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Monday, April 7, 2025, 4:58 am

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छंदों से झरते स्वप्निल मोती…नीलम ने जीवन का दर्शन सरल शब्दों में किया अभिव्यक्त : तृप्ति

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प्रस्तुति : पंकज जांगिड़. जोधपुर 

पुस्तक का नाम : सुरमई सांझ स्वप्निल सवेरा

लेखिका : नीलम व्यास ‘स्वयंसिद्धा’

पुस्तक समीक्षा : तृप्ति गोस्वामी ‘काव्यांशी’

कवयित्री नीलम व्यास ‘स्वयंसिद्धा’ का काव्य संग्रह ‘सुरमई सांझ स्वप्निल सवेरा’ हाल ही में लोकार्पित हुआ। इस पुस्तक की समीक्षा करते हुए वरिष्ठ कवयित्री तृप्ति गोस्वामी काव्यांशी ने कहा कि नीलम के संग्रह में धीरे-धीरे ढलती सफेद नीले रंगों से सनी शाम का अंधेरे में डूबने के बाद फिर वही नये जोश और उमंग के साथ नवीन स्वप्न लिये रवि का उदित होना और रोशनी बिखेर देना उद्घाटित होता है।

कवयित्री नीलम व्यास “स्वयंसिद्धा” का कविता संग्रह जनमानस को यह समझाना चाहता हैं कि जीवन में चाहे जितनी विकट परिस्थितियां आ जाए हमें उसका डटकर सामना करना चाहिए क्योंकि वह विकटता सदैव रहने वाली नहीं हैं सफलता और खुशी का सूरज निकलना निश्चित ही होता हैं। जहां कवयित्री ने एक तरफ प्रेम को परिभाषित किया है वहीं दूसरी ओर देश के हालातों पर भी दृष्टिपात करके अपनी कलम चलाई हैं।

प्राकृतिक सौन्दर्यता को अपने पन्नों पर उकेरा हैं वहीं आपने उसे बचाए रखने की विनती भी की हैं। लेखिका की छंदों में अच्छी पकड़ है। पहले भी आपकी छंद युक्त पुस्तक से पाठक लाभान्वित हो चुके हैं। इस बार आपने जापानी विधा के चार छंदों हाइकू, तांका, चोका और सेदोका का बहुत सटीक प्रयोग कर अपनी भावनाओं को शब्दों में संजोकर प्रस्तुत किया है और बहुत हद तक अपनी बात कविताओं द्वारा समझाने में सफल भी हुई हैं।

आपकी पहली रचना हाइकू में “इठलाई धरा” में धरती मां के रूप सौंदर्य को बहुत ही अनूठे तरीके से समझाया है वे सूर्य, क्षितिज, फूल पत्ती, हरियाली आदि द्वारा धरा के श्रृंगार की बात कहती हैं आपकी रचना की यह पंक्ति

“उदित भानु
लाया केसरी साड़ी
प्रेम सौगात”

आपके कविता संग्रह के नाम को सार्थक करते प्रतीत होते हैं। रचना- जीवन यात्रा,जीवन की परिभाषा को हाइकू विधा में सृजित कर सभी मनुष्य के अपने-अपने किरदार और उनके जीवन में आने वाले उतार चढ़ाव को बहुत अच्छे से समझाया हैं ।

“जीवन चक्र
बंधन सांसों का है
धूप ओ छांव।

पुतला मनुज
माटी का होता है
पंचतत्व की।

इन चंद शब्दों को हाइकु में बांधकर जीवन की गहनता एवं यथार्थता पर प्रकाश डालने में आप सफल हुई हैं। आपके यह शब्द महज़ शब्द ही नहीं हैं बल्कि पूरे जीवन अर्थ का निचोड़ हैं। वास्तव में यह मानव को समझाने का बहुत अच्छा प्रयास हैं। आपने अपने अन्य हाइकू में स्त्री की दशा, उसका संघर्ष, नारी अस्मिता पर होने वाले प्रहार से सबको अवगत कराया आपकी ये मार्मिक रचनाएं आपके संवेदनशीलता का परिचय भी देती हैं।

तांका छंद विधा में “प्रेम पथिक” रचना में लेखिका ने भानु को प्रेम पथिक बताते हुए कर्मशील होने पर जोर दिया है। कैसे वह उगता है और अपना कर्म करते हुए अस्त हो जाता हैं कि फिर उदित होंगे और रोशन होगा सवेरा। इसी तरह इस रचना में नदी, धरा, चांद, मेघ आदि को भी प्रेम की संज्ञा दे अपनी बात समझाने की कोशिश की हैं।

तांका छंद में ही आपकी रचना “लौटो यथार्थ को” कवियों से जीवन के कटु सत्य को उजागर करने की बात कहती हैं । उनकी पंक्तियां –

भरों शब्दों में
आग ऐसी ओ कवि!
जागे जनता
हो नव जागरण
चेतन जन मन

इन पंक्तियों से साफ जाहिर होता है कि वे कवियों से चाहती है कवि की कलम को अब देश की विपरीत परिस्थितियों को देखते हुए प्रेम श्रंगार से ऊपर उठकर देश धर्म, मानव हितार्थ आदि के लिए लिखना चाहिए।

जीवन नहीं
महज कल्पना ही
सोचो कवि जी
लिखो यथार्थ कभी
निभाओ कवि धर्म

इन पंक्तियों में कल्पना से परे उठकर यथार्थ पर लिखने का बल देते हुए कवि धर्म निभाने की बात भी वो कहती हैं। चोका छंद विधा की रचना “नाराज क्यों” में बेटे का नाराज होकर मां से दूर चले जाना और उस पीडा से मां का हाल बेहाल होना । बेटे के लिए तरसती मां की दर्दभरी पुकार से कवयित्री की कलम की धार पाठक के हृदय को छलनी कर देती हैं। लेखिका की सेदोका छंद में बहुत हृदयस्पर्शी रचना “नारी मन धरती सा” को बहुत सुंदर तरीके से वर्णित किया हैं जहां इस रचना में प्रारंभिक पंक्तियों में फूल,नदी,भानु, निर्झर आदि अपने-आप को बहुत सुंदर बताते हैं वहीं नारी अपने को सुंदर तो बताती है किंतु वहीं वो यह भी बताती हैं कि सुंदरता उसके लिए अभिशाप बन गई हैं। आखिर मैं क्यों सुंदर बनी? ना मैं सुंदर होती ना भोग विलास की वस्तु बनती। जननी होने के बाद भी ऐसी दशा !इससे तो सुंदर ही ना होती। करुण हृदय की यह चीत्कार सुन धरा सुलगती हैं । बहुत ही सुन्दर निम्नलिखित पंक्तियों से लेखिका ने स्त्री को समझाया है वे कहती हैं –

सुलगी धरा
डोल उठा गगन
दु:खी नदियां रोई
ओ जन्मदात्री
नोचे लूटे ये तन

धैर्य धरा सा
कर्मरत नदी सी
दिव्यता भानु जैसी
संस्कार थाती
नजाकत फूलों सी
सबसे सुंदर स्त्री

एक ही स्वर में सभी ने नारी श्रेष्ठता को परिभाषित किया वास्तव में कवयित्री ने बहुत ही सुन्दर रचना रची है।

इसी तरह आपने स्त्री- पुरुष, बेटा-बेटी, किसान, मजदूर, देश धर्म, प्रकृति, वर्तमान स्थिति आदि सभी विषयों पर अपनी कलम चलाई हैं। आपकी रचनाएं संवेदना से भरी हुई प्रतीत होती हैं। रचनाएं भावपूर्ण होने के साथ ही भाषा शैली में भी खरी उतरती है एवं कला पक्ष भी बेहतरीन हैं। आप भविष्य में और भी उत्कृष्ट सृजन करती रहें और साहित्याकाश को छुएं यही शुभकामनाएं देती हूं।

Rising Bhaskar
Author: Rising Bhaskar


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