Explore

Search

Thursday, July 9, 2026, 3:56 pm

Thursday, July 9, 2026, 3:56 pm

LATEST NEWS

The specified slider does not exist.

Lifestyle

सत्य का सफर कभी खत्म नहीं होगा, सत्य की राह पर चलने वाले भी कभी खत्म नहीं होंगे, क्योंकि श्रीकृष्ण आज भी है, सत्य आज भी है, श्रीकृष्ण सत्यं स्वरूपं : पंकजप्रभु

(प्रख्यात जैन संत परमपूज्य पंकजप्रभु महाराज का चातुर्मास 17 जुलाई से एक अज्ञात स्थान पर अपने आश्रम में शुरू हुआ। पंकजप्रभु अपने चातुर्मास के दौरान चार माह तक एक ही स्थान पर विराजमान होकर अपने चैतन्य से अवचेतन को मथने में लगे रहेंगे। वे और संतों की तरह प्रवचन नहीं देते। उन्हें जो भी पात्र व्यक्ति लगता है उसे वे मानसिक तरंगों के जरिए प्रवचन देते हैं। उनके पास ऐसी विशिष्ट सिद्धियां है जिससे वे मानव मात्र के हृदय की बात जान लेते हैं और उनसे संवाद करने लगते हैं। उनका मन से मन का कनेक्शन जुड़ जाता है और वे अपनी बात रखते हैं। वे किसी प्रकार का दिखावा नहीं करते। उनका असली स्वरूप आज तक किसी ने नहीं देखा। उनके शिष्यों ने भी उन्हें आज तक देखा नहीं है। क्योंकि वे अपने सारे शिष्यों को मानसिक संदेश के जरिए ही ज्ञान का झरना नि:सृत करते हैं। उनकी अंतिम बार जो तस्वीर हमें मिली थी उसी का हम बार-बार उपयोग कर रहे हैं क्योंकि स्वामीजी अपना परिचय जगत को फिलहाल देना नहीं चाहते। उनका कहना है कि जब उचित समय आएगा तब वे जगत को अपना स्वरूप दिखाएंगे। वे शिष्यों से घिरे नहीं रहते। वे साधना भी बिलकुल एकांत में करते हैं। वे क्या खाते हैं? क्या पीते हैं? किसी को नहीं पता। उनकी आयु कितनी है? उनका आश्रम कहां है? उनके गुरु कौन है? ऐसे कई सवाल हैं जो अभी तक रहस्य बने हुए हैं। जो तस्वीर हम इस आलेख के साथ प्रकाशित कर रहे हैं और अब तक प्रकाशित करते आए हैं एक विश्वास है कि गुरुदेव का इस रूप में हमने दर्शन किया है। लेकिन हम दावे के साथ नहीं कह सकते हैं कि परम पूज्य पंकजप्रभु का यही स्वरूप हैं। बहरहाल गुरुदेव का हमसे मानसिक रूप से संपर्क जुड़ा है और वे जगत को जो प्रवचन देने जा रहे हैं उससे हूबहू रूबरू करवा रहे हैं। जैसा कि गुरुदेव ने कहा था कि वे चार महीने तक रोज एक शब्द को केंद्रित करते हुए प्रवचन देंगे। आज स्वामीजी ‘सत्य’ शब्द पर अपने प्रवचन दे रहे हैं।)

गुरुदेव बोल रहे हैं-

सत्य। जो वासुदेव श्रीकृष्ण ने कहा वही सत्य है। जो कुछ है सब सत्य है यानी नासतो विद्यते भावो अर्थात जो कुछ है वह अपने सहित सब परमात्मा है। यानी मत्त: परतरं नान्यत किंचिदस्ति धनन्जय…श्रीकृष्ण गीता के 11वें अध्याय में कहते हैँ और वह परमात्मा यह प्रत्यक्ष विश्व ही है-पश्य में पार्थ रूपाणि, वासुदेव: सर्वम इति। वाक्यों, कथनों, विश्वासों, विचारों या प्रस्तावों का वह गुण जिसे साधारण वार्तालाप में, तथ्यों से सहमत होने या मामला क्या है, यह बताने के लिए कहा जाता है- सत्य है। सत्य 9 प्रकार का होता है- 1 व्यावहारिक सत्य, 2 वास्तविक सत्य, 3 निजी सत्य, 4 सार्वभौमिक सत्य, 5 अर्द्ध सत्य, 6 पूर्ण सत्य 7 भूतकालीन सत्य 8 वर्तमान सत्य और 9 भावी सत्य।

हे मानव अब इन 9 सत्य के बारे में संक्षेप में बताता हूं। 1 व्यावहारिक सत्य क्या है? जैसा देखा, जैसा सुना और जैसा अनुभव किया, उसको वैसा ही बोलना व्यावहारिक सत्य कहलाता है। व्यवहारिक सत्य में हो सकता है, जो एक के लिए सत्य है, वो दूसरे के लिए असत्य हो। वैसे तो हर व्यक्ति अपने मुताबिक अपना सत्य बना लेता है। 2 वास्तविक सत्य क्या है? ऐसे सत्य को किसी समर्थन या व्याख्या की जरूरत नहीं होती- जैसे मृत्यु अंतिम सत्य है। इस तथ्य से कोई इनकार नहीं कर सकता। जो आया है उसे जाना है। जो जन्म लेता है उसको मृत्यु अवश्य आती है। इसलिए मृत्यु ही वास्तविक सत्य है। वास्तविक सत्य को घटाया बढ़ाया नहीं जा सकता। वास्वतिक सत्य का अर्थ है किसी मामले की वास्तविक स्थिति, वास्वतिकता का पालन या निर्विवाद तथ्य। 3 निजी सत्य- हे मानव निजी सत्य वो है जो खुद के लिए सत्य है। मेरे पेट में दर्द हो रहा है, यह मेरे लिए निजी सत्य है, लेकिन लोगों को क्या पता कि मेरे पेट में दर्द हो रहा है, लोगों की नजर में मैं बहाना भी बना सकता हूं, झूठ भी बोल सकता हूं, यानी जो मेरे लिए यानी निजी सत्य हो वह दूसरों के लिए सत्य हो यह जरूरी नहीं। 4 सार्वभौमिक सत्य- हे मानव जो सार्वभौतिक सत्य है। इसे वैज्ञानिक सत्य कह सकते हैं। यह सत्य सबके लिए समान रूप से सत्य होता है- सूर्य पूर्व दिशा से उदय होता है और पश्चिम में अस्त होता है-यह सार्वभौमिक सत्य है। 5- अर्द्ध सत्य- महाभारत में जब युधिष्ठिर कहते हैँ अश्वत्थामा हतोहत: वह अर्द्ध सत्य होता है। यानी अश्वत्थामा की मौत हो गई है। अश्वत्थामा मरा नहीं था पर अश्वत्थामा नाम का हाथी मर गया था। अर्द्ध सत्य की यही परिभाषा है। अर्द्ध सत्य में कही बातें पूर्ण सत्य नहीं होती, मगर पूरी तरह असत्य भी नहीं होती। इसे ही अर्द्ध सत्य कहा जाता है। 6-पूर्ण सत्य- श्रीकृष्ण ही पूर्ण सत्य है। जो पूर्ण तत्व है वहीं पूर्ण सत्य हो सकता है। हो सकता है हे मानव तुम श्रीकृष्ण को पूर्ण सत्य ना मानो। क्योंकि तुम्हारी नजर में अपने-अपने भगवान है, मगर निर्विवाद रूप से श्रीकृष्ण ही संपूर्ण सत्य है। यह बात मैं प्रवचन रूप में ही नहीं कह रहा हूं, मैंने साधना चक्षुओं से प्रत्यक्ष रूप से इस सत्य के दर्शन किए हैं। इसलिए श्रीकृष्ण ही संपूर्ण सत्य है। यहां जो मैँने नौ सत्य बताए हैँ ये सभी नौ सत्य मिलकर श्रीकृष्ण अंतिम सत्य के रूप में हमारे सामने आते हैँ। 7 भूतकालीन सत्य- हे मानव भूतकालीन सत्य से आशय है जो भूतकाल में सत्य था मगर अब वह उस रूप में सत्य नहीं है। शक्कर जब दूध या चाय में मिल जाती है जो शक्कर चाय और दूध में दिखाई नहीं देती जबकि भूतकाल में शक्कर सत्य थी। शक्कर भूतकाल में दिखाई दे रही थी इसलिए वह भूतकाल में सत्य थी, लेकिन वर्तमान में शक्कर अहसास है, पर सत्य नहीं है। 8 वर्तमान सत्य- तेज हवा चल रही है यह वर्तमान सत्य है, लेकिन थोड़ी देर बात हवा थम जाती है तो जरूरी नहीं कि वह उस समय उसी रूप में सत्य हो क्योंकि अब तेज हवा नहीं है। इसलिए जो वर्तमान में सत्य हो उसका आगे जाकर उसी रूप में सत्य हो जरूरी नहीं। 9 भावी सत्य- जो भूतकाल में सत्य नहीं है, वर्तमान में भी सत्य नहीं है, लेकिन भविष्य में सत्य हो सकता है- पृथ्वी के अलावा किसी ऐसा ग्रह जहां जीवन हो। अभी तक हम इस सत्य को केवल अंदाजा लगा रहे हैं, लेकिन यदि भविष्य में ऐसा ग्रह खोज लिया जाता है तो वह भविष्य का सत्य हो जाता है।

संज्ञा के रूप में सत्य के कई अन्य अर्थ भी हैं। सत्य वास्तविकता के उस संस्करण को संदर्भित करता है जिसमें हम मौजूद हैं। संसार का सबसे बड़ा सत्य मृत्यु ही है। क्योंकि इससे संसार का कोई भी व्यक्ति इनकार नहीं कर सकता क्योंकि एक ना एक दिन सभी को ये संसार त्यागना है। अब प्रश्न ये उठता है मृत्यु के पश्चात क्या होगा। भगवद गीता में कृष्ण कहते हैं कि जो आज सत्य है लेकिन कल सत्य नहीं है, वह वास्तव में सत्य नहीं है। सत्य शाश्वत है। यह सभी लोगों के लिए हर समय और हर जगह सत्य है।

सत्य या सच को वेद में ब्रह्मांड का आधार बताया गया है। मुंडक उपनिषद में वर्णित भारत का आदर्श वाक्य ‘सत्यमेव जयते’ सबसे पवित्र माना गया है। सत्य वह है, जो जैसा कहा जाए, वैसा बोला और लिखा भी जाए। जो पूरी तरह यथार्थ या संपूर्ण हो। जिसमें एक प्रतिशत भी अपूर्णता न हो, जिसमें किसी तरह का दोष न हो। वैदिक वांग्मय के अनुसार सत्य के बगैर सृष्टि की सत्ता संभव ही नहीं है। सत्य को ईश्वर और ईश्वर को सत्य कहा गया है। वेद में सत्य और ऋत् दोनों की महत्ता बताई गई है। ब्रह्मांड का आधार सत्य है तो ऋत ब्रह्मांड का नियम है। सृष्टि आधार और नियम के बगैर आगे नहीं बढ़ सकती है। हम समझ सकते हैं कि सत्य की शक्ति कितनी है। स्वाभाविक है कि जो सारे ब्रह्मांड का आधार हो, वही सर्वोच्च शक्ति होगी। ब्रह्मांड में जितने ग्रह-उपग्रह हैं, सबका अस्तित्व और स्वभाव सत्य से ही निर्धारित होता है। यह बात अलग है कि इसमें कितना शुभ है और कितना अशुभ है। इसलिए सत्य को त्याग कर ब्रह्मांड और विज्ञान का अस्तित्व नहीं बना रह सकता है।

अब प्रश्न उठता है कि अंधकार और प्रकाश में, दिन और रात में, शुभ और अशुभ में, हिंसा और अहिंसा में किसमें सत्य है और किसमें असत्य है? हालांकि दोनों में सत्य है। अंधकार भी सत्य है, लेकिन शुभ नहीं है और प्रकाश भी सत्य है, लेकिन यह शुभ है। शुभ के साथ जो लाभ प्राप्त होता है वही सच्चा सुख देने वाला है। इसलिए एक साथ शुभ-लाभ लिखा जाता है। हमारा विकास सच्चा होने के साथ, शुभ भी होना चाहिए। अन्यथा ऐसा विकास निर्थक होगा। शुभ से संसार में शुभता बढ़ती है और अशुभ से अशुभता। अशुभ सत्य नहीं है। इसलिए सत्य की विजय के लिए ही प्रयत्न करते रहना चाहिए। जब तक विश्व में सत्य की प्रतिष्ठा हर जगह नहीं होगी, तब तक समाज बे-नियम यानी ऋत से रहित रहेगा। हमारे यहां कहा गया है कि सत्यं शिवं सुंदरम…सत्य ही शिव है और सुंदर है…लेकिन सत्य शिव तो है लेकिन सुंदर हो यह जरूरी नहीं। आज पृथ्वी पर सत्य बोलना सुंदर नहीं रह गया है। शिव को तो हे मानव तुम सत्य मानते हो मगर जो वास्तव में सत्य बोलता है वह तुम्हें सुंदर लगे यह जरूरी नहीं।

सत्य को हमेशा संघर्ष करना पड़ता है। पर हे मानव सत्य हमेशा विजयी होता है। सत्य कभी पराजित नहीं हो सकता। श्रीकृष्ण सत्य के लिए असत्य को भी धारण कर लेते हैं। लेकिन सत्य की जंग में जीत हमेशा श्रीकृष्ण की होती है। क्योंकि सत्य ही पूर्ण श्रीकृष्ण है। सत्य और न्याय में अंतर होता है। जहां सत्य हो वहां न्याय हो यह जरूरी नहीं। हे मानव तुम्हारे यहां अदालतों में सत्य के नाम पर झूठी गवाहियां दी जाती हैं और न्यायाधीश सत्य के नाम पर न्याय करते हैं। मगर जरूरी नहीं कि जहां सत्य है उसके साथ न्याय हुआ ही हो। इसलिए हे मानव सत्य और न्याय अलग-अलग शब्द है। सत्य को न्याय मान लेना उचित नहीं है। सत्य है वहां न्याय की लड़ाई हो सकती है, मगर जरूरी नहीं कि सत्य के साथ न्याय हो। पर इतना जरूर है सत्य के साथ अन्याय हो सकता है, मगर सत्य को पराजित नहीं किया जा सकता। अंतिम लड़ाई सत्य ही जीतता है। सत्य की जंग में कई बार अन्याय होता है। अन्याय की यात्रा के बाद सत्य वियजी होता है। सत्य की जंग में कई संदर्भ छूट जाते हैं। सत्य की जंग में कई योद्धा मारे जाते हैं। मगर अंतिम जंग सत्य ही जीतता है। क्योंकि सत्यमेव जयते कहा गया है। वाकई सत्यमेव जयते ही होता है। हे मानव आज तुम्हें सत्य के बारे में कुछ बातें बताई। संत इस जगत में सत्य की खोज करते हैँ। सत्य की खोज में संत अपनी साधना करते हैं। साधना और सत्य का सफर चलता रहता है। आज कुछ संतों ने सत्य को और साधना को व्यापार बना दिया है। मगर यह बात हमेशा ध्यान रखनी चाहिए कि साधना, सत्य और संत का सफर मोक्ष की ओर ले जाता है। सत्य एक सफर है। जो युगों युगों से चला आ रहा है। सत्य का सफर कभी खत्म नहीं होगा। सत्य की राह पर चलने वाले भी कभी खत्म नहीं होंगे। क्योंकि श्रीकृष्ण आज भी हैं। सत्य आज भी है। जहां सत्य है वहीं श्रीकृष्ण है। श्रीकृष्ण सत्यं स्वरूपं…श्रीकृष्ण ही सत्य का स्वरूप है। ऐसे सत्य रूपी श्रीकृष्ण को बारंबार नमन। सत्य के बारे में आज इतना ही।

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor