Explore

Search

Friday, July 10, 2026, 2:14 am

Friday, July 10, 2026, 2:14 am

LATEST NEWS

The specified slider does not exist.

Lifestyle

गणगौर पूजन में तीजणियां दिखा रही उत्साह, अब घुड़ला पूजन की होगी शुरुआत

राहुल ओझा. जोधपुर

शहर में जगह-जगह गणगौर की पूजा की जा रही है। अब जल्द ही घुड़ला पूजन किया जाएगा। मारवाड़ में घुड़ला घुमा कर महिलाएं आज भी मनाती है अपनी आजादी का जश्न। अखंड सुहाग व सौभाग्य की कामना को लेकर सुहागिनों की ओर से होली के दूसरे दिन होली की राख से घुड़ला गवर का पूजन किया जाता है। पूजन के तहत पहले दिन गणेशजी को निमन्त्रण के साथ, दूसरे दिन हरिया चुगाई रस्म, तीसरे दिन को गणगौर श्रंगार, रंग पंचमी उत्सव, हल्दी की रस्म के साथ चंग की थाप पर गीत गाए जा रहे हैं। घुड़ला पूजन करने वाली विजय लक्ष्मी व कविता ओझा बताती है ये परम्परा कई सालों से चली आ रही है।

घुड़ला पर्व कि ये छोटी सी मटकी या घड़ा, दरअसल सालों पहले मारे गए मुग़ल सूबेदार घुडले खान के कटे हुए सिर का प्रतीक मानी जाती है। इसे मारकर महिलाओं को आज़ाद कराया गया था। इसलिए हर साल इसके कटे हुए सर को लेकर घूमने की परंपरा है। अजमेर के शाही सूबेदार मीर घुड़ले खान, मल्लू खान व सीरिया खान बड़ी सेना लेकर जोधपुर के पीपाड़ में हमला कर दिया । इस शाही सेना ने पीपाड़ में भारी लूटपाट कर महिलाओं को किडनैप किया और रवाना हो गए। सूचना मिलने पर राव सातल ने अपने दोनों पुत्रों के साथ मिलकर शाही सेना पर कोसाणा के निकट हमला बोला, इस युद्ध में राव सातल ने घुड़ले खान को मार कर महिलाओं को मुक्त कराया, लेकिन खुद मारे गए युद्ध के बाद घुड़ले खान का सिर जोधपुर लाया गया और मारवाड़ में विजयी उत्सव मनाया गया। हर साल घड़े में छेद करके बनाए जाते हैं। जख्म महिलाओं की मुक्ति के इस पर्व को उसके बाद से हर साल मनाया जाता है। इसके तहत महिलाएं शीतलाष्टमी की शाम पर नवरंग रचकर गाजे बाजे के साथ कुमार के पास एक छोटा घड़ा खरीद ने जाती है। इस घड़े पर घुड़ले खान के चेहरे पर हुए घाव के प्रतीक के रूप में छिद्र करवाती है- इसके बाद घड़े को रंगों की आकर्षक कलाकारी से रंग कर इसमें एक दीपक रख वे गीत गाती हुई शहर में रोज शाम को घूमने निकलती है। किसी के घर जाने पर वहां की महिलाएं इनका स्वागत करती है और दीपक के दर्शन कर उस पर चढ़ावा चढ़ाती है। चैत्र नवरात्र की तीज पर गवर के सात घुड़ले का विसर्जन किया जाता है। वहीं इसमें कविता, गार्गी, इंदु, कामिनी, काजोल, अमिता, श्वेता, कामिनी, रेखा,भारती, जानकी, जिन्नु, चारु, सोनू, निर्वी, कई वर्षों से परम्पराएं निभा रही हैं।

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor