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Thursday, July 9, 2026, 8:12 am

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कुछ लोग जिनमें ईश्वर तत्व होता है वे अगर बिछड़ जाते हैं तो हजारों कोशिशों से भी मिलते नहींं हैं, उनकी तासीर पारे जैसी होती है

ऐसे लोगों की उपस्थिति को कैसे समझें, उनका आदर करें, और यह न भूलें कि हर रिश्ता एक रसायन शास्त्र ही है — नाजुक, लेकिन जीवन के लिए अनिवार्य।

राखी पुरोहित. जोधपुर

8302316074 rakhipurohit066@gmail.com

कभी आपने पारे को हथेली पर रखने की कोशिश की है? यह ठंडा, चमकदार, और रहस्यमयी तत्व, देखने में तो स्थिर लगता है, लेकिन जैसे ही आप उस पर दबाव डालते हैं, वह बिखर जाता है, लेकिन टूटता नहीं। वह बूंदों में बंट जाता है, अपनी राह बना लेता है, और चुपचाप दूर चला जाता है। यह एक रसायनिक सत्य है, लेकिन क्या आपने कभी गौर किया है कि कुछ लोग भी ठीक ऐसे ही होते हैं? कुछ लोग जिनमें ईश्वर तत्व होता है वे अगर बिछड़ जाते हैं तो हजारों कोशिशों से भी मिलते नहींं हैं, उनकी तासीर पारे जैसी होती है

अच्छे लोग क्यों चुपचाप निकल जाते हैं, वे क्यों वापस नहीं आते, और उनका जीवन में होना क्यों अमूल्य होता है। साथ ही, हम यह भी खोजने का प्रयास करेंगे कि हम अपने जीवन में ऐसे लोगों की उपस्थिति को कैसे समझें, उनका आदर करें, और यह न भूलें कि हर रिश्ता एक रसायन शास्त्र ही है — नाजुक, लेकिन जीवन के लिए अनिवार्य।

1. पारा और अच्छे लोगों की समानता

पारा, रसायनशास्त्र की भाषा में, एक ‘लिक्विड मेटल’ है — बहता हुआ, लेकिन कठोर धातु की विशेषताओं वाला। वह ना तो आसानी से संकुचित होता है, ना ही किसी आघात से टूटता है। परंतु, जब आप उसे छेड़ते हैं, तो वह एकत्र नहीं रहता। यह उसका स्वभाव है।

अच्छे लोग भी ऐसे ही होते हैं। वे स्वभाव से सौम्य, सहज, और सहिष्णु होते हैं। वे चोटें सहते हैं, बार-बार सहते हैं, लेकिन जब सहनशीलता की सीमा पार हो जाती है, तो वे कोई शोर नहीं करते। वे ना लड़ते हैं, ना चीखते हैं। वे बस फिसल जाते हैं, चुपचाप, आपकी ज़िन्दगी से।

यह उनकी कमजोरी नहीं, बल्कि उनकी गरिमा है।

2. अच्छे लोग क्यों चोट खाकर चुपचाप चले जाते हैं?

यह सवाल कई बार दिल को कचोटता है — जब उन्होंने कभी शिकायत नहीं की, तो फिर चले क्यों गए?

यहां हमें समझना होगा कि अच्छे लोगों का मूल स्वभाव दूसरों की भावनाओं की कद्र करना होता है। वे बार-बार स्वयं को समझाते हैं, अपनी भावनाओं को पीछे रखते हैं, और यह मानते हैं कि सामने वाला व्यक्ति बस ‘अभी ग़लत समय से गुजर रहा है।’ लेकिन जब वे बार-बार अनदेखे होते हैं, जब उनकी आत्मा पर चोट होने लगती है — तब वे खुद को बचाने के लिए दूर हो जाते हैं।

वे शांति चाहते हैं, टकराव नहीं।

वे मौन से अधिक कहते हैं, और उनकी चुप्पी एक चीख होती है — जिसे हम अक्सर सुन नहीं पाते।

3. क्या उनके चले जाने के बाद हमारी दुनिया बदलती है?

हां, और बहुत गहराई से।

जब कोई अच्छा व्यक्ति आपकी ज़िन्दगी से चला जाता है, तब उसके जाने के समय आप यह महसूस नहीं करते। परंतु, समय के साथ उनके होने और ना होने के बीच का अंतर चीख-चीखकर सामने आता है। जब आपको कोई बिना कहे समझने वाला नहीं मिलता, जब आप गलतियां करते हैं और कोई माफ़ करने वाला नहीं होता, जब आप थक जाते हैं और कोई चुपचाप आपके लिए चाय नहीं बनाता — तब समझ आता है कि जो गया, वह सिर्फ व्यक्ति नहीं था, वह एक ऊर्जा थी।

पारा, जब एकत्रित रहता है, तो वह ठोस लगता है — लेकिन उसके हटते ही जगह खाली-सी लगने लगती है। बिल्कुल वैसा ही है अच्छे लोगों का जाना।

4. क्या अच्छे लोगों का लौट आना संभव है?

दर्शन के अनुसार, समय एक चक्र है। जो गया, वह किसी न किसी रूप में लौटता है — लेकिन क्या वही व्यक्ति, वही भावनाएं, और वही निश्छलता फिर लौटेगी?

संभवतः नहीं।

अच्छे लोग जब किसी के जीवन से जाते हैं, तो अक्सर लौटते नहीं हैं, क्योंकि वे किसी को दोषी नहीं ठहराते। वे बस समझते हैं कि उनके होने की आवश्यकता वहां नहीं थी, और यह अहसास ही उन्हें दूरी की ओर ले जाता है।

वे प्रेम करते हैं, लेकिन स्वाभिमान से। वे क्षमा करते हैं, लेकिन आत्मसम्मान छोड़ते नहीं।

5. समाज में अच्छे लोगों की भूमिका

दार्शनिक दृष्टि से देखें तो अच्छे लोग समाज की रीढ़ होते हैं। वे शिक्षक होते हैं जो डांट नहीं लगाते, मित्र होते हैं जो टोकते नहीं, और परिजन होते हैं जो दबाव नहीं डालते। वे वह आधार होते हैं जिन पर समाज की करुणा, सहिष्णुता और नैतिकता टिकी होती है।

लेकिन जब समाज इन्हें कमज़ोरी समझता है, उनका मज़ाक बनाता है, और उन्हें ‘अति भावुक’ या ‘कमज़ोर व्यक्ति’ कहकर अनदेखा करता है — तब वे अपने को समेट लेते हैं।

और तब समाज एक अदृश्य हानि से ग्रस्त हो जाता है — जो धीरे-धीरे उसकी आत्मा को खा जाती है।

6. हमारी ज़िम्मेदारी क्या है?

यदि जीवन में कभी कोई ऐसा व्यक्ति मिला है जो आपके बिना कहे आपकी मदद करता था, जो आपके झूठ पर भी चुप रहता था, जो आपकी गलती पर भी मुस्कुरा कर समझा देता था — तो यह मत मानिए कि वह हमेशा रहेगा।

अच्छे लोगों को पहचानना भी एक कला है, और उन्हें सहेजना एक जिम्मेदारी।

आपको उनके मौन में अर्थ ढूंढना होगा।

आपको उनके त्याग में प्रेम देखना होगा।

और आपको उनके चले जाने से पहले उन्हें वो आदर देना होगा जो वे मौन रहकर भी मांगते हैं।

7. अंतर्मन की एक यात्रा

“अच्छे लोग पारे की तरह होते हैं…” इस पंक्ति में दर्शन छुपा है। यह एक चेतावनी भी है और एक प्रस्ताव भी।

चेतावनी — कि यदि हम अपने जीवन में आए अच्छे लोगों को अनदेखा करेंगे, चोट पहुंचाएंगे, या उन्हें हल्के में लेंगे, तो वे चुपचाप चले जाएंगे, और फिर केवल पछतावा शेष बचेगा।

प्रस्ताव — कि यदि हम उन्हें समझें, सराहें, और उनके मौन की भाषा जानें — तो वे हमेशा हमारे जीवन का हिस्सा रहेंगे, न सिर्फ बाहरी रूप में, बल्कि हमारी आत्मा के तापमान को संतुलित करते हुए।

अच्छे लोग कभी बदला नहीं लेते, वे केवल अपने आपको दूर ले जाते हैं

पारा एक रहस्यमयी तत्व है — वह एक साथ ठंडा भी है और चुभन भरा भी। वह टूटता नहीं, लेकिन बिखरता ज़रूर है। ठीक वैसे ही, अच्छे लोग कभी बदला नहीं लेते। वे केवल अपने आप को दूर ले जाते हैं — ताकि आपकी दुनिया उनकी मौन अनुपस्थिति में खुद को समझ सके।

तो जब अगली बार कोई ऐसा व्यक्ति मिले जो सब कुछ चुपचाप करता हो, आपको बिना शोर समझता हो, आपके मूड के हिसाब से खुद को ढालता हो — तो रुकिए।

उसकी चुप्पी को सुनिए।

उसकी मौन सेवा को समझिए।

क्योंकि हो सकता है, वह एक पारे जैसा व्यक्ति हो — और जीवन में पारा दोबारा नहीं मिलता।

अंत में, एक छोटी कविता:

मौन था वह, फिर भी सबसे मुखर,
उसकी मुस्कान में छुपा था सागर।
चोट दी, सह लिया, कुछ न कहा,
और एक दिन, बस… चला गया।

अब जो भी आईना देखता हूं,
वहां उसका ही प्रतिबिंब पाता हूं।
पारा था वह — चांदी जैसा चमकता,
अब बिखर गया है, फिर ना जुड़ता।

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor