राइजिंग भास्कर डेस्क | नई दिल्ली
पिछले दो दशकों में सोशल मीडिया ने संचार, जानकारी और मनोरंजन के तौर-तरीकों को पूरी तरह बदल दिया है। लेकिन अब एक नई रिपोर्ट — “क्या सोशल मीडिया युवाओं की भलाई को नुकसान पहुँचा रहा है?” — इस सवाल को गंभीरता से उठा रही है कि क्या यह तकनीकी क्रांति हमारे युवाओं की मानसिक सेहत के लिए खतरनाक साबित हो रही है।
यह रिपोर्ट, इटली की यूनिवर्सिटी ऑफ कासीनो के प्रोफेसर मौरिज़ियो पुग्नो द्वारा प्रकाशित की गई है और इसमें आर्थिक शोधों के आधार पर सोशल मीडिया के प्रभावों की गहन पड़ताल की गई है।
मुख्य निष्कर्ष: सोशल मीडिया युवाओं की भलाई को करता है नुकसान
रिपोर्ट का स्पष्ट निष्कर्ष है कि सोशल मीडिया का उपयोग युवाओं — खासकर किशोर लड़कियों — की भलाई और मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक, महत्वपूर्ण और स्थायी प्रभाव डालता है।
यह निष्कर्ष अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, इटली और स्पेन जैसे पाँच देशों में की गई ‘प्राकृतिक प्रयोग’ (Natural Experiments) पद्धति पर आधारित शोधों से निकला है।
इन अध्ययनों में पाया गया कि सोशल मीडिया की उपलब्धता वाले क्षेत्रों में किशोरों में अवसाद, चिंता, आत्महत्या के विचार, नींद और खान-पान से जुड़ी समस्याएं अधिक पाई गईं।
कैसे की गई पड़ताल? ‘प्राकृतिक प्रयोग’ की पद्धति
इन आर्थिक अध्ययनों में ‘Natural Experiment’ का उपयोग किया गया — यानी उन क्षेत्रों की तुलना की गई जहाँ सोशल मीडिया तक पहुँच अलग-अलग समयों में हुई। उदाहरण के लिए:
- अमेरिका: फेसबुक की चरणबद्ध शुरुआत वाले 775 कॉलेजों में पाया गया कि जहाँ फेसबुक पहले पहुंचा, वहाँ छात्रों की मानसिक सेहत में गिरावट अधिक हुई।
- ब्रिटेन: फाइबर ब्रॉडबैंड की उपलब्धता से सोशल मीडिया उपयोग में वृद्धि हुई, जिससे बच्चों की आत्मछवि, स्कूल के प्रति संतोष और जीवन संतोष में गिरावट देखी गई।
- इटली और स्पेन: अस्पताल में भर्ती किशोरों में मानसिक रोगों के मामलों में स्पष्ट वृद्धि दर्ज की गई।
सोशल मीडिया कैसे करता है नुकसान?
रिपोर्ट के अनुसार, सोशल मीडिया तीन मुख्य कारणों से युवाओं की भलाई पर बुरा असर डालता है:
- भविष्य-केंद्रित गतिविधियों की जगह लेता है: पढ़ाई, सामाजिक सेवा और कौशल विकास जैसी गतिविधियाँ घटती हैं।
- तुरंत सुख की आदत: प्लेटफॉर्म्स युवाओं को तात्कालिक संतोष की लत लगाते हैं, जिससे उनके उद्देश्य धुंधले हो जाते हैं।
- लत की प्रवृत्ति: लंबे समय तक सोशल मीडिया का उपयोग आत्म-नियंत्रण को कमजोर करता है, जिससे यह एक नुकसानदायक लत में बदल जाता है।
खतरनाक चक्र: सोशल मीडिया से राहत नहीं, बीमारी और बढ़ती है
इस रिपोर्ट में बताया गया है कि सोशल मीडिया सिर्फ ध्यान भटकाता नहीं, बल्कि धीरे-धीरे ऐसा विकल्प बन जाता है जिससे युवा बार-बार उसी में राहत ढूँढने लगते हैं — और यह चक्र खुद को दोहराते हुए और अधिक नुकसान करता है।
रिपोर्ट में सोशल मीडिया की लत को ‘स्व-नियंत्रण समस्या’ (self-control problem) के रूप में चिन्हित किया गया है, जिससे न केवल मानसिक सेहत प्रभावित होती है बल्कि शिक्षा और भविष्य के अवसर भी खतरे में पड़ जाते हैं।
शैक्षणिक संस्थानों और अभिभावकों की चिंता बढ़ी
रिपोर्ट में इस बात का भी उल्लेख है कि अमेरिका और यूरोप के कई स्कूलों ने कक्षाओं में स्मार्टफोन और सोशल मीडिया के उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया है।
यह प्रतिबंध छात्रों की एकाग्रता और मानसिक स्वास्थ्य में सुधार लाने की दिशा में उठाया गया कदम है।
अमेरिका में वॉशिंगटन स्कूल डिस्ट्रिक्ट ने तो सोशल मीडिया कंपनियों पर मुकदमा भी दायर किया है, यह आरोप लगाते हुए कि वे जानबूझकर छात्रों की मनोवैज्ञानिक कमजोरियों का शोषण कर रही हैं।
आगे की दिशा: नीतियाँ और समाज दोनों को चाहिए सजगता
रिपोर्ट में दो सुझाव दिए हैं:
- प्रस्ताव 1: सोशल मीडिया कंपनियों के एकाधिकार को तोड़ने के लिए अधिक प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देना।
- प्रस्ताव 2: बच्चों और किशोरों को सोशल मीडिया के उपयोग के बारे में शिक्षा देना, ताकि वे दीर्घकालिक लक्ष्यों और सामाजिक उद्देश्यों की ओर प्रेरित हो सकें।
सोशल मीडिया का संतुलित उपयोग आवश्यक
यह शोध बताता है कि तकनीक चाहे जितनी भी उन्नत हो जाए, यदि उसका उपयोग मनोवैज्ञानिक रूप से असंतुलित हो, तो उसका प्रभाव समाज पर विनाशकारी हो सकता है — विशेषकर उन बच्चों और किशोरों पर जो अभी जीवन को समझने और संवारने की प्रक्रिया में हैं।
सोशल मीडिया को पूरी तरह खारिज करने की बजाय इसे विवेकपूर्ण और सीमित ढंग से उपयोग में लाना ही समय की माँग है।




