है
लिखा है जो भाग्य हमारे
ना कोई छीन सका है
ख़ुशियां बिखेरने वाले को
कौन गिरा सकत है
विश्वास तोड़ने वाला कभी
ना खुश रह सका है
अपनों से दूरी रखने वाला
ना ताक़त पा सका है
जो औरों के लिए भी जीता है
सेवक बनकर रहता है
अमृत की भाषा बोलने वाला
ख़ुशियाँ पाकर रहता है
सुख दुख में सँग रहने वाला
सबकी शक्ति बनता है
बाँट बांट कर खाने वाला
फरिश्ता ही बनता है।

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आज की सच्चाई

अपनों को अपना रखना
बड़ा कीमती हो गया
रिश्ते को निभाने वालों का
जीना भी दुर्भर हो गया,
जब तक पेड़ पर फल लदे
सब पेड़ सुहाने लगते हैं,
जिस वक्त सूखने लगते हैं
क्यूँ बोझ लगने लगते हैं,
हँसी खुशी के लिए आज
जीएसटी देनी पड़ती है
क्यूँ अपना समझने वाले की
गनती ही करनी पड़ती है
खेतों में खेती करने वाले भी
क्यूँ बीज स्वार्थ का बोते हैं
अपना अपना वर्चस्व दिखाकर
अपनी ताकत दिखलाते हैं
दुनिया रूपी बाजार में अब तो
नफरत का व्यापार होता है
मनमानी कीमत वसूलने का
घर घर में खेला होता है
सब कहते है ऊपर वाले का
दुनिया में खेल निराला है,
गम को भुलाने के लिए आज
हर नुक्कड़ पर मधुशाला है।

000

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor