-यह कोई विज्ञान फैंटेसी नहीं, बल्कि मेडिकल साइंस की अगली बड़ी छलांग है, इस छलांग की कूदने वाली नन्ही-नन्ही सर्जन होंगी- चींटियां…
कपिल भटनागर. नई दिल्ली
मानव शरीर के भीतर बिना चीरा लगाए अगर कोई जटिल ऑपरेशन कर दे—तो क्या आप इसे विज्ञान-कथा समझेंगे? लेकिन अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS), दिल्ली के डॉक्टर इसे हकीकत में बदलने की दिशा में तेज़ी से काम कर रहे हैं। यह कहानी कोई विज्ञान फैंटेसी नहीं, बल्कि मेडिकल साइंस की अगली बड़ी छलांग है। और इस छलांग की कूदने वाली नन्ही नन्ही ‘सर्जन’ होंगी—चींटियां।
खोज की शुरुआत: जब कीड़ों ने दिखाया रास्ता
AIIMS दिल्ली के कार्डियोथोरेसिक, ऑन्कोलॉजी और प्रॉक्टोलॉजी विभाग के डॉक्टरों की एक संयुक्त टीम ने वर्षों से यह समझने की कोशिश की कि क्या इंसानों से बहुत छोटे जीवों को—जैसे चींटी—को इलाज या सर्जरी में इस्तेमाल किया जा सकता है।
एम्स दिल्ली में कार्डियोलॉजिस्ट और इस रिसर्च की प्रमुख अन्वेषक टीम का कहना है कि “कई प्राचीन आयुर्वेदिक ग्रंथों में भी कीड़ों के उपयोग का ज़िक्र है। लेकिन हमारी आधुनिक सोच इसे अगली स्तर पर ले जाना चाहती है—जहां चींटियां न केवल शरीर के भीतर पहुंचें, बल्कि वहां निदान करें और सूक्ष्म सर्जरी में सहायक बनें।” डॉ. डी. मसीह थॉमस और डॉ. डी केपी सिंह ने बताया कि चींटियां प्रकृति में नन्हा जीव है और अब चींटियों के माध्यम से ऑपरेशन करने संभव हो सकेंगे।
कैसे संभव है? क्या चींटियां कर सकती हैं ऑपरेशन?
एम्स के वैज्ञानिकों की टीम ने तीन साल की गहन रिसर्च में विशेष प्रकार की प्रशिक्षित जैविक चींटियों (Bio-Engineered Ants) को तैयार किया है। ये चींटियां सामान्य चींटियों से आकार में थोड़ी छोटी और बुद्धिमत्ता में काफी आगे हैं।
प्रशिक्षण और अनुवांशिक बदलाव
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इन चींटियों के मस्तिष्क में न्यूरल स्टिमुलेशन डिवाइस लगाए गए हैं जो उन्हें खास इशारों पर चलने, रुकने, मुड़ने या लक्ष्य को पहचानने की क्षमता देता है।
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उनका शरीर सूक्ष्म कैमरा और माइक्रो-सर्जिकल उपकरण से लैस किया गया है।
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उनकी सूंघने की शक्ति का इस्तेमाल किया गया है कैंसर जैसे रोग की पहचान के लिए।
डॉ. निधि अग्रवाल, ऑन्कोलॉजी विशेषज्ञ, कहती हैं:
“कैंसर सेल्स और ट्यूमर में कुछ खास प्रकार की जैविक गंध होती है। हमारी चींटियां उस गंध को पहचानने में सक्षम हैं, और वह भी उस अवस्था में जब आधुनिक MRI भी नहीं बता पाता।”
चींटी कैसे प्रवेश करती है शरीर में?
इस पूरी प्रक्रिया को नाम दिया गया है: Ant-Mediated Invasive Procedure (AMIP)।
चींटी को एक खास सूक्ष्म कंटेनर में नाक, मुंह या मलद्वार के जरिए शरीर के अंदर भेजा जाता है। वहां से वह प्रशिक्षित रास्ते पर चलते हुए संबंधित अंग तक पहुंचती है। फिर:
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निदान करती है: वह सूक्ष्म कैमरा के जरिए लाइव फीड भेजती है डॉक्टरों को।
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इलाज करती है: माइक्रो सर्जिकल उपकरण से वह ट्यूमर काट सकती है, रक्त नली की सफाई कर सकती है या टिश्यू से नमूना निकाल सकती है।
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फिर लौट आती है।
इस पूरी प्रक्रिया में ना कोई चीरा, ना टांका, ना ही लंबा रिकवरी पीरियड।
अब तक किन रोगों में हुआ परीक्षण?
एम्स की टीम ने अब तक रैट मॉडल (चूहे) पर 32 तरह के सर्जिकल परीक्षण किए हैं जिनमें शामिल हैं:
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हार्ट ब्लॉकेज क्लियर करना
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बवासीर की अंदरूनी गांठों को हटाना
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गले के ट्यूमर की बायोप्सी
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फेफड़े की सूजन में दवा पहुंचाना
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बड़ी आंत की रुकावट साफ करना
परिणामों में 94% सफलता दर देखी गई है।
डॉ. सुबोध के. राव, जो न्यूरोलॉजिकल रिसर्च यूनिट के सदस्य हैं, बताते हैं:
“हमने चींटियों को रीढ़ की हड्डी की नसों के पास तक भेजा, और वहां से दवा का संप्रेषण कराया। यह पारंपरिक इंजेक्शन या ड्रिप की तुलना में कहीं अधिक सटीक और तेज़ था।”
रिसर्च को पेटेंट कराने की तैयारी
रिसर्च अब इतने एडवांस स्टेज में पहुंच चुकी है कि एम्स की लीगल टीम इसे भारतीय पेटेंट कार्यालय और वर्ल्ड इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी ऑर्गनाइजेशन (WIPO) के पास पेटेंट कराने की प्रक्रिया शुरू कर चुकी है।
एम्स प्रशासन ने पुष्टि की है कि:
“अगर यह तकनीक पेटेंट होती है और नियंत्रित रूप से ह्यूमन ट्रायल्स में प्रवेश करती है, तो यह भारत को विश्व चिकित्सा के नक्शे पर एक बार फिर नेतृत्वकर्ता बना देगी।”
रिसर्च का वैज्ञानिक नाम और सिद्धांत
इस रिसर्च का नाम रखा गया है:
“Project Formica Medica”
(‘Formica’ लैटिन में चींटी को कहा जाता है)
सिद्धांत है – “Biological Invasives for Non-Invasive Intervention”
(अर्थात् – जैविक दखल से बिना चीरे इलाज)
चुनौतियाँ और आलोचना
जहां यह खोज रोमांचक है, वहीं इसके कुछ विरोधी स्वर भी सामने आए हैं:
1. Ethical Issues
क्या यह जानवरों के दिमाग में बदलाव करके उनकी ‘प्राकृतिक’ स्थिति को बिगाड़ना है?
2. Internal Infection Risk
अगर चींटी रास्ता भटक जाए या मर जाए तो?
3. Cost and Accessibility
क्या यह तकनीक आमजन तक पहुंचेगी या सिर्फ वीआईपी ट्रीटमेंट बनकर रह जाएगी?
डॉ. उर्मिला भटनागर, मेडिकल एथिक्स बोर्ड की सदस्य, कहती हैं:
“हम चिकित्सा में नवाचार के समर्थक हैं, लेकिन किसी भी जीव की पीड़ा या जीवन से खिलवाड़ नहीं होनी चाहिए। हमें इस रिसर्च की निगरानी करनी होगी।”
भविष्य की योजना: मच्छर और मधुमक्खी भी लाइन में हैं!
एम्स की टीम यहां नहीं रुक रही। अगला चरण है:
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Project MosQure: मलेरिया मच्छरों को बदला जाएगा ड्रग-डिलीवरी वाहक में
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Project BeeHeal: मधुमक्खियों के डंक को नियंत्रित कर केमिकल-थेरेपी दी जाएगी
आमजन की राय:
हमने दिल्ली की सड़कों पर लोगों से पूछा—क्या आप चाहेंगे कि चींटियां आपके शरीर के अंदर इलाज करें?
रीना मिश्रा, शिक्षिका:
“अगर इससे ऑपरेशन नहीं कराना पड़े और खर्च भी कम हो, तो मैं तैयार हूं।”
सलीम मिर्जा, ऑटो चालक:
“थोड़ा डर लगता है, लेकिन अगर एम्स कर रहा है तो यकीन तो बनता है।”
दिलीप सोनी, कैंसर पीड़ित:
“अगर इससे मुझे कीमो से छुटकारा मिल जाए, तो मैं खुशी से चींटियों को अंदर भेजूंगा।”
क्या ‘ऑपरेशन चींटी’ बन पाएगा मेडिकल इतिहास?
एम्स दिल्ली की यह रिसर्च किसी विज्ञान कथा का हिस्सा नहीं, बल्कि जीवित वैज्ञानिक यथार्थ है। अगर सब कुछ योजना अनुसार चलता है और ह्यूमन ट्रायल्स में सफलता मिलती है, तो वह दिन दूर नहीं जब अस्पतालों के ऑपरेशन थियेटर में डॉक्टरों की जगह चींटी की एक टुकड़ी स्क्रब पहने दिखे—बिल्कुल सूक्ष्म, लेकिन उतनी ही कुशल।
इस खोज से जुड़े एक रिसर्च फेलो ने मुस्कुराते हुए कहा,
“शायद अब डॉक्टर्स को ‘एंटमैन’ कहकर पुकारा जाएगा।”
विशेष नोट:
इस स्टोरी के सभी वैज्ञानिक तथ्य एम्स के रिसर्च पेपर “Application of Bio-Invasive Organisms in Minimally Invasive Surgery” (जारी प्रकाशन) पर आधारित हैं। AIIMS की अनुमोदन समिति और मेडिकल एथिक्स बोर्ड की मंजूरी प्रक्रिया भी अभी जारी है।



