राज्य उपभोक्ता आयोग का अहम फैसला, दो अलग मामलों में बीमा कंपनियों की अपील खारिज
दिलीप कुमार पुरोहित. जोधपुर
राज्य उपभोक्ता आयोग, जोधपुर ने बीमा दावों से जुड़े दो मामलों में महत्वपूर्ण फैसले सुनाते हुए बीमा कंपनियों की अपीलें खारिज कर दीं। आयोग ने स्पष्ट किया कि केवल पुरानी बीमारी का हवाला देकर बीमा कंपनी किसी दावे को खारिज नहीं कर सकती, जब तक यह साबित न हो कि बीमित व्यक्ति की मृत्यु उसी बीमारी के कारण हुई थी। दोनों मामलों में आयोग ने जिला उपभोक्ता आयोग के आदेशों को बरकरार रखा।
पुरानी टीबी के आधार पर 11 लाख का दावा खारिज करने से इनकार
पहले मामले में बीमित व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसके परिवार की ओर से करीब 11 लाख रुपए के बीमा दावे की मांग की गई थी। बीमा कंपनी ने दावा स्वीकार करने से इनकार करते हुए तर्क दिया कि बीमित व्यक्ति वर्ष 2012 में टीबी से पीड़ित था और वर्ष 2015 में पॉलिसी लेते समय इस जानकारी को छिपाया गया था। बीमित पक्ष की ओर से प्रस्तुत दस्तावेजों में बताया गया कि दिसंबर 2012 तक इलाज के बाद वह पूरी तरह स्वस्थ हो गया था और वर्ष 2015 में उसकी मृत्यु सामान्य रूप से हुई थी। आयोग ने मामले की जांच करते हुए पाया कि मृत्यु का संबंध पुरानी टीबी की बीमारी से होने का कोई ठोस प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया गया।
आयोग ने यह भी माना कि कंपनी वर्ष 2012 के बाद के इलाज से संबंधित कोई ठोस दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर सकी। जांच अधिकारी की ओर से डॉक्टर या एनएम के बयान अथवा शपथपत्र भी प्रस्तुत नहीं किए गए। ऐसे में केवल पुरानी बीमारी के आधार पर बीमा दावा रोकना उचित नहीं माना गया। आयोग ने जिला उपभोक्ता आयोग के निर्णय को सही ठहराते हुए बीमा कंपनी की अपील खारिज कर दी और 11 लाख रुपए के बीमा दावे का रास्ता साफ कर दिया।
किराए पर दी गई बाइक चोरी हुई तो भी दावा पूरी तरह खारिज नहीं
दूसरे मामले में शंकरलाल खत्री ने यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी के खिलाफ अपील की थी। मामला किराए पर दी गई मोटरसाइकिल के चोरी होने से जुड़ा था। बाइक किराए पर लेने वाला व्यक्ति मोटरसाइकिल लेकर गया, लेकिन उसे वापस नहीं लौटाया। इसके बाद पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई गई और बीमा कंपनी को भी घटना की जानकारी दी गई। बीमा कंपनी ने दावा खारिज करते हुए कहा कि मोटरसाइकिल का व्यावसायिक उपयोग किया जा रहा था और उसके पास इसके लिए आवश्यक परमिट नहीं था। आयोग ने दस्तावेजों का परीक्षण करने के बाद पाया कि मोटरसाइकिल के पंजीयन एवं फिटनेस प्रमाणपत्र में किराए पर देने का उपयोग दर्ज था। बीमा पॉलिसी में भी सार्वजनिक उपयोग का उल्लेख होने की बात सामने आई। ऐसे में वाहन के व्यावसायिक उपयोग की जानकारी बीमा कंपनी से छिपाई नहीं गई थी। आयोग ने जिला आयोग के आदेश को बरकरार रखते हुए बीमा कंपनी को दावे की 75 प्रतिशत राशि नॉन-स्टैंडर्ड आधार पर भुगतान करने का आदेश दिया।
उपभोक्ताओं के लिए महत्वपूर्ण संदेश
इन दोनों मामलों में आयोग के फैसले से यह संकेत मिलता है कि बीमा कंपनियां केवल अनुमान या सामान्य आरोपों के आधार पर दावे खारिज नहीं कर सकतीं। दावा खारिज करने के लिए संबंधित तथ्य और दस्तावेजों से अपना पक्ष साबित करना जरूरी है।
फैसलों का मुख्य संदेश यही है कि बीमा पॉलिसी की शर्तों, बीमारी और मृत्यु के बीच संबंध तथा वाहन के उपयोग जैसे तथ्यों की जांच ठोस प्रमाणों के आधार पर होनी चाहिए।

