Explore

Search

Sunday, August 23, 2026, 4:44 am

Sunday, August 23, 2026, 4:44 am

LATEST NEWS
[wonderplugin_slider id=1]
Lifestyle

मुहर्रम त्याग, न्याय और सत्य की रक्षा और अज़मत वाला महीना

लेखक :  कुंवर नियाज़ मुहम्मद,
इस्लामी स्कॉलर,बीकानेर
9828215960

नबियों का ताजदार है नाना हुसैन का
अफज़ल है कुल जहान से घराना हुसैन का

मुहर्रम क्या है? यह कोई त्योहार नहीं है बल्कि इस्लामी कलेण्डर का हिजरी सन नए साल का पहला महीना है। जो पेग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सलल्लाहु अलैहि व सल्लम मक्का से मदीना तशरीफ ले गए तब से हिजरी सन शुरु हुआ।

अरबी भाषा में मुहर्रमुल हराम का मतलब होता है पवित्र, अज़मत, यानी अज़मत वाला महीना। यह इस्लामी चंद्र कलेण्डर और नए साल का शुरुआती समय होता है। इस्लाम धर्म में मुहर्रम को चार पवित्र महीनों में से एक माना जाता है। इन चार पवित्र महीनों को अशहुरुल हुरुम कहा जाता है। पवित्र क़ुरआन की सूरह तौबा में आयत नम्बर-36 में अल्लाह ताला ने फरमाया है कि सृष्टि की शुरुआत से ही साल के 12 महीनों में से चार महीने विशेष आदर और गरीमा वाले हैं। जिन में पहला नम्बर मुहर्रमुल हराम का है, दूसरा महीना रज्जबुल मुरज्जब जो सातवां महीना है यह महीना बाक़ी तीन महीनों से अलग आता है। इस महीने में इसरा और मेअराज का सफर( रसूलुल्लाह का रात का सफर) का तारीखी और ऐतिहासिक वाक़िआ है जो आज तक किसी इन्सान के साथ नही हुआ। तीसरा महीना ज़ुल-क़ाअदा ग्यारहवां महीना, यह हज से ठीक पहला महीना है जिसे ऐतिहासिक तौर पर शांति और युद्ध विराम का समय माना जाता है। चौथा महीना ज़ुल हिज्ज ,जो महीना 12 वां है, यह साल का आखरी महीना है जिस में मक्का की पवित्र हज यात्रा होती है और ईदुल अज़हा मनाई जाती है। इसलिए इन महीनों में जंग या हिंसा जैसी गतिविधियां बिल्कुल वर्जित मानी गई है। इन चार पवित्र महीनों की विशेषताएं-जंग और हिंसा की मनाही-इस्लाम में आने से पहले और बाद में भी इन महीनों के दौरान किसी भी तरह की जंग, आपसी लड़ाई, या किसी तरह का हमला करना पूरी तरह से हराम माना गया है। सवाब और गुनाहों का भार-मुस्लिम विद्ववानों के अनुसार इन महीनों में अच्छे कर्माे जैसे-इबादत करना, दान, सदक़ा देना और रोज़े रखने का सवाब कई गुना बढ़ जाता है और वहीं गुनाहों का बोझ कम और उसकी गंभीरता बढ़ जाती है। सुरक्षित यात्रा की व्यवस्था-प्राचीन काल में इन महीनों को इसलिए मुक़द्दस बनाया गया ताकि लोग बिना किसी डर के व्यापार, हज-ओ-उमराह के सफर के लिए सुरक्षित आ जा सके।

मुहर्रमुल हराम का महीना अपनी तारीखी, मज़हबी और रुहानी अहमियत के तौर पर मुसलमानों के लिए इन्तिहाई अज़मत और अहतराम का महीना है। मुहर्रम का मतलब इज़्ज़त और क़ाबिले अहतराम है।

मुहर्रमुल हराम शौक का महीना है यद्यपि यह नव वर्ष की शुरुआत है मगर इसको खुशी या ग़म की बजाय मातम और शौक के तौर पर मनाया जाता है।

जिस ताज के लिए यज़ीद ने इतने सितम किए
वोह ताज तो मेरे हुसैन के आज भी क़दमों में है।
इस महीने के पहले दस दिन इस्लाम के आखरी पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद सलल्लाहु अलैहि व सल्लम के नवासे हज़रत इमाम हुसैन रज़ियल्ला अनहू और उनके जांनिसार साथियों की शहादत की याद में मनाया जाता है। हज़रत हुसैन रज़ि बरोज़ दो शन्बा 3 शाबान सन हिजरी 4 यानी 8 जनवरी सन 626 में मदीना में मुन्नवरा में पैदा हुए। आपके नाना हुज़ूर सल का जब रबिउल अव्वल सन हिजरी 11 में इंतक़ाल हुआ तब हज़रत हुसैन रज़ि की उम्रे मुबारक सिर्फ 7 बरस की थी। इराक़ के करबला के मैदान में हुई ऐतिहासिक जंग में उन्होंने अन्याय के खिलाफ लड़ते हुए अपनी जानों का नज़राना पेश कर दिया। जो रहती दुनिया तक मज़लूमों के लिए मिसाले राह बनेगा। यह जंग इराक़ के अत्याचारी और ज़ालिम शासक यज़ीद की ज़ालिम हुकूमत के खिलाफ इंसाफ और न्याय की खातिर लड़ी गई। यज़ीद का असली नाम यज़ीद बिन मुआविया था, यह उमैया खिलाफत का दूसरा खलीफा था। जो तीन वर्षों 680 ईस्वी से 683 ईस्वी तक रहा। यज़ीद ने अपनी सत्ता को मज़बूत करने के लिए ज़ुल्म का रास्ता चुना और हज़रत इमाम हुसैन रज़ियल्ला अनहू से भी बैत की मांग की मगर उन्होंने इस्लाम और इंसाफ के खिलाफ मानते हुए इसकी बैत देने की बात ठुकरा दी। यज़ीद ने इमाम हुसैन रज़ियल्ला अनहू और उनके घराने के लोगों के लिए फुरात नदी का पानी बंद कर दिया। यह जंग 10 मुहर्रम सन हिजरी 61 यानी 680 इस्वी को हुई।

करबला में एक तरफ पानी का दरिया था तो दूसरी तरफ प्यास ही प्यास थी
हैरानी की बात यह है कि जो पानी पीते रहे वोह मर गए
वोह जो प्यासे थे वोह आज भी ज़िंदा हैं।
इस्लामी कलेण्डर के मुताबिक़ मुहर्रम के महीने के दसवें दिन को यौमे आशूरा कहते हैं। यौमे आशूरा-इसके बारे में बताया गया है कि महीने का दसवां दिन है, इस रोज़ अल्लाह ताला ने दस नबियों को अलग-अलग महरबानियों से नवाजा है, जिसकी वजह से इसे यौमे आशूरा का नाम दिया गया है। इस दिन जिन नबियों पर महरबानियां फरमाई वे इस तरह से हैं-
इसी दिन अल्लाह ताला ने हज़रत आदम अलैहिस्सलाम के गुनाहों की तौबा क़ुबूल हुई।

इसी दिन हज़रत नूह अलैहिस्सलाम की कश्ती कोहे जूदी पर लगाई थी।
इसी दिन हज़रत इदरीस अलैहिस्सलाम को मक़ामे अरफा में उठाया गया। इसी दिन हज़रत यूसुफ अलैहिस्सलाम को जेल से रिहाई हुई। इसी दिन हज़रत याक़ूब अलैहिस्सलाम की आंखेों की बीनाई लौट आई।
इसी दिन हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम पैदा हुए और इसी दिन उनको नमरुद की आग से निजात दी गई और इसी आग के अलाव को क़ुदरते कामिला ने गुलज़ार (बाग़) में तबदील कर दिया।

इसी दिन हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम और उनकी क़ौम बनी इस्राईल को फिरऔन की गु़लामी से निजात मिली और वोह मिश्र से निकल कर दरिया-ए-नील को पार किया और वादी-ए-तयाह में पहुंचे और फिरऔन उसी दरिया में ग़र्क़ हो गया।

इसी दिन हज़रत अय्यूब अलैहिस्सलाम को बीमारी से अल्लाह ने शिफा दी।
इसी दिन हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम की तौबा क़ुबूल हुई और जिन्नों और इन्सानों पर हुकूमत इनायत फरमाई और इसी दिन हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम से छीनी हुई सल्तनत दुबारा मिली थी।

इसी दिन हज़रत यूनुस अलैहिस्सलाम को अल्लाह ने मछली के पेट से जिंदा बाहर निकाला। इसी दिन हज़रत यूनुस अलै. की क़ौम की तौबा क़ुबूल हुई।
इसी दिन हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम दुनिया में पैदा हुए और इसी दिन इनको अल्लाह ने ज़िंदा आसमान पर उठा लिया। इसी दिन हज़रत इमाम हुसैन रज़ियल्ला अनहू को शहादत नसीब हुई।

इसी दिन यौमे आशूरा को सरवरे कायनात हज़रत मुहम्मद सलल्लाहु अलैहि व सल्लम का नूर तखलीक़ हुआ। ज़माना-ए-जाहिलियत में अहले मक्का खाना-ए-काबा पर गिलाफ चढ़ाया करते थे। इसी दिन को क़यामत आएगी।

तारीख में आया है कि जब हज़रत इमाम हुसैन ने मुहर्रम का चांद देखा तो देखते ही आपकी ज़बाने अक़दस से यही अल्फाज़ निकले-इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन ज़िक्रे हुसैन आया तो आंखें छलक पड़ी। पानी को कितना प्यार है अब भी हुसैन से। नबी सलल्लाहु अलैहि व सल्लम ने यौमे आशूरा यानी 10 मुहर्रम और इससे पहले या बाद, मुहर्रम के रोज़े रखने की खुसूसियत फरमाई है। इसलिए कि ये रोज़े गुनाहों के कफ्फारे बनते हैं। यह महीना मुसलमानों को अपने आमाल का जायज़ा लेने, नबियों की तरफ राग़िब (आकृषित होना ) होने और इस्लामी साल के ऐजाज़ पर अल्लाह की इबादत और शुक्रगुज़ारी में मशगूल होने का बहतरीन मौक़ा फराहम करता है।

मुहर्रम और शिया-सुन्नी मुसलमान-शिया और सुन्नी दोनों मुसलमान मुहर्रमुल हराम महीने को मुक़द्दस मानते हुए अपनी-अपनी तरह से इस में शिरकत करते हैं और इस दिन को अहमियत देते हैं। दोनों ही के लिए यह महीना मुक़द्दस और अज़मत वाला महीना है।

शिया मुसलमान-शिया मुसलमानों के लिए यह महीना खुशी का नहीं बल्कि ग़म और शौक़ का प्रतीक है। हज़रत इमाम हुसैन और उनके जांनिसार साथियों ने दीने इस्लाम के लिए अपनी जानों की क़ुरबानियां दीं, इस शहादत को याद करते हैं। शिया बिरादरी के लोग इस दिन काला लिबास पहनते हैं, खुशी के कार्यक्रमों से दूर रहते हैं, मस्जिदों और इमामबाड़ों में मजलिसें करते हैं, मज़हबी रहनुमाओं की तरफ से करबला के वाक़िआत बयान करते हैं, नोहा और मर्सिया पढ़ कर अपने दुख का इज़हार करते हैं। सड़कों पर जुलूस और ताजिए निकालते हैं, अलम उठाए जाते हैं। हज़रत इमाम हुसैन रज़ि और उनके जांनिसार साथियों की भूक-प्यास को याद करते हुए फाक़ा करते हैं, ज़रुरतमंदों को पानी पिलाते हैं और लंगर करते हैं और शहीदाने करबला की शहादत को याद करते हुए रक्तदान शिविर भी आयोजित करते हैं। शिया बिरादरी में मुहर्रमुल हराम के शुरु से लेकर अगले दो महीनों और 8 दिनों तक यानी 8 रबीउल अव्वल तक शौक़ मनाते हैं।

सुन्नी मुसलमान-सब्र और इबादतों पर ज़ोर देते हैं। सुन्नी मुसलमान मुहर्रम की 9 वीं और 10 वीं तारीख यौमे आशूरा को रोज़ा रखते हैं। यौमे आशूरा के दिन मस्जिदों में खुसूसी तौर पर तक़रीरें होती हैं, जिन में शहीदाने करबला और उनके सब्र और जांनिसारी के वाक़िआत बयान किए जाते हैं। सदक़ा और खैरात करते हैं, क़ुरआन की तिलावत और अहादीसे रसूलुल्लाह सलल्लाहु अलैहि व सल्लम के दर्स देते हैं और इस महीने को एक इस्लामी हिजरी साल के तौर पर अमन-ओ-अमान और ग़ौरो फिक्र के साथ बिताया जाता है।

हिन्दुस्तान के मुख्तलिफ शहरों लखनऊ, हैदराबाद, दिल्ली में रिवायती जुलूस और ताज़ियादारी का तहज़ीबी और सक़ाफती रंग नुमायां है। हिन्दुस्तान में मुहर्रम के अहमतरीन पहलू ये हैं-यानी हिन्दुस्तान में ताजिया निकालने की रिवायत तैमूरलंग के दौर 1338 से शुरु हुई, यह एक मुनफरिद सक़ाफती अमल है जो बर्रे सग़ीर(उप महाद्वीप) की पहचान बन गया।

मुहर्रम सिर्फ मुसलमानों तक ही महदूद नहीं है हिन्दुस्तान में सदियों से तमाम मज़ाहिब के लोग हिन्द सहित और सिख बिरादरी के लोग इसमें शिरकत करते है, सबीलें लगाते हैं और इमाम हुसैन रज़ि की क़रबानी को खिराजे अक़ीदत पेश करते हैं।

दस मुहर्रम यौमे आशूरा को पूरे हिन्दुस्तान में जुलूस निकाले जाते हैं। लखनऊ और हैदराबाद अपने तारीखी और बड़े जुलूसों के लिए देश-विदेशों में अपनी पहचान बनाए हुए है।

हिन्दुस्तान के मुख्तलिफ हिस्सों में ताजिए बनाने के लिए मक़ामी फुनून और दस्तकारी का इसतेमाल किया जाता है।

जिसकी झलक हिन्दुस्तानी फन्ने तामीर में भी नज़र आती है। हिन्दुस्तान में मुहर्रमुल हराम महज़ एक इस्लामी महीना या मज़हबी अक़ीदत तक महदूद नहीं है बल्कि यह मुल्क की सदियों पुरानी मुश्तरका तहज़ीब बयनुल मज़ाहिब हम आहंगी(सहमत) और रवादारी की एक मुन्फरिद अलामत है। इस्लामी तक़वीम(कलेण्डर, पंचांग) के इस पहले महीने में नवासा-ए-रसूल सलल्लाहु अलैहि व सल्लम की अज़ीम क़ुरबानी की याद मनाई जाती है। हिन्दुस्तान में इसका आग़ाज़ और उसके मनाने के तरीक़े अपनी अलग तारीखी और सक़ाफती हैसियत रखते हैं। हिन्दुस्तान और मुहर्रमुल हराम के बाहमी तालुक़ात के अहम पहलू इस तरह से देखे जा सकते हैं। ताजियादारी का आग़ाज़ हिन्दुस्तान में 14 वीं सदी ईस्वी और सन हिजरी 61 में मुग़ल बादशाह तैमूर लंग के दौर में पैदा हुआ। वो अपनी बीमारी की वजह से करबला नहीं जा सका था तो उसके लिए करबला के रोज़े का एक मॉडल तैयार किया था जिसे बाद में ताजिया कहा जाने लगा।

दुनिया भर के मुक़ाबले में खूबसूरत और दीदा ज़ैब ताजिया बनाने का कल्चर खास तौर पर हिन्दुस्तान में परवान चढ़ा और यहीं से अन्य क्षेत्रों में फैला। हिन्दू बिरादरी और अन्य धर्मों की शिरकत गंगा-जमुनी तहज़ीब क़ायम करती है। हिन्दू समाज के बीच का संबंध भारत की साझा संस्कृति का एक अनुठा उत्कृष्ट उदाहरण है। हिन्दू समाज इस मौक़े पर कैसे भागीदारी निभाता है? इस में ताजिया और अलम बनाना उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखण्ड और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में अनेक हिन्दू परिवार पूरी श्रद्वा के साथ ताजिया और झण्डे बनाते हैं, हिन्दू कारीगर और बढ़ई ताजिया बनाने में सक्रिय रुप से शामिल होते हैं इसी प्रकार से ताजियों के जुलूस में सिर्फ मुसलमान समुदाय ही नहीं बल्कि हिन्दू भाई भी इस मामले में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते हैं। हज़रत इमाम हुसैन के त्याग और इंसाफ की जंग को याद करते हैं कई हिन्दू परिवारों की करबला के शहीदों के प्रति गहरी आस्था होती है, वे मन्नतें मांगते हैं और ताजियों के सामने अपनी तरफ से नज़राना पेश करते हैं और दूसरों को बांटते हैं। अवध और लखनऊ के नवाबों के समय से ही हिन्दू राजाओं जैसे राजा तिकैत राय ने इमामबाड़ों और करबला के स्थलों के निर्माण के लिए ज़मीनें, धन और दान दिए हैं।
यह परम्परा भारत में धार्मिक सदभाव भाईचारे और विविधता में एकता की सबसे पुरानी और जीवंत मिसालों में से एक है। भारत में कई इमामबाड़े ऐसे हैं कि जिनकी देखरेख या निर्माण में हिन्दू राजाओं और ज़मीनदारों ने अहम योगदान दिया था। मुहर्रम के मौक़े पर ताजियों के जुलूसों के दौरान हिन्दू समुदायों के लोग रास्तों में पानी, शरबत और भोजन लोगों को बांट कर अपनी सहभागिता दर्ज कराते हैं। कई हिन्दू परिवार बच्चों की सहत और खुशहाली के लिए मुहर्रम के मौक़े पर मन्नतें जैसे फक़ीर बनना भी शामिल हैं।

करबला की जंग में 680 ईस्वी में भारत का हुसैनी ब्राहमण समुदाय खुद को हज़रत इमाम हुसैन के इतिहास से जोड़ते है, हुसैनी बा्रहमण जिन्हें मोहियाल भी कहा जाता है, एक अनुठा हिन्दू-मुस्लिम समन्वय है। इस समुदाय के लोग मुख्य रुप से दत्त वंश के ब्राहमण हैं, जो ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रुप से इराक़ की 680 की करबला की जंग पैग़म्बर मुहम्मद सलल्लाहु अलैहि व सल्लम के नवासे हज़रत इमाम हुसैन रज़ि की तरफ से यज़ीद की अत्याचारी फौज से लड़े थे। जब करबला की जंग में हज़रत इमाम हुसैन रज़ि संकट में थे तब राहिब सिंह दत्त के नेतृत्व में ब्राहमण फौज का एक दल इराक़ पहुंचा। हालांकि उनके पहुंचने से पहले ही हज़रत इमाम हुसैन रज़ि और उनके परिवार के लोग शहीद हो चुके थे, इसके बाद इन फाजियों ने यज़ीद की फौज से जंग कर के बदला लिया। राहिब सिंह दत्त पंजाब से संबंध रखने वाले मोहयाल दत्त ब्रहमण थे। यज़ीद की फौज के खिलाफ लड़ते हुए इन्होंने आपने सातों बेटों की क़ुरबानी दे दी इनके वंशंजों को आज हुसैनी ब्रहमण कहते हैं। करबला में अपने बुज़ूर्गाें के दिए गए बलिदान की वजह से हुसैनी ब्राहमण आज भी मुहर्रम के महीने में शौक़ मनाते हैं और हज़रत इमाम हुसैन की शहादत को याद करते हैं। यह परिवार आज दिल्ली, पंजाब, जम्मू के अलावा राजस्थान के पुष्कर और अजमेर में शामिल हैं।

यूं तो खुदा से मांगने जन्नत गया था मैं
करबुबला को देख कर नियत बदल गई
वर्तमान समय में मुहर्रमुल हराम के सिद्वान्तों जैसे शांति और न्याय की प्रासंगिकता मुख्य निष्कर्ष यह है कि यह महीना हमें न्याय के विरुद्व डटे रहने, बलिदान, सब्र और सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।
मानवीय संदेश-ऐतिहासिक घटना से दुनिया में आज के परिवेश में मुहर्रमुल हराम केवल एक ऐतिहासिक शौक़, आध्यात्मिक अनुष्ठान अथवा त्यौहार नहीं है बल्कि न्याय, मानवीय मूल्यों और अत्याचार के खिलाफ खड़े होने का वैश्विक प्रतीक बन चुका है। आधुनिक युग मे इस पवित्र महीने में बदलते स्वरुप है और प्रासंगिकता को इस तरह से समझा जा सकता है।
मानव अधिकार और न्याय की प्रेरणा-करबला की घटना 10 मुहर्रमुल हराम यौमे आशूरा को हुई थी। आज भी दबे कुचले लोगों को और कार्यकर्ताओं को अन्याय, तानाशाही और दमन के खिलाफ शांतिपूर्ण तरीक़े से अपनी आवाज़ उठाने की प्रेरणा देती है।

सांप्रदायिक और सौहार्द परोपकार-भारत जैसे बहु सांस्कृतिक देशों में मुहर्रम, भाईचारे का उदाहरण पेश करता है।

सदभावना और दान-आधुनिक परिवेश में लोग मुहर्रम के मौक़े पर गरीबों को अन्नदान, वस्त्रदान और सदक़ा-ओ-खैरात जैसी कल्याणकारी गतिविधियों में बढ-़चढ़ कर हिस्सा लेते हैं। यह महीना हमें याद दिलाता है कि जिंदगी के हर मोड पर हक़ का साथ देना और बुराई के खिलाफ डट जाना ही असल इन्सानियत है। हमें चाहिए कि इस महीने के तक़द्दुस का एहतराम करे अमन-ओ-अमान क़ायम रखे और उसके हक़ीक़ी पैग़ाम को अपनी ज़िंदगियों का हिस्सा बना ले। डिजिटल युग और शोसल मिडिया-आज डिजिटल दौर में करबला का संदेश शोसल मिडिया और इन्सानियत का संदेश बन कर फैल रहा है।

कौन कहता है पानी को तरसे थे हुसैन
उनके होंटों को तरसता रहा हुसैन

 

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor