न्यायेतर स्वीकारोक्ति (Extra-Judicial Confession) पर दिया महत्वपूर्ण निर्णय
राइजिंग भास्कर. जोधपुर
जोधपुर हाईकोर्ट ने हत्या से जुडे महत्वपूर्ण मामले में आजीवन कारावास की सजा भुगत रहे आरोपी की सजा को निलंबित कर उसे जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया है। जस्टिस फरजंद अली व जस्टिस संदीप शाह की डबल बेंच ने .न्यायेतर स्वीकारोक्ति व गवाहो क़े अदालत में दिए गए बयान और उनके पक्षद्रोही होने व रिकॉर्ड में पाए गए विरोधाभास को ध्यान में रखते हुए एक महत्वपूर्ण आदेश सुनाया ।
सुनवाई के दौरान अभियोजन कि तरफ से पेश किये गए गवाहों ने पक्षद्रोही बयान दिए, अभियोजन द्वारा हत्या में प्रयुक्त हथियार भी मेडिकल व एफएसएल रिपोर्ट क़े मुताबिक मुल्जिम को जुर्म से नहीं जोड़ता पाया। श्री डूंगरगढ़ क़े जिला न्यायाधीश की अदालत ने 6 अक्टूबर 2025 को आरोपी को भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। ट्रायल कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ आरोपी ने हाईकोर्ट में अपील दायर कर सजा निलंबन की मांग की थी।
अपीलर्थी की तरफ से पक्ष रखते हुवे एडवोकेट जेपी छाँगाणी , विमल छाँगाणी ने कोर्ट का ध्यान जिला न्यायलय द्वारा दिए निर्णय में न्यायेतर स्वीकारोक्ति को मुख्य आधार बनाया की तरफ आकर्षित किया जो कि विधि अनुसार एक कमज़ोर साक्ष्य माना जाता हैं जिसके आधार पर सजा करना न्यायोचित नहीं हैं।








