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19 जनवरी: कश्मीरी हिंदुओं के विस्थापन का भीषण सत्य और 36 वर्षों की अखंड पीड़ा !

कश्मीर में जिहादी अत्याचारों और हिंदुओं के वंशविच्छेद (Genocide) का ज्वलंत सत्य

लेखक : रमेश शिंदे, राष्ट्रीय प्रवक्ता, हिन्दू जनजागृति समिति

19 जनवरी 1990 ! यह वर्ष और यह दिवस याद आते ही आज भी प्रत्येक कश्मीरी हिंदू कांप उठता है। पृथ्वी का स्वर्ग कहे जाने वाले कश्मीर में इसी दिन मानवता को शर्मसार करने वाली घटना घटी थी। 5 हजार वर्ष पुरानी कश्मीर की समृद्ध और पुरातन संस्कृति को नष्ट करने के लिए धर्मांध जिहादी शक्तियों ने हिंदुओं का वंशविच्छेद करना आरंभ किया। वर्ष 1989 से ही कश्मीर में हिंसा और दमन का दौर शुरू हो चुका था, जिसका भयानक विस्फोट 19 जनवरी 1990 की उस कालरात्रि को हुआ। उस दिन कश्मीर घाटी के लगभग 4 लाख 50 हजार हिंदुओं को, यानी वहां की कुल जनसंख्या के 99 प्रतिशत हिंदुओं को अपने ही देश में शरणार्थी होना पड़ा। केवल शरीर पर पहने हुए कपड़ों के साथ, अपना घर-बार और जीवन भर की कमाई छोड़कर उन्हें अपनी जान बचाने के लिए पलायन करना पड़ा। दुनिया के सबसे बड़े और दर्दनाक विस्थापनों में से यह एक था, फिर भी दुर्भाग्यवश उस समय न कोई सरकार उनकी सहायता के लिए आगे आई और न ही कोई मानवाधिकार संगठन।

भय का तांडव और हिंदुओं के सामने रखे गए विकल्प उस दिन स्थानीय समाचार पत्रों के विज्ञापन, दीवारों पर लगे पोस्टर और मस्जिदों के लाउडस्पीकरों से कश्मीरी हिंदुओं को खुली धमकियां दी गई थीं। “यदि कश्मीर में रहना है, तो अल्लाह-हू-अकबर कहना होगा”, “हमें पाकिस्तान चाहिए और हिंदू औरतें चाहिए, मगर उनके मर्द नहीं”, ऐसी रूह कंपा देने वाली घोषणाओं से पूरी घाटी गूंज उठी थी। आतंकियों ने हिंदुओं के सामने केवल तीन ही विकल्प रखे थे ‘रालिव, गालिव और चालिव’ (यानी धर्म बदलो, कश्मीर छोड़ो या मरने के लिए तैयार रहो)। इन धमकियों के आगे झुके बिना जिन्होंने धर्मांतरण से इनकार किया, उन्हें अपनी जान देकर कीमत चुकानी पड़ी। हिंदुओं ने अपनी मातृभूमि और संपत्ति का त्याग कर अपनी अस्मिता बचाने के लिए पलायन स्वीकार किया; परंतु जो पीछे रह गए या भाग नहीं सके, उन पर अमानवीय अत्याचार किए गए।

नृशंस हत्याकांड और दिल दहला देने वाली घटनाएं कश्मीर में हिंदुओं का कत्लेआम, महिलाओं के साथ हुए बलात्कार और मंदिरों का विध्वंस, यह ऐसा इतिहास है जिसे छिपाया नहीं जा सकता। उधमपुर जिले के प्राणकोट हत्याकांड ने क्रूरता की सारी हदें पार कर दी थीं। वहां 26 निर्दोष हिंदुओं की हत्या कर दी गई, जिनमें से कुछ को कुल्हाड़ी से तो कुछ को लाठियों से पीट-पीटकर मार डाला गया। तत्कालीन गृह मंत्री और कांग्रेस के नेताओं ने भी घटनास्थल का दौरा कर इसे ‘पाशविक नरसंहार’ करार दिया था।

ऐसी ही एक दिल दहला देने वाली घटना 8 जून 1999 की है। केवल 6 वर्ष की बच्ची ‘सीमा’ ने अपनी आंखों के सामने जो देखा, वह किसी भी पत्थर दिल इंसान को रुला देगा। आतंकियों ने घर में घुसकर उसके पिता और भाइयों को उसके सामने ही तड़पा-तड़पा कर मार डाला। उसके 13 वर्षीय भाई राजिंदर का सिर धड़ से अलग कर दिया और मां को गोलियों से भून दिया। अपना पूरा परिवार खो चुकी वह नन्हीं सीमा उस दिन अपनी किस्मत के अंधेरे में अकेली रह गई थी। उसे ढाढस बंधाने वाला भी वहां कोई नहीं था।

धार्मिक और सांस्कृतिक विध्वंस केवल लोगों की हत्याएं नहीं हुईं, अपितु हिंदू अस्मिता को भी कुचल दिया गया। 1992 में अयोध्या का ढांचा गिरने के आक्रोश में कश्मीर के अनंतनाग, श्रीनगर, बारामुला और झेलम नदी के तट पर स्थित कई प्राचीन मंदिरों को जमींदोज कर दिया गया। कश्मीर, जहां कभी वेदों का पाठ होता था, वहां 103 से अधिक सांस्कृतिक व धार्मिक संस्थाओं को नष्ट कर दिया गया। 20 हजार घरों में आगजनी की गई और 95 प्रतिशत हिंदुओं के घर लूट लिए गए। अनुमान है कि 93 हजार से अधिक हिंदुओं का कत्लेआम हुआ। आज वहां हिंदुओं के भव्य मकान खंडहर बन चुके हैं और मंदिरों की जगह श्मशान जैसी शांति है।

छिपाया गया सच और ‘फैक्ट’ (FACT) का संघर्ष दुनिया के इतिहास में यहूदियों और अन्य समुदायों पर हुए अत्याचारों का संज्ञान लिया गया, उनके स्मारक बनाए गए; परंतु अपने ही देश में विस्थापित हुए कश्मीरी हिंदुओं का दर्द दुनिया के सामने रखने के लिए कोई आगे नहीं आया। तत्कालीन धर्मनिरपेक्ष सरकारों ने इस सत्य को दबाने का ही प्रयास किया। लेकिन, फ्रांसीसी पत्रकार श्री. फ्रांस्वा गोतिए ने पहल की। उन्होंने ‘फैक्ट’ (FACT – Fight Against Continuing Terrorism) छायाचित्र प्रदर्शनी के माध्यम से कश्मीर और बांग्लादेश में हिंदुओं पर हुए अत्याचारों की भीषण वास्तविकता को दुनिया के सामने रखा। हिन्दू जनजागृति समिति ने भी यह प्रदर्शनी जगह-जगह लगाकर लोगों की आंखें खोलने का कार्य अविरत जारी रखा है।

हिंदुओं, अब तो जागो ! आज 36 वर्षों के बाद भी अधिकांश कश्मीरी हिंदू न्याय की प्रतीक्षा में हैं। कश्मीर का आतंकवाद अब केवल घाटी तक सीमित नहीं रहा है, अपितु वह देश के और हमारे दरवाजे तक आ पहुंचा है। 19 जनवरी के निमित्त इस भीषण वास्तविकता को पुनः रखने का उद्देश्य यही है कि हिंदू अब गाफिल न रहें। राजनीतिक दलों और मीडिया द्वारा छिपाए गए इस सच को जानकर हिंदुओं का संगठित होना समय की मांग है। विस्थापित कश्मीरी हिंदुओं के पुनर्वास के लिए और भविष्य में ऐसा नरसंहार दोबारा न हो, इसके लिए प्रत्येक व्यक्ति को धर्म और राष्ट्र के लिए सक्रिय होना आवश्यक है। उन हुतात्माओं के लिए यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor