(प्रख्यात जैन संत परमपूज्य पंकजप्रभु महाराज का चातुर्मास बुधवार से एक अज्ञात स्थान पर अपने आश्रम में शुरू हुआ। पंकज प्रभु अपने चातुर्मास के दौरान चार माह तक एक ही स्थान पर विराजमान होकर अपने चैतन्य से अवचेतन को मथने में लगे रहेंगे। वे और संतों की तरह प्रवचन नहीं देते। उन्हें जो भी पात्र व्यक्ति लगता है उसे वे मानसिक तरंगों के जरिए प्रवचन देते हैं। उनके पास ऐसी विशिष्ट सिद्धियां हैं, जिससे वे मानव मात्र के हृदय की बात जान लेते हैं और उनसे संवाद करने लगते हैं। उनका मन से मन का कनेक्शन जुड़ जाता है और वे अपनी बात रखते हैं। वे किसी प्रकार का दिखावा नहीं करते। उनका असली स्वरूप आज तक किसी ने नहीं देखा। उनके शिष्यों ने भी उन्हें आज तक देखा नहीं हैं। क्योंकि वे अपने सारे शिष्यों को मानसिक संदेश के जरिए ही ज्ञान का झरना नि:सृत करते हैं। उनकी अंतिम बार जो तस्वीर हमें मिली थी उसी का हम बार-बार उपयोग कर रहे हैं क्योंकि स्वामीजी अपना परिचय जगत को फिलहाल देना नहीं चाहते। उनका कहना है कि जब उचित समय आएगा तब वे जगत को अपना स्वरूप दिखाएंगे। वे शिष्यों से घिरे नहीं रहते। वे साधना भी बिलकुल एकांत में करते हैं। वे क्या खाते हैं? क्या पीते हैं? किसी को नहीं पता। उनकी आयु कितनी है? उनका आश्रम कहां है? उनके गुरु कौन है? ऐसे कई सवाल हैं जो अभी तक रहस्य बने हुए हैं। जो तस्वीर हम इस आलेख के साथ प्रकाशित कर रहे हैं और अब तक प्रकाशित करते आए हैं एक विश्वास है कि गुरुदेव का इस रूप में हमने दर्शन किया है। लेकिन हम दावे के साथ नहीं कह सकते हैं कि परम पूज्य पंकजप्रभु का यही स्वरूप हैं। बहरहाल गुरुदेव का हमसे मानसिक रूप से संपर्क जुड़ा है और वे जगत को जो प्रवचन देने जा रहे हैं उससे हूबहू रूबरू करवा रहे हैं। जैसा कि गुरुदेव ने कहा था कि पहला प्रवचन वे ‘ईश्वर’ शब्द पर देंगे। वे चार महीने तक रोज एक शब्द को केंद्रित करते हुए प्रवचन देंगे। प्रवचनों की पहली कड़ी में पेश है ‘ईश्वर’ शब्द पर उनके प्रवचन।)
गुरुदेव बोल रहे हैं-
हे मानव! ईश्वर के बारे में ईश्वर ही कुछ बता सकता है। ईश्वर की जब किसी पर विशेष कृपा होती है तभी ईश्वर को कोई जान सकता है। जब महाभारत का युद्ध शुरू होता है और कुरुक्षेत्र में अर्जुन हथियार नहीं उठा पाते तब जो स्वरूप अर्जुन को दिखाया गया- दरअसल वही ईश्वर का असली स्वरूप है। ईसा मसीह, मुहम्मद साहब, नानक, बुद्ध और चाहे कोई ईश्वरीय स्वरूप रहे हों, वे ईश्वर नहीं उनके स्वरूप हैं। श्रीकृष्ण ही असली ईश्वर हैं। संपूर्ण ईश्वर हैं। इस जगत में समय-समय पर कई अवतार हुए। आज उन्हें दुनिया अलग अलग धर्मों में अलग अलग रूप में पूजती है। आराधना करती है। इबादत करती है। मगर ईश्वर का असली स्वरूप केवल अर्जुन ने अपनी आंखों से देखा है। या फिर श्रीकृष्ण ने दूत कार्य के दौरान अपना विराट स्वरूप दिखाया है। श्रीकृष्ण प्रेम के देवता है। श्रीकृष्ण राजनीति के ज्ञाता हैं। श्रीकृष्ण मायावी है। श्रीकृष्ण त्रिकालदर्शी हैं। श्रीकृष्ण छलिया हैं। श्रीकृष्ण के वे सभी स्वरूप है जो शिशुपाल ने गाली रूप में ही सही उनके बारे में कहे हैं, मगर ये श्रीकृष्ण खुद तय करते हैं कि किसको क्या सजा देनी है। वे हर बात का न्याय अपने ढंग से करते हैं। क्योंकि श्रीकृष्ण के सामने जितने भी लोग हैं उनकी कहानियां श्रीकृष्ण उनके जन्म के साथ ही लिख देते हैं। कंस की कहानी उसके जन्म के साथ श्रीकृष्ण ने लिख दी थी। कौरवों का संहार कैसे होना है, इसकी कहानी श्रीकृष्ण ने उनके जन्म के समय ही लिख दी थी। श्रीकृष्ण ऐसे देवता हैंं जो हर क्षण जागृत रहते हैं। वे मन की बात जान लेते हैं। उनके स्वरूप को सामान्य आंखों से नहीं देखा जा सकता। श्रीकृष्ण ही ईश्वर का पूर्ण स्वरूप हैं। श्रीकृष्ण का देवत्व स्वरूप में नहीं बंधा है। जो हम टेलीविजन पर श्रीकृष्ण की छवि बनाए हुए हैं, दरअसल वे श्रीकृष्ण नहीं हैं। क्योंकि श्रीकृष्ण का स्वरूप कोई देख नहीं पाया है। उसे केवल अर्जुन ही देख पाया है। मगर इस स्वरूप को जानना है तो गीता का सार समझना होगा। वाकई गीता श्रीकृष्ण का स्वरूप है। जब यह जगत नहीं रहेगा तब भी श्रीकृष्ण का स्वरूप रहेगा। 24 तीर्थंकरों का वास भी श्रीकृष्ण में है। आदिनाथ से लेकर महावीर तक श्रीकृष्ण के ही अंश हैं। हे मानव मैं तुम्हें इस गूढ़ रहस्य से अवगत करवा रहा हूं कि ईश्वर और कोई नहीं साक्षात श्रीकृष्ण ही है।
वैसे देखा जाए तो श्रीकृष्ण शून्य हैं। शून्य ही परमशक्तिमान सत्ता है। इस शून्य में पूरा ब्रह्मांड समाया हुआ है। यह शून्य दरअसल चैतन शक्ति है। चेतन शक्ति ही श्रीकृष्ण है। श्रीकृष्ण चेतन स्वरूप में भी है और अवचेतन स्वरूप में भी। श्रीकृष्ण पदार्थ के हर रूप में है और पदार्थ से परे भी हैं। पदार्थ होता है तो नष्ट होना उसका गुण होता है, मगर श्रीकृष्ण पदार्थ होते हुए भी पदार्थ नहीं है, इसलिए वे नष्ट नहीं हो सकते। मगर श्रीकृष्ण जब चाहे पदार्थ का रूप धारण कर सकते हैं। श्रीकृष्ण की व्याख्या तो स्वयं श्रीकृष्ण ही कर सकते हैं। हमें साधना से जो कुछ अर्जित हुआ है वही हम ज्ञान आप तक पहुंचा रहे हैं। हमने हमेशा श्रीकृष्ण की साधना की है। श्रीकृष्ण को ही हमने संपूर्ण ईश्वर के पूर्ण स्वरूप में देखा है। इसलिए हे मानव अगर किसी को पूजना है तो ईश्वर को पूजो। ईश्वर की साधना करो- श्रीकृष्ण की साधना करो। श्रीकृष्ण ही इस जगत के पालक हैं। सारा जगत श्रीकृष्ण के इशारों पर चलता है। इस सृष्टि का संचालनकर्ता श्रीकृष्ण ही हैं। श्रीकृष्ण हिंदू है? श्रीकृष्ण धर्म-जात से परे हैं। श्रीकृष्ण किसी धर्म विशेष से बंधे नहीं हैं। श्रीकृष्ण तो ऐसी शक्ति है जो समय-समय पर हर धर्म में अवतार लेती रही। इसलिए हे मानव हम जिस श्रीकृष्ण की बात कर रहे हैं वो ना तो हिंदू है, ना मुसलमान है, ना ईसाई है, ना सिख है और ना ही बौद्ध है। श्रीकृष्ण तो संपूर्ण मानवता के संरक्षक है। श्रीकृष्ण को समझना है तो दूध में मलाई, छाछ में मक्खन को समझना होगा। ईश्वर हमेशा अदृश्य रहते हैं। मगर उन्हें दूध की तरह गर्म करके मलाई रूप में देखा जा सकता है। उन्हें छाछ को मथकर मक्खन की तरह देखा जा सकता है। सूरदास ने श्रीकृष्ण को अंधी आंखों से देखा है। रसखान ने उन्हें करीब से देखा है। रसखान मुसलमान थे, लेकिन उन्होंने श्रीकृष्ण की साधना की। वास्तव में श्रीकृष्ण किसी धर्म से बंधे नहीं है। सारे धर्म श्रीकृष्ण से शुरू होते हैं और श्रीकृष्ण में आकर समाहित हो जाते हैं। हम जो बात आपको श्रीकृष्ण के बारे में बता रहे हैं वो प्रायोजित नहीं है। हम ना ही झूठ बोल रहे हैं। हमने श्रीकृष्ण को देखा है। हमने उस पदार्थ को देखा है जो पदार्थ नहीं है और पदार्थ हैं भी। क्योंकि श्रीकृष्ण ही चेतन्य शक्ति है जो पदार्थ के सभी गुण रखते हुए भी पदार्थ से परे हैं। जब-जब धरती पर संकट आएगा श्रीकृष्ण फिर से अवतार लेंगे। वे किसी भी रूप में आ सकते हैं। श्रीकृष्ण ऐसा शक्ति पुंज है जिसमें असंख्य सूरज से ज्यादा आग है। श्रीकृष्ण ऐसा शक्तिपुंज है जिसमें करोड़ों परमाणु से ज्यादा ताकत है। श्रीकृष्ण ही ब्रह्मांड को अपने भीतर समाहित किए हुए हैं। जब-जब इस जगत की कहानी लिखी जाएगी, श्रीकृष्ण की कहानी जीवंत होगी। क्योंकि यह जगत मिथ्या हो सकता है श्रीकृष्ण नहीं। जगत का नाश हो सकता है श्रीकृष्ण का नहीं। इस जगत के जगदीश्वर केवल श्रीकृष्ण हैं।
हे मानव, आज इस परम सत्य को जान लो कि श्रीकृष्ण ही ईश्वर है। हो सकता है मुस्लिम धर्म के लोग श्रीकृष्ण को ईश्वर नहीं मानते हो। ईसाई धर्म के लोग श्रीकृष्ण को ईश्वर ना मानते हो। मगर इससे सत्य मिथ्या नहीं हो जाता। आदिनाथ से लेकर महावीर तक सभी 24 तीर्थंकर श्रीकृष्ण का अंश हैं। श्रीकृष्ण इस ब्रह्मांड के रचयिता है। श्रीकृष्ण में ही दुनिया की सारी शक्तियां समाहित है। श्रीकृष्ण में ही प्रलय है। श्रीकृष्ण में ही लय है। श्रीकृष्ण में रंग है। श्रीकृष्ण में ही गंध है। श्रीकृष्ण में ही सुर है। श्रीकृष्ण में शब्द है। श्रीकृष्ण में शस्त्र हैं। श्रीकृष्ण में ही शास्त्र हैं। श्रीकृष्ण ही आरंभ है। श्रीकृष्ण ही अंत है। श्रीकृष्ण अंत के बाद अनंत भी है। श्रीकृष्ण का सफर कभी खत्म नहीं होता। श्रीकृष्ण को जानना संभव नहीं है। श्रीकृष्ण बांसुरी में है। श्रीकृष्ण गौधन में है। श्रीकृष्ण गोवर्धन में है। श्रीकृष्ण राधा में है। श्रीकृष्ण गोप-गोपियों में हैं। श्रीकृष्ण रुक्मणि में है। श्रीकृष्ण जेल में है। श्रीकृष्ण में ही जेल है। श्रीकृष्ण बंधन है। श्रीकृष्ण बंधन से परे है। श्रीकृष्ण चक्रधारी है। श्रीकृष्ण सर्पधारी है। श्रीकृष्ण ही साक्षात ब्रह्मा है। श्रीकृष्ण एक हैं, मगर सारे स्वरूप श्रीकृष्ण के स्वरूप ही है। इसलिए हे मानव! श्रीकृष्ण के स्वरूप को नमन करो। श्रीकृष्ण की अगुवानी करो। श्रीकृष्ण की भक्ति करो। श्रीकृष्ण का ध्यान करो। श्रीकृष्ण को ही अपने भीतर धारण करो। श्रीकृष्ण से ही जन्म है। श्रीकृष्ण से ही अंत है। श्रीकृष्ण की तृष्णा अगर मन में रखोगे तो कभी प्यासे नहीं रहोगे। जगत की प्यास कभी नहीं बुझती, मगर श्रीकृष्ण नाम का रसपान करने के बाद कभी प्यास लगती नहीं। हे मानव! मैं ऐसे श्रीकृष्ण को अपने हृदय में धारण करते हुए आज उन्हें प्रणाम करते हुए अपनी वाणी को विराम देता हूं। जयश्री कृष्ण।




