एक नदी पर्वत से निकली, गुनगुनाती, मुस्कुराती, गीत आजादी के गाती, वो चली सागर से मिलने, जिस तरह, मैं तुम्हें भी सोचता हूं कुछ इस तरह…
काव्य कलश संस्थान की गोष्ठी में खूब जमा रंग…शब्दो के अमृत ने मन के हर कोने को किया तृप्त दिलीप कुमार पुरोहित. जोधपुर प्यास जग की है बुझाने, गीत आजादी के गाने, दो किनारों पर है पै मंझली, एक नदी पर्वत से निकली, गुनगुनाती, मुस्कुराती, गीत आजादी के गाती, वो चली सागर से मिलने, जिस … Read more