8-9 महीने से अटके भुगतान ने तोड़ी स्वास्थ्य व्यवस्था की कमर; मरीज, पेंशनर्स और अस्पताल सभी परेशान—सरकार की सख्ती के बावजूद सिस्टम पर उठे गंभीर सवाल, गंभीर रोगियों के सामने संकट बढ़ा, मेडिकल स्टोर के काट रहे चक्कर…नहीं मिल रही दवाइयां
दिलीप कुमार पुरोहित. जोधपुर
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राजस्थान सरकार की महत्वाकांक्षी योजना राजस्थान गवर्नमेंट हेल्थ स्कीम (RGHS) इस समय अपने सबसे बड़े संकट के दौर से गुजर रही है। योजना के तहत निजी मेडिकल स्टोरों और अस्पतालों को किए जाने वाले भुगतान में भारी देरी ने पूरे स्वास्थ्य तंत्र को हिला कर रख दिया है। हालात ऐसे बन गए हैं कि जहां एक ओर दवा विक्रेता उधार में दवाएं देने से पीछे हट गए हैं, वहीं निजी अस्पतालों ने भी कैशलेस इलाज पर रोक लगाने की चेतावनी दे दी है। इसका सीधा असर लाखों मरीजों, विशेष रूप से पेंशनर्स और बुजुर्गों पर पड़ रहा है।
700 करोड़ तक पहुंचा बकाया, 8-9 महीने से अटका भुगतान
विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार, RGHS के तहत निजी अस्पतालों और मेडिकल स्टोर्स का बकाया भुगतान ₹560 करोड़ से लेकर ₹700 करोड़ से अधिक तक पहुंच चुका है। यह भुगतान पिछले 8 से 9 महीनों से लंबित है, जबकि नियमों के अनुसार 21 दिनों के भीतर भुगतान किया जाना चाहिए। भुगतान में इस असामान्य देरी ने योजना की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
दवा सप्लाई पर ब्रेक, मरीजों को भारी परेशानी
बकाया भुगतान न मिलने के कारण दवा विक्रेताओं ने RGHS के तहत उधार में दवाएं देना बंद कर दिया है। इसका परिणाम यह हुआ कि मरीजों को अब अपनी जेब से पैसे खर्च कर दवाएं खरीदनी पड़ रही हैं। जिन मरीजों की आर्थिक स्थिति कमजोर है या जो पूरी तरह इस योजना पर निर्भर हैं, उनके लिए यह स्थिति बेहद चिंताजनक बन गई है।
मरीजों का कहना है कि उन्हें बार-बार मेडिकल स्टोर के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं, लेकिन वहां से यही जवाब मिलता है कि “भुगतान नहीं आया, इसलिए दवा नहीं मिल सकती।” इससे इलाज की निरंतरता टूट रही है और कई मामलों में मरीजों की हालत भी बिगड़ रही है।
निजी अस्पतालों की चेतावनी—15 मई से बहिष्कार
निजी अस्पताल संघ (RAHA) ने सरकार को साफ चेतावनी दी है कि जब तक कम से कम 50% बकाया भुगतान नहीं किया जाता, तब तक वे अपनी सेवाएं बहाल नहीं करेंगे। संघ ने 15 मई 2026 से RGHS योजना का पूर्ण बहिष्कार करने की चेतावनी भी दी है।यदि ऐसा होता है, तो प्रदेश में कैशलेस इलाज की सुविधा पूरी तरह ठप हो सकती है, जिससे लाखों लोगों को निजी अस्पतालों में इलाज के लिए भारी रकम चुकानी पड़ेगी।
पेंशनर्स और बुजुर्ग सबसे ज्यादा प्रभावित
इस संकट का सबसे ज्यादा असर पेंशनर्स और बुजुर्गों पर पड़ रहा है, जो नियमित रूप से दवाओं पर निर्भर रहते हैं। कई पेंशनर्स ने बताया कि वे हर महीने RGHS के जरिए दवाएं लेते थे, लेकिन अब उन्हें अपनी जेब से खर्च करना पड़ रहा है या दवाएं नहीं मिल पा रही हैं। कई बुजुर्गों को इलाज के लिए बार-बार अस्पताल और मेडिकल स्टोर के चक्कर काटने पड़ रहे हैं, जिससे उनकी परेशानी और बढ़ गई है। स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधा के लिए इस तरह की जद्दोजहद ने सरकार की व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
फर्जीवाड़े पर कार्रवाई, लेकिन सिस्टम पर सवाल बरकरार
