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Friday, July 10, 2026, 3:24 pm

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Lifestyle

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर देश भर के चोटी के रचनाकारों की रचनाएं

(आज जन्माष्टमी है। योगेश्वर श्रीकृष्ण का जन्मदिन। श्रीकृष्ण जो इस धरा और संपूर्ण जगत में संपूर्ण देवों के देव हैं। उन पर देश-विदेश के प्रख्यात रचनाकारों ने राइजिंग भास्कर के लिए रचनाएं लिखी हैं। यहां प्रस्तुत हैं श्रीकृष्ण का आह्वान करने वाली रचनाएं। -संपादक)

गोपालकृष्ण व्यास, पूर्व न्यायाधीश, जोधपुर

सुदर्शन का संदेश

गीता में उपदेश दिया

कर्तव्य क्या है बता दिया,

देवकी के लाल आपने

जीवन जीना सीखा दिया,

संकट चाहे जैसा हो

उससे लड़ना सिखा दिया,

जसोदा के लाल तुमने

धर्म का अर्थ समझा दिया,

ना छोटा कोई ना बड़ा कोई

दुनिया में सब समान है,

सच्चाई के संग चलने वाला

धरती पर अच्छा इंसान है,

विश्वास किसी का तोड़ेगा

पाप से नाता जोडेगा

इस बात को समझने वाला

ना हार किसी से मानेगा,

ना गरीब है ना अमीर हैं

भगवान के सब फरिश्ते हैं,

कृष्ण की पैनी नज़रों में

सुख दुख कर्मो का पाते हैं,

हर रिश्ते से परिवार की

एहमियत भी बड़ी होती है,

अपने सद्कर्मो के कारण

खुशियों की नदियां बहती है

आशक्ति बड़ी बीमारी है

रिश्तों को बड़ा समझती है,

श्रीकृष्ण के उपदेशों से

पुरुषार्थ से ताकत मिलती है,

कुरुक्षेत्र में श्री कृष्ण ने

विराट रूप दिखलाया था,

सुदर्शन चक्र धारण कर

धर्म का मार्ग समझाया था।

000

मेरे कृष्ण

मोर मुकुट धारण कर

होठों पर बंसी सजाई,

सुनकर धुन मुरली की

राधा  दौड़ी दौड़ी आई,

यशोदा  मैया के लाडले,

सबकी  आंखों  के  तारे,

नटखट कान्हा गोकुल के

हर इंसांन को लगते प्यारे,

राधा के मन मे बसने वाले

सखियों के संग रास रचाते,

लीला दिखाकर वृंदावन में

ग्वालों  संग  हुड़दंग  मचाते,

शरण आपकी जो आ जाए

भव सागर  पार  लगाते हो

जब तक  शरीर में सांस रहे

तुम उसकी रक्षा ही करते हो,

नन्द बाबा और यसोदा के

 प्यारे और  राज दुलारे हो,

धरती  की  हर  घटना  को

तुम ही रचते ओर घडते हो,

में जाऊं जब इस दुनिया से

तुम सामने मेरे ,खड़े रहना,

मेरी इस इच्छा को मानकर

मुझ पर अपनी कृपा रखना।

000

अनिल भारद्वाज, एडवोकेट, ग्वालियर हाईकोर्ट

आ गये चक्र सुदर्शन धारी

धरा पर आये मुरलिया वाले,

खुल गए जेल के ताले।

हो रही थी रिमझिम बरसात

अनौखी द्वापर युग की बात

अष्टमी भादों की थी रात,

आ गये बाल कृष्ण मतवाले।

खुल गए जेल के ताले।

कंस का था जो करागार

सो गये उसके पहरेदार

विष्णु का ले अष्टम अवतार

जन्मे मथुरा में बंशी वाले।

खुल गए जेल के ताले।

रंग गोरा था ना काला

पहन कर बैजंतीमाला,

नंद घर आये नंदलाला,

चुराकर माखन खाने वाले।

खुल गए जेल के ताले।

सांवरे के घुंघराले बाल,

चलें वे ठुमक ठुमक कर चाल,

देवकी के आए गोपाल

मोर का मुकुट पहनने वाले।

खुल गए जेल के ताले।

टोकरी से लटकाया पांव

दूर था बहुत नंद का गांव

छोड़ कर आये अपना धाम

बांसुरी मधुर बजाने वाले।

खुल गए जेल के ताले।

तेज थी यमुना की जलधार 

और जाना था नदिया पार

न मानी वासुदेव ने हार

यशोदा माता ने पाले।

खुल गए जेल के ताले।

राधिका बरसाने वारी

जिस पर दिल हारे बनवारी

आ गये चक्र सुदर्शन धारी।

जगत का जिया चुराने वाले।

खुल गए जेल के ताले।

00

रूठा है कैसे मनाऊं

रूठा है तुझको कैसे मनाऊं,

अपने कान्हा को कैसे रिझाऊं।

मेरी मटकी में कंकरिया मारी,

कोरा मन भीगा, भीगी मैं सारी।

अब झुकाऊं या नजरें मिलाऊं,

रूठा है तुझको कैसे मनाऊं ।

प्रीति है मेरी सदियों पुरानी,

तेरी बंशी की हूं मैं दीवानी।

दूर जाऊं या मैं पास आऊं,

अपने कान्हा को कैसे रिझाऊं।

मैंने जी भर के खुद को सजाया,

गोरे पैरों में महावर रचाया ।

तेरी घुंघराले जुल्फें सजाऊं,

रूठा है तुझको कैसे मनाऊं।

गोपियों की निगाहें छुरी सी,

लग न जाए नजरिया किसी की ।

अपने काजल से टीका लगाऊं,

रूठा है तुझको कैसे मनाऊं।

तेरे बिन दिल ये लगता नहीं हैं,

मेरा दिल मेरे बस में नहीं है ।

दिल लगाऊं या दिल को चुराऊं,

रूठा है तुझको कैसे मनाऊं।

00

लीला कृपलानी, वरिष्ठ साहित्यकार, जोधपुर

गुहार

आ जाओ कृष्ण तुम एकबार

फिर बंसी बजाओ एकबार

कितनी करुणा कितने संदेश

पग-पग पर बिखरे पड़े अनेक

हर प्राणों का वह तार-तार

सुनना चाहे अनुराग राग

पाना चाहे मधु स्वर पराग

आ जाओ कृष्ण……

फिर बंसी बजाओ…..।

आंसू कर रहे हैं पथ पखार

गीता के निष्काम कर्म को

भूला बैठा है यह संसार

त्याग-तपस्या की सांसों के

दिन भी बचे हैं चार

आ जाओ कृष्ण……

फिर बंसी बजाओ……

तुम जो आ जाते एक बार

हंस उठते पल में आद्र नयन

धुल जाता ओंठों से विषाद

आ जाती जीवन में बहार

लुट जाता सब संचित विराग

आ जाओ कृष्ण…..

फिर बंसी बजाओ….

000

नीलम व्यास ‘स्वयंसिद्धा’, जोधपुर

कृष्ण अवतार

पाप बढ़ा धरा पे तो,

मचा शोर धरा पे तो,

कृष्ण अवतार हुआ,

नंद उत्सव बहार.

ढ़ोल नौपत बजाई,

घऱ घऱ ख़ुशी छाई,

मंगल है शुभ घड़ी,

रूप कान्हा बलिहार.

शेध नाग फैला फन,

किया छत्र खुश मन,

तेज धार यमुना की,

छुती चरण पखार।

नन्द के आनंद भयो,

लगी झूमने है गायों,

हाथी घोड़ा ओ पालकी,

झूम झूम हो सत्कार।

(2)

माखन मिश्री भावे,

पीताम्बरी देही लावे,

साँवरे चितचोर के,

वैजंती है उर माल.

जसोदा मां हरसाई,

देख मुख सुख पाई,

मंगल गाना बधावा,

जन्मोत्सव हो धमाल.

लेती बलैया मैया,

झूलन जग खिवैया,

नजर दिठौना लगा,

मुख छब है कमाल.

लटे  घुंघराली सोहे,

कान्हा सांवरा मोहे,

गोप गवाल है आये,

देख मुख हो निहाल।

00

कृष्ण का संदेश

देते संदेश कृष्ण हमें,

कर्म प्रधान बनो तुम नर,

हर वक़्त मै नहीं आऊंगा,

बनो कर्मठ कर्मवीर नर.

देते कृष्ण सन्देश हमें,

विवेकवान बनो तुम नर,

खोलो प्रज्ञा चक्षु अपने,

प्रबद्ध संस्कारी बनो तुम नर.

देते कृष्ण संदेश हमें,

बनो मत नर पिशाच नर,

नारी अस्मिता करो रक्षा,

शील गुण आदर्श रखो नर.

देते कृष्ण संदेश हमें,

कलियुगी आचार तजो नर,

भ्र्ष्टाचार हिंसा बैर तजो नर,

सतपथ चल सतयुग लाओ नर.

देते कृष्ण संदेश हमें,

मत भागों दुखों से नर,

दुख हमको मांज देते है,

सुख का सूरज निकसेगा नर.

देते कृष्ण संदेश हमें,

थोथी धार्मिकता तजो नर,

अंधविश्वास,कट्टरता तजो,

मानवता वाद अपनाओ नर.

देते कृष्ण संदेश हमें,

आत्मनिर्भर बन जाओ मनुज,

हो विश्वास खुद पर गहरा नर,

आत्मविजय विश्व विजय हो नर.

देते कृष्ण संदेश हमें,

भोगी से योगी बनो नर,

बाहुबल से जीतो जग,

हिम्मत उर रखो तुम नर।

00

कृष्ण ही बन जाना…

कृष्ण ही बन जाना तुम

मत रोना मत सिसकना तुम,

कलयुग बल पा जायेगा.

बन जुझारू बस लड़ना तुम!

आत तायी बौखला जायेगा.

कृष्ण नाम रटो तुम मन में

कृष्ण उर में बस जायेगा,

मत रहो भरोसे मेरे भी तुम,

कृष्ण कहाँ कहाँ आयेगा.

कृष्ण ने भी कारागार पाया,

जन्म समय में देखो!

सुख सेज मिली कहाँ कृष्ण को,

मनुज यह भी तो लेखो!

छोड़ मातपितु को जाना पड़ा,

नन्द घऱ पला गौ पालक बना.

मामा कंस को मार फर्ज निभाया,

जीवन समर का पर्याय बना.

मत रोओ नर हिम्मत रखो!

कर्मवीर धर्मवीर बनना.

परमुखापेक्षी बनना तजो नर!

बाधाओं के सम्मुख तनना.

खाली हाथ पर हाथ धरने से,

ईश कब आ जाते है?

खुद पर विश्वास रख लड़ने से ही,

रणविजय बन पाते हैं.

सतत कर्म साधना पथ चल,

कांटे फूल बन ही जाते हैं.

स्वाभिमान की आंच से तो,

पत्थर भी पिघल जाते हैं.

कर्म रत चलता जा जीवन पथ पे,

शंखनाद गूंज सुनाना हैं.

मै कृष्ण बतलाता हूं तुमको,

कैसे जीवन सफल बनाना हैं.

मात्र एक जन्मदिन मनाकर,

इतिश्री मत कर लेना तुम.

जीवन जीने की शैली नई बने,

मनुज धर्म निभा लेना तुम.

खुद को खुद ही पहचानो,

खुद को बुलंद कर लो तुम.

पहले मन विजय कर लेना,

कृष्ण जैसे ही बन लो तुम।

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चक्र सुदर्शन करो धारण कृष्ण

इक बार धरा पर आओ कृष्ण,

गूंजे नारी जुल्म की चीत्कार।

चक्र सुदर्शन करो धारण कृष्ण,

मचा हुआ भीषण हाहाकार।

बंगाल में भीषण हत्याकांड से,

हुई है मानवता देखो यूं शर्मसार।

बलात्कारी घूम रहे आजाद वो,

लूट के अस्मत वो नारी लाचार।

चल रहा कलियुगी आचरण,

झूठ कपट हिंसा अत्याचार.

देख भारत की ऐसी दुर्दशा,

चहुदिश शंख पांचजन्य गुंजार।

ऐसी बंशी बजाओ मुरलीधर,

चैन अमन से हो देश गुलजार।

नेता अफसर करे काली कमाई,

फैला चारो ओर देखो भ्र्ष्टाचार।

कालाबाजारी जमाखोरी करते,

व्यापारी लूटे जन को बारम्बार।

बेच नकली दवाई मार डालते

लोभी धन के भरे बेशुमार।

कृष्ण चल रहा तुम्हारे देश में,

चरस गांजा का अवैध व्यापार।

नेता वोट की मांगे भीख है,

कर रहें सत्ता को दागदार।

पुलिस प्रशासन नेता अफसर,

करते विदेशियों से व्यवहार।

लोकतंत्र की उड़ा धज्जियाँ,

नोटों के बल बिके गद्दार।

हे कृष्ण, पधारो करुणाकर,

लोक धर्म स्थापना सत्कार।

मेट भेद समभाव विकसाओ,

प्रेम भाव से पहनाते गलहार।

ऐसी मोहिनी जगाओ लीलाधर,

नारी पूज्य बन करें नित विहार।

सुख का सूरज बन के चमको तुम,

जन जन मनाता जन्माष्टमी त्योहार।

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डॉ. तृप्ति गोस्वामी ‘काव्यांशी’, जोधपुर

कृष्ण जन्म का परिदृश्य

काली स्याह रात  मुसल बरसात थी।

बादल की गर्जना, बिजली तैनात थी।।

फैला चहुंओर विकराल था अंधेरा।

निशीथ काल का वो सख्त था पहरा।।

तारों पर चढ़ा था कवच जलधर का।

मंडरा रहा था साया कालें अंबुधर का।।

भू, शिखर, तरु जल तरित हो चला था।

यमुना नदी में भी उफान बढ़ चला था।।

भयावह से मन बहुत ही डरा था।

निशीथ काल का वो सख्त पहरा था।।

निष्ठुर कंस की थी क्रूर अराजकता।

विद्रोह की भी थी अतिशय प्रबलता।।

गहन उत्पीड़न चित्त को चिर रही थी।

देवकी करुणामय अधीर हो रही थी।।

खौफ मथुरा के प्रतिजन में भरा था।

निशीथ काल का वो सख्त पहरा था।।

व्योम तलक सहसा फिर वात सकारा।

भाद्रपद में आए श्री कृष्ण अवतारा।।

अष्टम तिथि, शुभ दिन था बुधवार।

आभा फैली मानों हुआ जग उद्धार।।

विष्णुजी की सृष्टि का विधान खरा था।

निशीथ काल का वो सख्त पहरा था।।

खुल गए सब पट, सो गए थे पहरेदार।

विष्णुजी का था अद्भुत ही चमत्कार।।

कान्हा को लिए वासु पहुंचे गोकुल धाम।

हुआ हर्षित मन और हृदय अभिराम।।

कृष्णा जन्म से गोकुल हुआ रुपहरा था।

निशीथ काल का वो सख्त पहरा था।।

000

मुस्कान बच्चानी, बिलासपुर

बधाई…

कृष्ण जन्माष्टमी की आज, ले लो बधाई |

हर्ष उल्लास जन-जन में लाओ भाई ||

मयूर पंखी रंग भरे, नैन लगते हैं मनभावन |

चित को करते घायल, यादों में लाते सावन |।

राधा का निश्चल प्यार, कृष्ण की मीठी मनुहार |

कृष्ण – राधा का देखॊ ये कितना पावन है प्यार ||

बालक कृष्ण अंगना में जब पायल पहन चले |

मन हॊ गया पुलकित , मधुर – मधुर संगीत बजे ||

गागर फोड़े गोपिन की , जब माखन चोर कहे सखियां |

मन ही मन हर्षित होते , सारे  गोप और गोपियां ||

सखी ब्रज के सब बाल, हॊके दिल में खुशहाल |

बाहें गरदन में डाल के, सभी नाचे दे दे के ताल ||

000

तमन्ना मतलानी, गोंदिया, महाराष्ट्र

श्यामल सूरत

भोली सूरत श्यामल काया,

रास रचयिता, मुरली बजाने वाले।

गोपियों के संग पग थिरकते,

कान्हा मेरे गौमाता को चराने वाले।

कभी बृज में मटकी फोड़ कर

करते रहते माखन की चोरी।

कभी यशोदा के मुख पर,

अपनी लीलाओं से मुस्कान भरी।

राधा संग अठखेलियों से,

बृज की गलियों में छाए।

प्रेम-प्रीत के रंग में रंगकर,

भक्तों में राधे-कृष्णा कहलाए।

कुरुक्षेत्र में सखा अर्जुन को,

कर्तव्य का बोध कराया।

धर्म का मार्ग दिखाकर,

उनको गीता का ज्ञान पढ़ाया।

हर युग में और हर काल में,

कृष्ण ने धर्म का दीप जलाया।

कर्म की महिमा बताकर,

भक्ति का मार्ग दिखाया।

तुम हो नंदलाला,तुम ही गोपाला,

तुमने ही सजाई ये दुनिया सारी।

श्रीकृष्ण गोविंद हरे मुरारी,

तुम हर लो हमारे जीवन की पीड़ा सारी।

तमन्ना के दिल में बसे हो तुम,

हे वासुदेव, हे जग के आधार।

तुम से ही मेरे जीवन का सार,

हे कन्हैया! तुम्हारी लीला है अपरंपार…..।

000

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor