Explore

Search

Thursday, April 30, 2026, 11:18 pm

Thursday, April 30, 2026, 11:18 pm

LATEST NEWS
Lifestyle

“करुणा से सशक्त समाज की ओर: ‘केयरगिवर्स आशा सोसाइटी’ बना देखभालकर्ताओं का सबसे बड़ा सहारा”

प्रियदर्शन पाटनी ने बताया कि केयरगिवर्स आशा सोसाइटी बुजुर्गों, दिव्यांगों और बीमार लोगों की देखभाल को नव आयाम देता है। वरिष्ठ फिजिशियन डॉ. अरविंद माथुर द्वारा स्थापित केयरगिवर्स आशा सोसाइटी ‘ज्ञान, कौशल और गरिमा’ के मंत्र से अब हजारों परिवारों की जिंदगियां बदल रही हैं।

दिलीप कुमार पुरोहित. जोधपुर

9783414079 diliprakhai@gmail.com

समाज में अक्सर वे लोग अनदेखे रह जाते हैं, जो सबसे ज्यादा जिम्मेदारी निभाते हैं—अपने घर के बुजुर्गों, बीमारों या दिव्यांगों की दिन-रात सेवा करने वाले केयरगिवर्स (देखभालकर्ता)। लेकिन अब यह तस्वीर बदल रही है। जोधपुर से शुरू हुई एक अनूठी पहल—“केयरगिवर्स आशा सोसाइटी”—ने इन अनदेखे नायकों को पहचान, प्रशिक्षण और सम्मान देने का अभियान छेड़ दिया है। केयरगिवर्स आशा सोसाइटी से जुड़े प्रियदर्शन पाटनी ने बताया कि—“करुणा ही असली चिकित्सा है और देखभाल केवल इलाज नहीं, बल्कि जीवन जीने का तरीका है।”

भावनाओं से जन्मी एक सशक्त पहल

रूचिरा अग्रवाल जो कि केयरगिवर्स की महत्वपूर्ण पिल्लर हैं ने बताया कि “केयरगिवर्स आशा सोसाइटी” की स्थापना वर्ष 2019 में हुई, लेकिन इसकी जड़ें एक गहरे व्यक्तिगत अनुभव से जुड़ी हैं। जोधपुर के वरिष्ठ फिजिशियन डॉ. अरविंद माथुर ने अपनी धर्मपत्नी डॉ. आशा माथुर की स्मृति में इस संस्था की शुरुआत की। डॉ. आशा माथुर का मानना था कि: “देखभाल केवल चिकित्सा प्रक्रिया नहीं, बल्कि संवेदनाओं और रिश्तों की अभिव्यक्ति है।” उनकी इसी सोच को आगे बढ़ाते हुए यह संस्था आज हजारों परिवारों के लिए उम्मीद का केंद्र बन चुकी है।

अनदेखे नायकों को मिला मंच 

सत्य नारायण ने बताया कि भारत में अधिकांश दीर्घकालिक देखभाल घरों में होती है।

  • बुजुर्ग माता-पिता
  • डिमेंशिया या लकवा से पीड़ित मरीज
  • दिव्यांग व्यक्ति

इनकी देखभाल का भार परिवार के सदस्यों पर ही होता है। ये लोग बिना किसी प्रशिक्षण के नर्स, डॉक्टर और भावनात्मक सहारा—तीनों भूमिकाएं निभाते हैं। फिर भी, उन्हें न तो मार्गदर्शन मिलता है, न ही सामाजिक सम्मान। यहीं से शुरू होती है ‘केयरगिवर्स आशा सोसाइटी’ की भूमिका।

“ज्ञान, कौशल और गरिमा”—तीन स्तंभों पर खड़ी पहल

संस्था का मूल उद्देश्य तीन शब्दों में समाहित है:

  1. ज्ञान (Knowledge)

देखभाल से जुड़ी सही जानकारी देना

  • बीमारी की समझ
  • प्राथमिक उपचार
  • मानसिक स्वास्थ्य
  1. कौशल (Skill)

प्रैक्टिकल ट्रेनिंग

  • मरीज को उठाना-बिठाना
  • दवा प्रबंधन
  • स्वच्छता और पोषण
  1. गरिमा (Dignity)
  • देखभालकर्ता का सम्मान
  • उनके योगदान की पहचान

डिजिटल क्रांति: “CareAsha App” बना जेब में डॉक्टर

तकनीक को करुणा से जोड़ते हुए संस्था ने CareAsha App विकसित किया है।

इसकी खासियतें:
  • निशुल्क और बहुभाषी
  • 24×7 मार्गदर्शन
  • सरल भाषा में जानकारी
इसमें क्या मिलता है?
  • डिमेंशिया मरीज से संवाद कैसे करें
  • गिरने से बचाव
  • आपातकालीन स्थिति में क्या करें
  • मानसिक तनाव से कैसे निपटें

एक उपयोगकर्ता ने अपना अनुभव शेयर करते हुए कहा कि  “जब मेरी मां को लकवा हुआ, मैं घबरा गई थी। इस ऐप ने मुझे हर कदम पर मार्गदर्शन दिया।” आज यह ऐप हजारों परिवारों के लिए “डिजिटल सहायक” बन चुका है।

प्रशिक्षण से रोजगार तक : नई दिशा

देखभाल को पेशेवर कौशल में बदलने के लिए संस्था ने ACMERI-ASHA Care Skill Institute की स्थापना की।

यह केंद्र युवाओं को प्रशिक्षित करता है:

  • हेल्थकेयर स्किल्स
  • मरीजों के साथ व्यवहार
  • मानसिक स्वास्थ्य की समझ

खास बात: यह प्रशिक्षण Healthcare Sector Skill Council (HSSC) के मानकों पर आधारित है।

अंतरराष्ट्रीय पहुंच: जोधपुर से दुनिया तक

आज यह पहल केवल स्थानीय नहीं रही।

संस्था जुड़ी है:

  • Global Alliance for Care
  • World Health Organization (WHO) की Civil Society Commission

संस्थापक डॉ. अरविंद माथुर को संयुक्त राष्ट्र के “Summit of the Future” में भारत के सामुदायिक देखभाल मॉडल को प्रस्तुत करने का अवसर भी मिला।

बच्चों में संवेदना का बीजारोपण

संस्था का एक अनूठा कार्यक्रम है—Future Caregivers Initiative

इसमें:

  • 8वीं से 12वीं के विद्यार्थियों को जोड़ा जाता है
  • उन्हें बुजुर्गों से मिलने और समझने का अवसर मिलता है
  • “यंग केयरगिवर प्रतिज्ञा” दिलाई जाती है

उद्देश्य: भविष्य की पीढ़ी को संवेदनशील और जिम्मेदार बनाना

बदली जिंदगी की सच्ची कहानी

श्रीमती लता (परिवर्तित नाम) की कहानी इस पहल का जीवंत उदाहरण है।

  • सास की देखभाल के लिए नौकरी छोड़ दी
  • मानसिक तनाव से जूझ रही थीं

संस्था से जुड़ने के बाद: “अब देखभाल बोझ नहीं, सेवा बन गई है।”

“देखभाल करने वालों की देखभाल”—एक अनूठा दर्शन

संस्था का सबसे महत्वपूर्ण विचार है:

Care for the Caregivers

  • सपोर्ट ग्रुप (Support Circles)
  • अनुभव साझा करने का मंच
  • मानसिक स्वास्थ्य सहायता

यह समझना जरूरी है कि: “अगर देखभालकर्ता मजबूत होगा, तभी मरीज को बेहतर देखभाल मिल पाएगी।”

भविष्य की योजनाएं: करुणा का विस्तार

संस्था आने वाले वर्षों में:

  • जयपुर सहित अन्य शहरों में विस्तार
  • 50 से अधिक प्रशिक्षण वीडियो
  • ग्रामीण क्षेत्रों के लिए Community Care Model
  • ऐप में ऑडियो फीचर

प्रियदर्शन पाटनी ने बताया कि हमारा सपना: “एक ऐसा समाज, जहां हर व्यक्ति देखभाल को अपनी जिम्मेदारी माने।”

सामाजिक प्रभाव: बदलती सोच, मजबूत समाज

इस पहल का असर केवल स्वास्थ्य क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि यह:

  • सामाजिक संवेदनशीलता बढ़ा रही है
  • परिवारों को मजबूत बना रही है
  • युवाओं को रोजगार दे रही है

समाज को संवेदनशील, जिम्मेदार और मानवीय बनाने की पहल 

हरिसिंह, रूपेश पुरोहित और खुशबू शर्मा का मानना है कि आज जब स्वास्थ्य सेवाएं तकनीक और मशीनों पर निर्भर होती जा रही हैं, ऐसे समय में “केयरगिवर्स आशा सोसाइटी” हमें याद दिलाती है कि: “सबसे बड़ी दवा करुणा है, और सबसे बड़ा उपचार देखभाल।” खुशबू शर्मा ने बताया कि यह पहल केवल एक संस्था नहीं, बल्कि एक आंदोलन बन चुकी है—जो समाज को अधिक संवेदनशील, जिम्मेदार और मानवीय बनाने की दिशा में आगे बढ़ रही है।

 

 

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor