श्री भगवान महावीर विकलांग सहायता समिति की स्थापना रिटायर आईएएस अधिकारी डीआर मेहता ने 1975 में जयपुर में की थी। उन्होंने अपने विजन से इसे दुनिया का सबसे बड़ा विकलांग सेवा का नॉन प्रॉफिट ऑर्गेनाइजेशन बनाया। इसकी जोधपुर शाखा के अध्यक्ष सुरेश गांधी और सचिव प्रवीण संचेती हैं। शाखा कार्यालय का कार्य हुक्मीचंद मेहता देखते हैं। समिति कार्यालय में हुक्मीचंद मेहता ने राइजिंग भास्कर को समिति के कार्यों की विस्तार से जानकारी दी।
दिलीप कुमार पुरोहित. पंकज जांगिड़. जोधपुर
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कभी वो दिन थे जब जोधपुर की गलियों में कई ऐसे चेहरे दिख जाते थे जिनकी आंखों में कहीं न कहीं निराशा तैरती दिखाई देती थी। जिनके हाथ-पैर कुदरती दुर्घटनाओं में छिन गए थे, उनकी दुनिया सीमित दीवारों के बीच सिमट गई थी। चलना, दौड़ना तो दूर, एक सामान्य व्यक्ति जैसा जीवन जीना भी मुश्किल था। पेड़ पर चढ़ना तो असंभव लगता था, और नाचना-गाना तो जैसे कल्पना से भी परे! लेकिन आज वही लोग कृत्रिम पैर के सहारे न केवल चलते-फिरते हैं, बल्कि पेड़ों पर चढ़ जाते हैं, नाचकर अपनी खुशी का इजहार करते हैं और जीवन को दोबारा उसी मुस्कान के साथ जी रहे हैं, जिसकी उम्मीद वर्षों पहले धुंधली पड़ गई थी। यह करिश्मा संभव हुआ है — श्री भगवान महावीर विकलांग सहायता समिति की निस्वार्थ सेवा और मानवता को फिर से जीवंत करने वाले प्रयासों से।
आज से लगभग 40-50 वर्ष पहले, जोधपुर में कृत्रिम पैर और हाथ की कल्पना तक नहीं की जा सकती थी। उस समय किसी दिव्यांग के लिए चलना-फिरना तो दूर, अपने पैरों पर खड़े होना भी एक सपना था। लेकिन 1975 में जयपुर में एक संस्था की स्थापना हुई — जिसने न केवल इस सोच को बदला, बल्कि विकलांगजनों के लिए उम्मीद का सबसे बड़ा दीया जला दिया। रिटायर्ड आईएएस अधिकारी डी.आर. मेहता के विजन ने इस संस्था को जन्म दिया — श्री भगवान महावीर विकलांग सहायता समिति (BMVSS)। आज वही संस्था दुनिया की सबसे बड़ी नॉन-प्रॉफिट ऑर्गेनाइजेशन बन चुकी है, जो निःशुल्क कृत्रिम पैर, हाथ और अन्य उपकरण उपलब्ध कराकर लाखों जीवन में बदलाव ला चुकी है।
44 देशों तक पहुंची सेवा, 24 लाख से अधिक लोग लाभान्वित
डी.आर. मेहता की सोच थी — गरीब से गरीब व्यक्ति भी बिना आर्थिक बोझ के जीवन जीने की क्षमता पा सके। और यही सोच आज एक ऐसा वटवृक्ष बन चुकी है जिसकी छाया में लाखों परिवार खुशियां जी रहे हैं। देश में 36 केंद्र और 44 देशों में आयोजित कैंप इसकी पहुँच और प्रभाव की कहानी खुद बयान करते हैं। अफगानिस्तान हो या इराक, कंबोडिया, इथोपिया, बांग्लादेश या केन्या — जहां भी पैर खो चुके, दुर्घटना या जन्मजात विकलांगता से जूझ रहे लोग मिले, संस्था वहां उम्मीद बनकर पहुंची। मार्च 2025 तक संस्था 24 लाख लोगों को निःशुल्क कृत्रिम हाथ-पैर और सहायक उपकरण दे चुकी है। सोचिए, यह संख्या सिर्फ आंकड़ा नहीं — 24 लाख मुस्कुराते चेहरे हैं, 24 लाख परिवारों में लौटी जिंदगी है, 24 लाख पुनर्जन्म की कहानियाँ!
जोधपुर शाखा — 1980 से सेवा की खुशबू फैलाती हुई
जोधपुर में समिति की शाखा मार्च 1980 में स्थापित हुई। शुरुआत में यह शाखा महात्मा गांधी अस्पताल में संचालित थी। बढ़ती जरूरतों और सेवा विस्तार के साथ आज यह मथुरादास माथुर अस्पताल परिसर में मजबूती से कार्यरत है। हर दिन यहां दूर-दराज गांवों से, शहरों से, पड़ोसी जिलों और प्रदेशों से लोग उम्मीद लेकर आते हैं — और ज्यादातर मुस्कुराहट लेकर लौटते हैं। समिति न केवल कृत्रिम पैर और हाथ बनाती है, बल्कि कैलिपर्स, ब्रेसेज़, स्पलिंट, ट्राई-साइकिल, व्हीलचेयर, वॉकर, वैशाखी, कान की मशीनें आदि भी पूरी तरह निशुल्क वितरित करती है। यहां का पूरा सेटअप आधुनिक तकनीक और मानवीय संवेदनाओं का संगम है।
कैसे बनता है कृत्रिम पैर? — उम्मीद से शुरुआत, जीवन भर खुशियां
जब कोई मरीज यहां पहुंचता है, सबसे पहले उसकी स्थिति का आकलन किया जाता है। उसके हाथ-पैर और पंजों का सटीक नाप लिया जाता है। फिर अलग-अलग विभागों में विशेषज्ञ टीमें सामग्री तैयार करती हैं, फिटिंग करती हैं और जरूरत के अनुसार संशोधन कर उसे अंतिम रूप देती हैं।
और फिर आता है वह पल — जब व्यक्ति पहली बार कृत्रिम पैर लगाकर खड़ा होता है। पुराने मरीजों के अनुभव बताते हैं —
“पहला कदम उठाते ही ऐसा लगा जैसे जिंदगी ने फिर से हाथ पकड़ लिया।” कई लोग खुशियों से रो पड़ते हैं, कई हँसते हैं, कई माता-पिता अपने बच्चों को दौड़ते देखकर फूट-फूटकर रोते हैं। यहां हर दिन दर्जनों ऐसी भावुक कहानियाँ जन्म लेती हैं।
विदेशों में भी भारतीय मानवता का डंका
संस्था सिर्फ देश में ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी राहत पहुंचाती रही है। युद्धग्रस्त देशों, आर्थिक संकट झेल रहे राष्ट्रों, प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित क्षेत्रों में शिविर लगाकर हजारों-लाखों को सहारा दिया गया। अफगानिस्तान, बांग्लादेश, कंबोडिया, कांगो, इथोपिया, इंडोनेशिया, ईरान, इराक, कीनिया, लेबनान सहित कई देशों में जयपुर फुट लगाकर वहां के लोगों को चलना सिखाया गया। यह केवल सेवा नहीं — मानवता का सबसे सुंदर रूप है।
सिर्फ उपकरण नहीं, जिंदगी लौटती है
जिनके लिए पहले चल पाना भी कठिन था, आज वे दौड़ रहे हैं, खेल रहे हैं, नौकरी कर रहे हैं, पेड़ों पर चढ़ रहे हैं। कुछ तो मंचों पर नाचकर अपनी खुशियाँ व्यक्त कर रहे हैं। डॉक्टरों के अनुसार, कृत्रिम अंग लगने के बाद व्यक्ति में आत्मविश्वास कई गुना बढ़ जाता है और यही आत्मविश्वास भविष्य की दिशा तय करता है। यहाँ आने वाला हर व्यक्ति सिर्फ एक लाभार्थी नहीं — एक नया जीवन पाने वाला योद्धा है।
सेवा जारी रखने में भामाशाहों का योगदान महत्वपूर्ण
जोधपुर शाखा के इंचार्ज हुक्मीचंद मेहता बताते हैं कि संस्था पूर्णतः भामाशाहों के सहयोग से चलती है। समाज के दानीजन निरंतर आर्थिक सहयोग देते हैं, जिससे निःशुल्क सेवाएँ निरंतर जारी रह पाती हैं। उन्होंने जानकारी दी कि हाल ही में लांडनूं में शिविर आयोजित किया गया था और 9, 10, 11 जनवरी को जोधपुर में भी बड़ा शिविर प्रस्तावित है, जिसमें सैकड़ों लोग नए जीवन की आशा के साथ पहुंचेंगे।
सेवा ही धर्म — आशा की एक रोशनी, 24 लाख कहानियाँ
जो लोग कभी दूसरों पर निर्भर थे, आज वही लोग घर-परिवार संभाल रहे हैं, रोजगार कर रहे हैं, हंसते-खेलते जीवन जी रहे हैं। उनकी आँखों में अब बेबसी नहीं, सपने चमकते हैं। श्री भगवान महावीर विकलांग सहायता समिति केवल कृत्रिम पैर नहीं लगाती —
वह उम्मीद देती है, हौसला देती है, जीवन देती है। जोधपुर और दुनिया भर में फैला यह सेवा का प्रकाश आने वाले समय में और तेज होगा — और शायद कोई बच्चा जो पहले घुटनों पर रेंगता था, कल उसी पेड़ की टहनी पर मुस्कुराता हुआ नजर आए…यह सिर्फ खबर नहीं — मानवता की सबसे खूबसूरत कहानी है।
Author: Dilip Purohit
Group Editor






