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Friday, May 1, 2026, 4:18 am

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धुरंधर-2 : कहानी दमदार, अभिनय शानदार…लेकिन हिंसा और गालियों ने बिगाड़ा संतुलन; काश ‘शतक’ को भी जनता का इतना प्यार मिलता

आरएसएस के सौ वर्ष पूरे होने पर बनी ‘शतक’ जैसी राष्ट्रभावना वाली फिल्मों को नजरअंदाज कर रहे दर्शक, क्या बदल रही है सिनेमा की दिशा और समाज की पसंद? केवल 15 दिन पहले सिनेमा हॉल में शतक को देखने केवल दो कपल बैठे थे…राष्ट्रवाद पर बनी फिल्मों की यह स्थिति देश के लिए अच्छी नहीं हैं…सिनेमा किस दिशा में जा रहा है-सोचने की जरूरत है?

जिस देश में अध्यात्म, संस्कार-संस्कृति को प्राण माना जाता है, वहां हिंसा, गाली-गलौच और नशे को प्रमोट करने वाली फिल्मों की अनदेखी की जानी चाहिए। इसमें कोई दो राय नहीं कि धुरंधर-2 की कहानी और कलाकारों का अभिनय अच्छा है, पर सभ्य समाज में हिंसा, अभद्र भाषा और नशे को कैसे स्वीकारोक्ति मिल सकती है? सिनेमा की यह दिशा भावी भारत की उज्ज्वल तस्वीर और जिम्मेदारी से मुंह मोड़ने वाली है।

सिनेमा केवल स्क्रीन पर चलने वाली कहानी नहीं, बल्कि समाज के भविष्य की पटकथा भी लिखता है। 

दिलीप कुमार पुरोहित. जोधपुर

9783414079 diliprakhai@gmail.com 

आज के दौर में सिनेमा केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि समाज के विचारों, मूल्यों और दिशा का दर्पण भी बन चुका है। हाल ही में रिलीज हुई फिल्म धुरंधर-2 इसी बहस के केंद्र में आ गई है। फिल्म को दर्शकों से अच्छा रिस्पॉन्स मिल रहा है, लेकिन इसके साथ ही यह कई गंभीर सवाल भी खड़े कर रही है—क्या अच्छी कहानी और बेहतरीन अभिनय के बावजूद गाली-गलौच, अतिरंजित हिंसा और नशे के दृश्य जरूरी थे?

राइजिंग भास्कर की यह विशेष रिपोर्ट धुरंधर-2 के बहाने बदलते सिनेमा, दर्शकों की पसंद और सामाजिक प्रभावों की गहराई से पड़ताल करती है। यह रिपोर्ट हमने दर्शकों से बातचीत और बुद्धिजीवी वर्ग के साथ कई फैमिली जो धुरंधर-2 के दर्शक दीर्घा में थे उनका मानना था कि अच्छी कहानी, अच्छे अभिनय के बावजूद हम अपने बच्चों को यह फिल्म देखने के लिए प्रमोट नहीं कर सकते। क्योंकि सभ्य समाज में अतिरंजित हिंसा, अभद्र भाषा-गाली-गलौच और नशे के दृश्य को स्वीकारोक्ति कैसे दी जा सकती है?

कहानी: भारतीय जासूस की जाबांजी, आतंकवाद का नेक्सस ध्वस्त करने, नकली नोटों का प्रवाह रोकने और भारत के दुश्मनों के खिलाफ एक्शन की प्रभावशाली प्रस्तुति

धुरंधर-2 की कहानी अपने आप में काफी मजबूत है। ‘धुरंधर-2: द रिवेंज’ एक जासूसी थ्रिलर फिल्म है, जिसमें रणवीर सिंह मुख्य भूमिका में हैं।  कहानी पहले भाग के बाद की है, जहां जसकीरत सिंह (हमजा अली मजारी) पाकिस्तान में रहकर आतिफ अहमद के आतंकी नेटवर्क और आईएसआई के मंसूबों को खत्म करने के लिए देश की दुश्मनों के बीच पैठ बनाता है। फिल्म में देशभक्ति और जासूसी का मिश्रण दिखाया गया है। जसकीरत सिंह जो हमजा अली मजारी बन चुका है, अपने परिवार के बदले और देशभक्ति के लिए काम करता है। वह पाकिस्तान में ड्रग्स और हथियारों के नेटवर्क को तोड़ता है और रहमान डकैत के खात्मे के बाद बाकी दुश्मनों (जैसे मेजर इकबाल) का सामना करता है। यह फिल्म वास्तव में भू-राजनीतिक घटनाओं (जैसे ऑपरेशन नोटबंदी) से प्रेरित बताई जा रही है। रणवीर सिंह के साथ इसमें आतिफ अहमद का किरदार एक शक्तिशाली राजनेता के रूप में है, जिसका संबंध ISI से है। कुल मिलाकर यह फिल्म कांग्रेस सरकार के 70 साल के शासन का कच्चा चिट्‌ठा खोलती है, जिसमें बताया गया है कि किस तरह आईएसआई ने भारत को कमजोर करने की कोशिश की और पीएम मोदी ने नोटबंदी जैसे कदम उठाकर आतंकवाद और नकली नोटों के प्रवाह को रोका। फिल्म जैसे-जैसे आगे बढ़ती है देशभक्ति की भावना भर देती है। यह बात सही है कि फिल्म में गालियां और अति हिंसा है, पर फिल्म की कहानी को देखते हुए उसे दर्शक इग्नोर कर देते हैं। फिल्म की पटकथा दर्शकों को बांधे रखने में सफल रहती है। कई सीन ऐसे हैं जो लंबे समय तक याद रह सकते हैं। यह कहना गलत नहीं होगा कि फिल्म में गालियां और अति हिंसा का प्रदर्शन है, लेकिन देशभक्ति और हिंदुओं को जगाने की इस फिल्म में पूरी जद्दोजहद देखी जा सकती है।

