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Sunday, August 23, 2026, 9:24 pm

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एक नदी पर्वत से निकली, गुनगुनाती, मुस्कुराती, गीत आजादी के गाती, वो चली सागर से मिलने, जिस तरह, मैं तुम्हें भी सोचता हूं कुछ इस तरह…

काव्य कलश संस्थान की गोष्ठी में खूब जमा रंग…शब्दो के अमृत ने मन के हर कोने को किया तृप्त

दिलीप कुमार पुरोहित. जोधपुर

प्यास जग की है बुझाने,

गीत आजादी के गाने, 

दो किनारों पर है पै मंझली,

एक नदी पर्वत से निकली, गुनगुनाती, मुस्कुराती,

गीत आजादी के गाती, वो चली सागर से मिलने, जिस तरह, मैं तुम्हें भी सोचता हूं कुछ इस तरह…

जब ये पंक्तियां फिजां में गूंजी तो काव्य कलश की काव्य गोष्ठी में मशहूर गजलकार और गीतकार दिनेश सिंदल छा गए। एक के बाद एक उन्होंने उम्दा गजलें और गीत सुनाए तो काव्य गोष्ठी में मौजूद डेढ़ दर्जन कवि-शाइर-गीतकार वाह-वाह कर उठे। यह गोष्ठी काव्य कलश संस्थान के सचिव श्याम गुप्ता ‘शांत’ के पावटा शक्तिनगर स्थित आवास पर हुई। करीब तीन घंटे चली काव्य गोष्ठी में प्रकृति, प्रेम, देशभक्ति, वंदना, प्रार्थना, अध्यात्म, आत्मिक शांति, करुणा और विभिन्न विषयों को आत्मसात करते हुए कवियों-गीतकारों और गजलकारों ने शमां बांध दिया।

तृप्ति गोस्वामी काव्यांशी की पंक्तियां-

कशमकश की बसर किस शहर में किया जाए। 

दिल ए करार मिलेगा कहीं या 

यहीं ठहरा जाए…।

अपने ही सवालों का जवाब था। उनका कहना था कि हमें वहीं आवास बनाना चाहिए। वहीं आशियाना बनाना चाहिए, जहां सुकून मिले। तभी किसी शाइर की पंक्तियां याद हो आई- और शहर में खून मिलता है- जोधपुर में सुकून मिलता है।

रजा मोहम्मद खान ने सावधान किया-

अंधेरों में चलते-चलते

आदत सी हो गई है

अब जिस्त को अंधेरों से

उल्फत-सी हो गई है। 

अशफाक अहमद फौजदार ने जीवन की सच्चाई इन शब्दों में बयां की-

कल मेरी भी तो शब कैसे गुजरी

तुम्हें क्या मालूम

हर पल याद की बिजली चमकी

तुम्हें क्या मालूम…।

अहरार आहिल की पंक्तियों ने बहारों और प्रेम की बातों को शब्द दिए तो हर कोई वाह-वाह कर उठा-

तुम नहीं हो तो बहारों का तसव्वुर कैसा?

साथ तुम हो तो बहारों की जरूरत क्या है?…

नवीन पंछी ने जन्माष्टमी के संदर्भ में कुछ हकीकत इस तरह बयां की-

सब कृष्णमय हो रहे हैं 

वह भी एक दिन के लिए

मयकृष्ण

कोई होना ही नहीं चाहता

एक क्षण के लिए भी…।

ओमप्रकाश गोयल सायर ने इश्क को इस तरह रेखांकित किया-

हम इश्क में पड़ कर बदनाम हो गए।

उनसे मिला फरेब के नाकाम हो गए।

फिर दुनिया की हकीकत को शब्द दिए-

दुनिया में जो आए हैं राजा, रंक, फकीर। 

आया है सो जाएगा कह गए दास कबीर।

जुगल किशोर सारस्वत की पंक्तियों ने हर किसी को मोहित कर दिया। उन्होंने रंग बदलता आदमी और पीर बनी मेरी प्रियतमा के माध्यम से पीड़ा और अपनी प्रियतमा बताते हुए कई बिंबों में अपनी बात अभिव्यक्त की।

दीपिका रूहानी ने कम पंक्तियों में गहरी बातें कहीं। उन्होंने कहा- वो एक ख्वाब सा है, पर लाजवाब सा है। इसी तरह ना तुम मुस्कुराते, ना हम पास आते…। इन पंक्तियों के माध्यम से उन्होंने ख्वाओं की दुनिया को प्रेम से जोड़कर अपनी भावनाएं अभिव्यक्त कीं। दिलीप कुमार पुरोहित ने अपनी रचनाओं के माध्यम से धर्म के आडंबर की बजाय प्रकृति को सर्व शक्तिमान मानकर उनकी पूजा करने का आह्वान किया। नीलम व्यास स्वयंसिद्धा ने- मां पर कैसे गीत लिखूं…मां ने मुझे रच डाला…पंक्तियां सुनाई। देशभक्ति पर आधारित उनका गीत खूब पसंद किया गया।

श्याम गुप्ता शांत ने कोरोना काल की पीड़ा को शब्द दिए। उन्होंने उस दौर की स्थिति का चित्रण करते हुए भगवान से प्रार्थना की कि ऐसे दिन अब कभी ना दिखाए। उनकी कविता में यह भावना थी कि सर्वे भवंतु सुखिन:…।

प्रमोद वैष्णव की पंक्तियों ने सावधान किया- –

अब सांपों से डर नहीं लगता मुझको

पाल लिए हैं मैंने भी दो-चार नेवले 

कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में वरिष्ठ लेखक और कवि डॉ. विपिन बिहारी गोयल मौजूद थे। उन्होंने सभी रचनाकारों को अपना काव्य संग्रह तेज धूप का सफर भेंट किया और इसमें से कुछ चुनिंदा रचनाएं सुनाईं।

फिल्मी गीतों ने भी धूम मचाई

कार्यक्रम के अंत में डॉ. तृप्ति गोस्वामी काव्यांशी के पति गायक कलाकार वीरेंद्र पुरी गोस्वामी ने कई फिल्मी गीत सुनाए। इस मौके पर दिनेश सिंदल ने भी शानदार फिल्मी नगमे सुनाए। कार्यक्रम का संचालन वरिष्ठ शाइर अशफाक अहमद फौजदार ने किया और अपनी सधी हुई आवाज से रंग जमा दिया। कार्यक्रम के अंत में काव्य कलश संस्थान के सचिव श्याम गुप्ता शांत ने सभी रचनाकारों और आगंतुकों का आभार जताया।

 

 

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor