डीके पुरोहित. जोधपुर
ये बात लिखते वक्त हमारा खून खौल उठता है। हमारे हाथ में सुदर्शन चक्र होता तो एक-एक का सर कलम कर देते। मगर हमारी कलम ही सुदर्शन चक्र बन कर राजस्थान के माफियाआं को चेतावनी दे रही है। सुधर जाओ वरना जिस दिन यह जनता जाग गई तो राजस्थान में न सरकारें बचेगी, न कानून बचेगा, ना माफिया बचेंगे और ना ही कानून के रखवाले। हम किसी एक सरकार की बात नहीं कर रहे। आजादी के बाद सभी भ्रष्ट सरकारों, कानून, अदालतों और न्याय के पहरेदारों ने चूड़ियां पहन ली और आज हालत यह यह है कि राजस्थान में न पहाड़ बचे हैं, न पठार बचे हैं, ना मैदान बचे हैं, ना बांध बचे और ना ही जंगल बचे हैं। रेत से लेकर बांध तक जहां तक माफियाओं का जहां जहां वश चला खाते-पीते गए और सरकारें तमाशबीन बनी रही।
गुरु शिखर (मांउट आबू, सिरोही, सेर (मांउट आबू), जरगा (उदयपुर), अचलगढ़ (सिरोही), रघुनाथगढ़ (सीकर), तारागढ़ (अजमेर), मुकुंदरा पहाड़ियां, मालखेत की पहाड़ियां, हर्ष की पहाड़ियां, सुंडा पर्वत, मालाणी पर्वत श्रृंखला, नाकोड़ा पर्वत/ छप्पन की पहाड़ियां, भैंराच व खो पर्वत, चिड़ियाटूंक पहाड़ी, जसवंतपुरा की पहाड़ियां, उड़िया पठार, आबू पठार, मेसा पठार, भोरठ का पठार, भाकर, गिरवा, लसाड़िया का पठार, त्रिकूट पहाड़ी, उपरमाल, उपरमाल, आडावाला पर्वत, मगरा, नाल, जिलवा की नाल (पगल्या नाल), सोमेश्वर की नाल, हाथी गुढ़ा की नाल, बिजासन का पहाड़ सब जगह अतिक्रमण हो गए हैं। बड़े-बड़े रिसोर्ट, होटलें और बंगले बन गए हैं। माफिया राज में जहां सब जगह आलशान इमारतें बन गई हैं वहीं इन माफियाओं के साथ राजनेता, जज और कानून के रखवाले भी शामिल है। यह काम एक दो साल में नहीं हुआ। आजादी के बाद भ्रष्ट सरकारों के राज में यह सिलसिलाचलकर आज नासूर बन गया है। अदालतें आदेश जारी करती रहीं और विभाग खानापर्ति करते रहे। कहीं किसी को शर्म नहीं बची है। अखबारों में भी माफिया घुस आए हैं। अगर कुछ लिखा जाता है तो उसकी कीमती वसूल कर मीडिया चुप हो जाती है। आजादी के बाद अगर मीडिया ने अपनी जिम्मेदारी निभाई होती तो आज यह दिन नहीं देखना पड़ता। भ्रष्ट मीडिया के मठाधीशों की सपंत्तियां बढ़ती गई और हाथ में आज आराजगता आ गई है।
इन बांधों का राम ही रखवाला है, एनजीओ हस्ताक्षर अभियान चलाकर अपनी चवन्नी चला रहे हैं
राजस्थान के जवाई बांध, बरेठा बांध, गांधी सागर बांध, राणा प्रताप सागर बांध, जवाहर सागर बांध, कोटा बैराज, टोरड़ी सागर बांध, जाखम बांध अब किताबों की कहानियां बनकर रह गए हैं। इन बांधों पर अतिक्रमण की चादर चढ़ती रही और पानी की चादर सिमटतीगई। जिम्मेदार काजल की कोठरियाें में हाथ और मुंह काले करते रहे। अखबार रोना राेते रहे और देखते ही देखते सब कुछ खत्म हो गया। अदालतों के ठाकर आदेश जारी करते रहे। कमेटियां और न्याय मित्र बनाते रहे। ना इन बांधों को न्याय मिला और ना ही न्याय मित्रों ने अपनी जिम्मेदारियां निभाई। राजाओं के राज खत्म हो गए मगर उनकी संपत्तियां बढ़ती गई। कंगाल हुई तो जनता। जिनके आशियानों पर आए दिन बुलडोजर चलते हैं। गरीबों को आशियाना बनाने का नेता सपना दिखाते रहे और देखते ही देखते लंका लुट गई। अब ना राम है और ना भरत। सब रावण और शकुनी हो गए हैं। जिन पांडवों पर न्याय की लड़ाई लड़ने की जिम्मेदारी थी वे नपुशंक होकर बैठ गए हैं। एनजीओ और संगठन हस्ताक्षर अभियान चलाकर अपनी कलम तोड़ रहे हैं और अपनी चवन्नी चला रहे हैं। एनजीओ की संपत्तियां बढ़ रही है। जहां जिसको खाने को मिले खा रहे हैं। अरे माफियाओं अब इंसान और चंद जानवर और जीव-जंतु बचे हैं उन्हें भी खा जाओ।
इन पार्कों को भी माफियाओं ने नहीं छोड़ा, जीव-जंतु-जानवर कहां जाएं, जब इंसान ही जानवर बन गए हैं
डेजर्ट नेशनल पार्क जैसलमेर, गजनेर वन्यजीव अभ्यारण्य, कैला देवी अभयारण्य, केवलादेव घना राष्ट्रीय उद्यान भरतपुर, माचिया सफ़ारी उद्यान जोधपुर, मुकुंदरा बाघ अभयारण्य कोटा, नाहरगढ़ जैविक उद्यान जयपुर सब जगह माफियाओं का राज है। इंसानों ने जानवरों का हक छीन लिया है। ऐसे अभागे राज में आए दिन मौसम तंत्र बिगड़ गया है। लेकिन मौसम विभाग भविष्वाणियां ही करता रहेगा। अकाल पड़े तो ही जनता को भुगतना है। अतिवृष्टि हो तो भी गरीबों को ही त्रासदी झेलनी है। अब फिर से किसी योगेश्वर को आना होगा जो इस अंधे कानून और लूली-लंगड़ी भ्रष्ट सरकारों और नामर्द कानून को ठिकाने लगाएगा।