अभिनय: कलाकारों ने निभाया पूरा न्याय

फिल्म के सभी प्रमुख कलाकारों ने अपने-अपने किरदारों को पूरी ईमानदारी से निभाया है। मुख्य अभिनेता का एंटी-हीरो अवतार प्रभावशाली है, जबकि सहायक कलाकारों ने भी कहानी को मजबूती दी है। डायलॉग डिलीवरी, बॉडी लैंग्वेज और इमोशनल सीन—हर जगह कलाकारों का प्रदर्शन सराहनीय है। यही वजह है कि दर्शक फिल्म से जुड़े रहते हैं, भले ही कुछ दृश्य उन्हें असहज कर दें।

ए सर्टिफिकेट: संकेत साफ, लेकिन क्या पर्याप्त?

धुरंधर-2 को ‘ए’ सर्टिफिकेट मिला हुआ है, यानी यह फिल्म वयस्क दर्शकों के लिए है। यह सर्टिफिकेट पहले ही संकेत देता है कि फिल्म में कुछ ऐसा कंटेंट है जो सभी उम्र वर्ग के लिए उपयुक्त नहीं है। लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल ‘ए’ सर्टिफिकेट देना ही पर्याप्त है? या फिर कंटेंट के स्तर पर भी जिम्मेदारी निभाई जानी चाहिए?

गाली-गलौच और अभद्र भाषा: जरूरत से ज्यादा

फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी इसकी भाषा बनकर सामने आई है। कई संवादों में गालियों का अत्यधिक प्रयोग किया गया है। ऐसा लगता है कि हर तीखे सीन को प्रभावशाली बनाने के लिए गालियों का सहारा लिया गया है। दर्शकों का कहना है कि कुछ सीमित और सटीक प्रयोग तक यह स्वीकार्य हो सकता था, लेकिन जब यह हर दूसरे सीन में दिखने लगे, तो यह बोझिल और अनावश्यक लगता है।

अतिरंजित हिंसा: क्या यथार्थ के नाम पर अति?

धुरंधर-2 में एक्शन और हिंसा का स्तर काफी ऊंचा है। कई दृश्य इतने तीव्र हैं कि वे संवेदनशील दर्शकों के लिए असहज हो सकते हैं। फिल्म के समर्थक इसे ‘रियलिस्टिक’ बताते हैं, लेकिन आलोचकों का कहना है कि यथार्थ दिखाने के नाम पर हिंसा को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करना जरूरी नहीं था।

नशे के दृश्य: ग्लैमराइजेशन पर सवाल

फिल्म में शराब और सिगरेट के कई दृश्य हैं, जिन्हें स्टाइलिश तरीके से फिल्माया गया है। इससे यह संदेश जाता है कि नशा किसी ‘पावर’ या ‘स्टेटस’ का प्रतीक है। विशेषज्ञ मानते हैं कि इस तरह के दृश्य युवा पीढ़ी को प्रभावित कर सकते हैं और गलत संदेश दे सकते हैं।

सांस्कृतिक संदर्भ: विरोधाभास की स्थिति

भारत एक ऐसा देश है जो अपनी संस्कृति, परंपरा और आध्यात्मिक मूल्यों के लिए जाना जाता है। यहां ‘संस्कार’ और ‘संयम’ की बात की जाती है। ऐसे में जब फिल्मों में गाली-गलौच, हिंसा और नशे को इस स्तर पर दिखाया जाता है, तो यह एक विरोधाभास पैदा करता है। एक ओर हम सांस्कृतिक अभ्युदय की बात करते हैं, वहीं दूसरी ओर इस तरह का कंटेंट युवाओं के सामने परोसा जा रहा है।

तुलना: ‘धुरंधर-2’ बनाम ‘शतक’

धुरंधर-2 की तुलना यदि फिल्म ‘शतक’ से की जाए, तो यह अंतर और स्पष्ट हो जाता है। आरएसएस के सौ वर्ष पूरे होने पर ‘शतक’ फिल्म का निर्माण एक विशेष उद्देश्य के साथ किया गया था—राष्ट्र भावना और सांस्कृतिक मूल्यों का प्रसार। इस फिल्म का उद्देश्य केवल मनोरंजन या लाभ कमाना नहीं था, बल्कि समाज में सकारात्मक विचारधारा को बढ़ावा देना था। इसके विपरीत, धुरंधर-2 एक व्यावसायिक फिल्म है, जो दर्शकों को आकर्षित करने के लिए अधिक ‘मसालेदार’ तत्वों का उपयोग करती है।

1: धुरंधर-2 की प्रमुख विशेषताएं

  • मजबूत और प्रभावशाली कहानी
  • सभी कलाकारों का शानदार अभिनय
  • उच्च स्तर का तकनीकी निर्माण
  • तेज गति और रोमांचक स्क्रीनप्ले
  • लेकिन: गालियों, हिंसा और नशे के दृश्य की भरमार

2: ‘शतक’ फिल्म की विशेषताएं

  • राष्ट्रवादी और सांस्कृतिक विषयवस्तु
  • प्रेरणादायक कहानी
  • पारिवारिक दर्शकों के लिए उपयुक्त
  • सामाजिक संदेश से भरपूर
  • सीमित दर्शक, कम व्यावसायिक सफलता

दर्शकों की भूमिका: क्या हम जिम्मेदार हैं?

यह भी एक महत्वपूर्ण पहलू है कि आखिर दर्शक किस तरह की फिल्मों को पसंद कर रहे हैं। जानकारी के अनुसार, ‘शतक’ फिल्म जब सिनेमाघरों में लगी, तो कई जगह दर्शकों की संख्या बेहद कम थी। यहां तक कि कुछ शो में केवल दो-तीन दर्शक ही मौजूद थे।इसके विपरीत, धुरंधर-2 जैसी फिल्में भीड़ खींच रही हैं। इससे एक बड़ा सवाल उठता है—क्या दर्शक खुद इस प्रवृत्ति को बढ़ावा दे रहे हैं?

मीडिया की भूमिका भी सवालों के घेरे में

धुरंधर-2 को लेकर मीडिया और टीवी चैनलों की भूमिका भी चर्चा में है। कई जगह फिल्म की खूब प्रशंसा की गई, लेकिन इसके नकारात्मक पहलुओं—जैसे गाली-गलौच, हिंसा और नशे के दृश्य—पर पर्याप्त चर्चा नहीं हुई। मीडिया का काम केवल प्रमोशन करना नहीं, बल्कि संतुलित विश्लेषण प्रस्तुत करना भी है।

निर्माता-निर्देशक की सोच: मांग या मजबूरी?

फिल्म इंडस्ट्री में अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि “जो बिकता है, वही बनता है।” यानी दर्शक जिस तरह का कंटेंट पसंद करते हैं, निर्माता-निर्देशक उसी दिशा में फिल्में बनाते हैं। यदि दर्शक ‘शतक’ जैसी फिल्मों को अधिक समर्थन दें, तो संभव है कि भविष्य में ऐसी फिल्मों की संख्या बढ़े।

युवा पीढ़ी पर प्रभाव

फिल्में युवाओं के सोचने और व्यवहार करने के तरीके को प्रभावित करती हैं। जब वे स्क्रीन पर अपने पसंदीदा कलाकारों को गाली देते, हिंसा करते और नशा करते देखते हैं, तो इसका असर उनके मन पर पड़ सकता है। यह जरूरी है कि सिनेमा केवल मनोरंजन तक सीमित न रहे, बल्कि सकारात्मक दिशा भी प्रदान करे।

फिल्म यादगार पर, संतुलन की जरूरत

धुरंधर-2 एक ऐसी फिल्म है जिसमें अपार संभावनाएं थीं। मजबूत कहानी और शानदार अभिनय इसे एक यादगार फिल्म बना सकते थे, लेकिन गाली-गलौच, अतिरंजित हिंसा और नशे के अनावश्यक दृश्यों ने इसके प्रभाव को कमजोर कर दिया। वहीं ‘शतक’ जैसी फिल्में, जो समाज और राष्ट्र के लिए सकारात्मक संदेश देती हैं, उन्हें दर्शकों का पर्याप्त समर्थन नहीं मिल रहा। यह समय है जब दर्शक, निर्माता और मीडिया—तीनों को आत्ममंथन करना चाहिए।

  • दर्शक तय करें कि वे किस तरह का सिनेमा देखना चाहते हैं
  • निर्माता समझें कि मनोरंजन के साथ जिम्मेदारी भी जरूरी है
  • और मीडिया संतुलित दृष्टिकोण अपनाए

क्योंकि सिनेमा केवल स्क्रीन पर चलने वाली कहानी नहीं, बल्कि समाज के भविष्य की पटकथा भी लिखता है।

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor