(नीलम व्यास स्वयंसिद्धा पेशे से शिक्षिका हैं। आपकी कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। आप श्री जागृति संस्थान की वरिष्ठ सदस्या हैं और पिछले कई वर्षों से काव्य सृजन कर रही हैं। आपकी कविताओं में मानव प्रेम, पर्यावरण, राष्ट्रीय भावना, अध्यात्म, करुणा, सामाजिक सद्भाव और समसामयिक विषयों का समावेश रहता है। यहां नीलम की कुछ कविताएं प्रस्तुत हैं, आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा -संपादक)
ऐसा गीत लिखो…
ऐसा गीत लिखो कविवर अब,
जन जन चेतन हो जाए।
शब्द शब्द में भरो प्रेरणा,
गीत सकल जन जन गाए।
छू ले मन को बोल रसीले ,
वाणी से रसधार बहे।
होठों पे सबके हो गीत मधुर,
सच्चे उर से लिखे कहे ।
झलके पीर गीत से यूँ,
अश्रु नयन में भर आए।
ऐसा गीत लिखो कविवर अब,
जन जन चेतन हो जाए।
महज कल्पना मत भरना कवि,
सच की आँच जगा देना।
प्रेम भरे तुम गीत सुना के,
पीर हृदय की हर लेना।
ऐसे सुर लय राग सजाओ,
प्रज्ञा चक्षु जागृत हो पाए ।
ऐसा गीत लिखो कविवर अब,
जन जन चेतन हो जाए।
हिंसा बैर नाश हो जिससे ,
वो पंचम राग सुनाओ।
लोक हित की बात हो जिसमें ,
ऐसा गीत गुनगुनाओ।
अपने मन की सच्चाई जब ,
निखर गीत में मुस्काए।
ऐसा गीत लिखो कविवर अब,
जन जन चेतन हो जाए।
ऐसा गीत लिखो कविवर अब,
जन जन चेतन हो जाए।
शब्द शब्द में भरो प्रेरणा,
गीत सकल जन जन गाए।
कुछ हाइकू
वक्त के खेल
वक्त पाखी सा
उड़ता मनाकाश
थाह ना मिली।
हर पल में
बीते पल की यादें
घुली मिली सी।
वक्त दरिया
खेवे मन माझी सा
हौले हौले से।
मंझधार में
मत छोड़ो यूँ साथी
साक्षी है वक्त।
बदला लेता
वक्त करता न्याय
सुन मनुज।
हार ओ जीत
बैर करो या प्रीत
होता है वक्ती।
चुन चुन के
कलियां वक्त लाया
प्रेम सौगात।
सत्ता पलट
दावेदार झूठे ही
करता वक्त।
हँसना रोना
मिलना बिछुड़ना
खेल वक्त के।
खेल कर्मों के
खेलना सोच कर
न्यायी वक्त।
बुझा बुझा है
खिला खिला भी कभी
रहता वक्त।
लेता परीक्षा
कठोर जिंदगी की
न्यायधीश सा।
राजा से रंक
पल भर में ही तो
बनाता वक्त।
बेआवाज है
लाठी वक्त की दोस्तों
संभलो ज़रा।
मिले मुश्किल
अपना सा वक्त ये
हो बेरहम।
कदर करो
वक्त न आये फिर
यारों!दोबारा।
साक्षी वक्त है
मेरे प्रेम का साथी
समझ जरा।
बेवक्त मत
जाओ कही भी यूँ ही
घटे कदर।।
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भीख मांगती वो…
गली गली में
घूमे बेचारी हाय!
रोती रहती
भीख माँगती वो ,जो
है प्रश्न चिन्ह ? देखो
जलतें पाँव
गर्म दुपहरी में
तपती धरा
मिली न भीख पूरी
भूखे बच्चों के लिए।
दर दर वो
भटकी बेचारी सी
खाती ठोकरें
झिड़कियाँ तानें
अध नंगी देह पे।
घूरे हैं जाते
आते जाते लोग यूँ
उजली काया
झाँके जो फटे चीर
समझें कौन पीर?
बासी रोटियाँ
कम पड़ी आज तो
सहेगी भूख
वहीं माँ जो बेचारी
विपदा की वो मारी।
भूखे बच्चे
निगलें फटाफट
बासी भोजन
लार टपका रहे
कुत्ते भी देखकर।
देती टुकड़ा
रोटी का भिखारन
कुत्ते को रोज
अपना ही तो मान
खुद आधी भूखी वो।
नियति यही
माँगे भीख नित ही
भिखारी टोली
टूटे कटे अंग ही
भीख मंगवाते हैं।
प्रश्न चिन्ह ये
सभ्य भारत माथे
जवाब माँगे
कौन देगा जवाब?
नेता या अफ़सर।
काँटों के जैसे
भ्रष्टाचारी देश में
लूटे देश को
उनसे अच्छे ये
भिखारी होते देखो।
माँगते भीख
रो गिड़गिड़ाकर
पर लूटे ना
देके धोखा सबको
बन के नेता प्यारे।
प्रकृति सा हो
सभ्य समाज ऐसा
माँगे न भीख
मजबूर कोई भी
कमाते श्रम से ही।
कलंक शशि
भीख वृत्ति देश पे
मेटो मिल के।
मरें भूखा ना कोई
जन जन पुकार।
उगे सूरज
समता का जग में
समभाव से
फलित मानवता
मिटती दानवता।।
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