मैं कीचड़ में रहता हूँ, इसलिए कमल हूँ
मैं कीचड़ में रहता हूँ, इसलिए कमल हूँ,
मुसीबतों से लड़ता हूँ, फिर भी सरल हूँ।
दुनिया ने जब ठुकराया, मैंने सहे ज़हर,
फिर भी भीतर उगाया, सच्चाई का शहर।
अंधेरों ने घेरा मुझे, पर मैं दीप बना,
हर ठोकर ने सिखाया, कैसे बनूं सपना।
मिट्टी ने चिपकाया, मगर मैं न रुका,
संकल्पों की नाव से हर संकट को चिरा।
मैं बदबू में भी महका, यही मेरी पहचान,
हर दर्द को सहा चुपचाप, बिना कोई ग़ुलाम।
निंदा की बूँदों से सींचा अपना मन,
फिर भी खिलता रहा जैसे कोई चमन।
काँटों की राहों में पाया मैंने लक्ष्य,
पीड़ा के पत्थरों से तराशा स्वर्ण पक्ष।
मैं कीचड़ में ही जन्मा, पर दृष्टि थी दूर,
सच और साहस से लिखा जीवन का सूर।
मैं कीचड़ में रहता हूँ, इसलिए कमल हूँ,
जो हर हाल में खिले, वही असल फूल हूँ।
पंकज बिंदास, जोधपुर