इस बीच सरकार ने RGHS में हो रहे फर्जीवाड़े पर सख्ती दिखाते हुए 33 से अधिक फार्मेसियों के लाइसेंस रद्द कर दिए हैं और 30 से अधिक को निलंबित किया है। साथ ही, गलत भुगतान लेने वालों से भारी जुर्माना भी वसूला गया है। हालांकि, यह कार्रवाई आवश्यक थी, लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या इसी वजह से पूरे सिस्टम को ठप होने दिया जा सकता है? विशेषज्ञों का मानना है कि फर्जीवाड़े पर कार्रवाई जरूरी है, लेकिन उसके साथ-साथ ईमानदार सेवा प्रदाताओं को समय पर भुगतान करना भी उतना ही आवश्यक है।
दवा कंपनियों का दबाव, सप्लाई चेन टूटी
दवा सप्लायर कंपनियों ने भी मेडिकल स्टोर्स पर दबाव बनाना शुरू कर दिया है। भुगतान न मिलने के कारण उन्होंने उधार में दवाओं की सप्लाई रोक दी है। इससे पूरे सप्लाई चेन में रुकावट आ गई है और मेडिकल स्टोर्स के पास स्टॉक की कमी होने लगी है। यह स्थिति आने वाले दिनों में और गंभीर हो सकती है, क्योंकि अगर सप्लाई पूरी तरह रुक जाती है, तो बाजार में दवाओं की कमी हो सकती है।
नियमों की अनदेखी—21 दिन का नियम बेअसर
RGHS के नियमों के अनुसार, अस्पतालों और मेडिकल स्टोर्स को 21 दिनों के भीतर भुगतान किया जाना चाहिए। लेकिन वर्तमान स्थिति में यह भुगतान 6 से 9 महीने तक अटका हुआ है। यह न केवल नियमों का उल्लंघन है, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही को भी दर्शाता है।
सिस्टम पर उठे बड़े सवाल
यह पूरा मामला केवल भुगतान में देरी का नहीं, बल्कि सिस्टम की खामियों को उजागर करता है।
- क्या सरकार ने योजना लागू करने से पहले पर्याप्त बजट का प्रावधान किया था?
- क्या भुगतान प्रक्रिया में पारदर्शिता और दक्षता की कमी है?
- क्या फर्जीवाड़े की रोकथाम के लिए मजबूत तंत्र नहीं बनाया गया?
इन सवालों के जवाब अब तक स्पष्ट नहीं हैं।
क्या कह रहे हैं विशेषज्ञ?
स्वास्थ्य क्षेत्र के जानकारों का मानना है कि RGHS जैसी योजनाएं तभी सफल हो सकती हैं, जब सरकार समय पर भुगतान सुनिश्चित करे और साथ ही निगरानी तंत्र को मजबूत बनाए। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर जल्द ही स्थिति नहीं सुधरी, तो निजी क्षेत्र इस योजना से पूरी तरह अलग हो सकता है, जिससे सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था पर अतिरिक्त बोझ पड़ जाएगा।
समाधान क्या हो सकता है?
स्थिति को सुधारने के लिए कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाए जा सकते हैं:
- लंबित बकाया का तत्काल भुगतान किया जाए।
- भुगतान प्रक्रिया को डिजिटल और पारदर्शी बनाया जाए।
- फर्जी बिलिंग रोकने के लिए मजबूत ऑडिट सिस्टम लागू किया जाए।
- दवा सप्लाई चेन को स्थिर रखने के लिए कंपनियों के साथ समन्वय किया जाए।
मरीजों की उम्मीदें सरकार से
मरीजों और उनके परिजनों की सबसे बड़ी मांग यही है कि उन्हें समय पर इलाज और दवाएं मिलें। RGHS योजना का मूल उद्देश्य भी यही था कि सरकारी कर्मचारियों, पेंशनर्स और उनके परिवारों को कैशलेस और बेहतर स्वास्थ्य सुविधा मिले। लेकिन वर्तमान संकट ने इस उद्देश्य को ही चुनौती दे दी है। राजस्थान में RGHS योजना का मौजूदा संकट केवल एक प्रशासनिक समस्या नहीं, बल्कि आम जनता के स्वास्थ्य से जुड़ा गंभीर मुद्दा बन चुका है। अगर सरकार ने जल्द ही ठोस कदम नहीं उठाए, तो यह संकट और गहरा सकता है। समय की मांग है कि सरकार, अस्पताल और दवा विक्रेता मिलकर समाधान निकालें, ताकि मरीजों को राहत मिल सके और योजना अपने मूल उद्देश्य को पूरा कर सके।
Author: Dilip Purohit
Group Editor








