Explore

Search

Thursday, February 26, 2026, 3:23 am

Thursday, February 26, 2026, 3:23 am

LATEST NEWS
Lifestyle

मीना हरयानी बनाम पूनम पोहानी मामले में दोषमुक्ति आदेश पर उठे सवाल, क्या साक्ष्यों की गहराई से हुई जांच?

एनआई एक्ट प्रकरण संख्या 6, जोधपुर महानगर: क्या न्याय की कसौटी पर खरा उतरा फैसला?

दिलीप कुमार पुरोहित. जोधपुर

9783414079 diliprakhai@gmail.com

जोधपुर महानगर स्थित विशिष्ट न्यायिक मजिस्ट्रेट (एनआई एक्ट) की अदालत में प्रकरण संख्या 6 में पारित एक निर्णय ने कई कानूनी और सामाजिक प्रश्न खड़े कर दिए हैं। प्रकरण में परिवादी श्रीमती मीना हरयानी जिसके बारे में कहा जाता है कि वह पापड़ बड़ी, सिलाई-कढ़ाई और पानी-पताशे का काम करती है, ने आरोप लगाया था कि उन्होंने अभियुक्त पूनम पोहानी उर्फ पूनम लालवानी को लगभग 9 से 9.5 लाख रुपये उधार दिए थे, जिसके बदले अभियुक्त ने 5,70,000 रुपये का चेक (एचडीएफसी बैंक, चौपासनी रोड, दिनांक 27 जून 2017) जारी किया। चेक 4 सितंबर 2017 को “खाता बंद” (Account Closed) टिप्पणी के साथ अनादरित हो गया।

अदालत ने अंततः अभियुक्त को धारा 138, परक्राम्य लिखत अधिनियम (Negotiable Instruments Act) के आरोप से दोषमुक्त कर दिया। यह निर्णय कानूनी दृष्टि से अंतिम है, परंतु इसकी निष्पक्ष समीक्षा आवश्यक है—विशेषकर तब, जब मामला एक साधारण महिला द्वारा कथित रूप से दिए गए उधार और उसके बदले जारी चेक से जुड़ा हो।

मामले के प्रमुख तथ्य

परिवादी के अनुसार, 2014 में पति के बैंक खाते से 3 लाख रुपये निकाले गए थे और घर में 6–7 लाख रुपये नकद उपलब्ध थे। इन्हीं में से राशि उधार दी गई। हालांकि, उधार देने की सटीक तिथि उन्हें स्मरण नहीं थी।

अभियुक्त ने कई आधारों पर बचाव लिया—

  1. वह परिवादी को जानती ही नहीं।

  2. कोई वैध नोटिस प्राप्त नहीं हुआ।

  3. चेक पर हस्ताक्षर उनके नहीं हैं।

  4. चेक पर तारीख परिवादी ने भरी।

  5. चेक “पर्याप्त राशि न होने” से नहीं, बल्कि “खाता बंद” होने से अनादरित हुआ।

अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर अभियुक्त को दोषमुक्त कर दिया।

धारा 138 एनआई एक्ट: कानूनी परिप्रेक्ष्य

धारा 138 का उद्देश्य चेक लेनदेन की विश्वसनीयता बनाए रखना है। सुप्रीम कोर्ट ने Supreme Court of India के कई निर्णयों में स्पष्ट किया है कि यदि चेक जारी हुआ है और वह अनादरित हुआ, तो धारा 139 के तहत एक विधिक अनुमान (presumption) बनता है कि चेक वैध देनदारी के निर्वहन के लिए जारी हुआ।

रंगप्पा बनाम श्री मोहन (2010) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अभियुक्त पर यह दायित्व है कि वह इस अनुमान को ठोस साक्ष्य से rebut करे। इसी प्रकार कुमार एक्सपोर्ट्स बनाम शर्मा कारपेट्स (2009) में भी स्पष्ट किया गया कि केवल नकार देना पर्याप्त नहीं; संभावनाओं के संतुलन पर प्रतिवाद साबित करना होगा।

यहां प्रश्न उठता है—क्या इस मामले में उस अनुमान को प्रभावी ढंग से लागू और परखा गया?

हस्ताक्षर विवाद और एफएसएल जांच

अभियुक्त ने दावा किया कि चेक पर हस्ताक्षर उनके नहीं हैं। ऐसे मामलों में सामान्यतः हस्ताक्षर की फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (FSL) से जांच करवाई जाती है, ताकि यह स्थापित हो सके कि चेक वास्तव में अभियुक्त द्वारा हस्ताक्षरित है या नहीं।

यदि हस्ताक्षर विवादित थे और उनकी वैज्ञानिक जांच नहीं करवाई गई, तो यह जांच का एक महत्वपूर्ण पहलू अधूरा रह सकता है। न्यायिक प्रक्रिया में तकनीकी साक्ष्य अक्सर निर्णायक भूमिका निभाते हैं।

हालांकि, यह भी ध्यान रखना होगा कि एफएसएल जांच का आदेश देना या न देना न्यायालय के विवेकाधिकार में आता है और यह उपलब्ध सामग्री पर निर्भर करता है।

“खाता बंद” बनाम “पर्याप्त राशि नहीं”

चेक “खाता बंद” टिप्पणी के साथ लौटा। सर्वोच्च न्यायालय ने कई अवसरों पर माना है कि “Account Closed” भी धारा 138 के अंतर्गत आता है, क्योंकि यह देनदारी से बचने का एक रूप हो सकता है।

यदि खाता बंद था, तो यह स्वयं एक गंभीर परिस्थिति है। प्रश्न यह है कि क्या खाता बंद होने का तथ्य अभियुक्त की जिम्मेदारी को कम करता है, या यह और अधिक संदेह उत्पन्न करता है?

तिथि और निकासी का मुद्दा

परिवादी को सटीक तिथि याद न होना बचाव पक्ष के लिए एक मजबूत तर्क बना। बैंक स्टेटमेंट प्रस्तुत न कर पाना भी कमजोरी माना गया।

लेकिन ग्रामीण या कम शिक्षित परिवादियों के मामलों में न्यायालयों ने समय-समय पर यह स्वीकार किया है कि दस्तावेजी सटीकता हमेशा संभव नहीं होती। यहां संतुलन बनाना न्यायालय की चुनौती होती है—भावनात्मक अपील और कानूनी कसौटी के बीच।

विरोधाभासों पर प्रश्न

अभियुक्त का यह कहना कि चेक उन्होंने जारी ही नहीं किया, और साथ ही यह कहना कि तारीख परिवादी ने भरी—दोनों कथनों में विरोधाभास प्रतीत होता है। यदि चेक जारी नहीं किया, तो तारीख भरने का प्रश्न कैसे उठा?

यह बिंदु जांच और जिरह में महत्वपूर्ण हो सकता था। न्यायालय ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर निर्णय दिया, परंतु सार्वजनिक दृष्टि से यह प्रश्न चर्चा का विषय बना हुआ है।

न्याय बनाम संवेदना

कानून साक्ष्य पर चलता है, सहानुभूति पर नहीं। यदि परिवादी ठोस दस्तावेजी साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर पाई, तो अदालत के लिए दोषसिद्धि कठिन हो सकती थी।

फिर भी, यह मामला इस व्यापक प्रश्न को जन्म देता है—क्या साधारण और कम शिक्षित नागरिकों को वित्तीय लेनदेन में पर्याप्त कानूनी जागरूकता और सुरक्षा मिल रही है? क्या उधार देते समय लिखित समझौता, गवाह और बैंकिंग ट्रेल अनिवार्य बनाए जाने चाहिए?

आगे का रास्ता

परिवादी के पास अपील का अधिकार है। उच्च न्यायालय में तथ्य और कानून दोनों की पुनर्समीक्षा संभव है। साथ ही, यह मामला आम नागरिकों के लिए एक सबक भी है—

  • उधार लेनदेन लिखित में करें।

  • बैंकिंग चैनल का उपयोग करें।

  • चेक पर हस्ताक्षर और विवरण की पुष्टि करें।

  • सभी दस्तावेज सुरक्षित रखें।

विश्वास के साथ विधिक सुरक्षा भी उतनी ही जरूरी

विशिष्ट न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा दिया गया निर्णय उपलब्ध साक्ष्यों पर आधारित न्यायिक निष्कर्ष है। परंतु इस प्रकरण ने कई महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं—विशेषकर हस्ताक्षर की जांच, विधिक अनुमान के प्रयोग और “खाता बंद” की व्याख्या को लेकर। न्याय केवल निर्णय नहीं, बल्कि प्रक्रिया की पारदर्शिता और संतुलन भी है। यह मामला बताता है कि वित्तीय लेनदेन में सावधानी और कानूनी जागरूकता कितनी आवश्यक है। अंततः, न्यायालय का आदेश विधिसम्मत है, परंतु समाज के लिए यह एक चेतावनी भी है—विश्वास के साथ-साथ विधिक सुरक्षा भी उतनी ही जरूरी है।

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor