(पूर्व जस्टिस गोपालकृष्ण व्यास की कविताओं में प्रकृति का मानवीकरण प्रस्फुटित होता है। वे शब्दाें इस ढंग से अभिव्यक्त करते हैं कि कविता एक फिल्म की तरह हमारे सामने चित्रित होती है। सरल और सहज शब्दों में लिखना व्यासजी की विशेषता है। यहां प्रस्तुत है उनकी एक और कविता। आपकी प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी-संपादक)
पुष्प की सुगंध
सम्मान सबका करते हैं
आदर सभी से पाते हैं।
छोटी सी इस जिंदगी में
खुशबू बहुत फैलाते हैं।
गुलाब, मोगरा, जुई, चमेली
सुगन्ध के बड़े खजाने हैं।
अंकुरित होकर पौधे लताएं
खुशबू अपनी फैलाते हैं।
अपनी विशेषता के कारण
धरा को स्वच्छ बनाते हैं।
बिना किसी भी भेद भाव के
मानव मन में बस जाते हैं।
मौसम चाहे जितना भी बदले
ना सुगन्ध अपनी बदलते हैं।
अपनी अपनी सुगंध फैलाकर
मुस्कुरा के वापस मुरझाते हैं।
ब्रह्मदेव ने इस सृष्टि को रचकर
काम सभी को बांट दिया।
आकार स्वरूप देकर सबको
सबको कर्तव्य बतला दिया।
अपनी अपनी खुशियों के साथ
जो ख्याल सबका रखते हैं।
वही इंसान दुनिया में आकर
प्रेम का सागर बन जाते हैं।
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