अखबार में लिपटा खाना बन सकता है गंभीर बीमारियों की वजह, FSSAI की सख्ती के बावजूद जारी है खतरनाक लापरवाही
जागरूकता की कमी और नियमों की अनदेखी से बढ़ रहा स्वास्थ्य जोखिम, अब सख्त निगरानी और जनभागीदारी की जरूरत
दिलीप कुमार पुरोहित. जोधपुर
9783414079 diliprakhai@gmail.com
सुबह की चाय के साथ कचौरी हो, शाम को समोसा या पकौड़ी, मंदिर का प्रसाद हो या मिठाई का डिब्बा—देश के अनेक हिस्सों में आज भी अखबार में खाद्य पदार्थ लपेटकर देना सामान्य बात मानी जाती है। अधिकांश लोग इसे केवल सुविधा का साधन समझते हैं, लेकिन यही सुविधा अनजाने में शरीर के भीतर ऐसे रसायन पहुंचा सकती है जो लंबे समय में गंभीर बीमारियों का कारण बन सकते हैं।
भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) वर्षों पहले स्पष्ट कर चुका है कि अखबार या पुनर्चक्रित (रिसाइकल) कागज का सीधे खाद्य पदार्थों के संपर्क में उपयोग नहीं किया जाना चाहिए। इसके बावजूद छोटे-बड़े शहरों, कस्बों और ग्रामीण क्षेत्रों में यह प्रथा आज भी व्यापक रूप से दिखाई देती है।
हाल ही में जैसलमेर के जागरूक नागरिक पंकज भाटिया द्वारा सोशल मीडिया पर जारी अपील ने एक बार फिर इस गंभीर विषय की ओर समाज का ध्यान आकर्षित किया है। यह केवल किसी एक व्यक्ति की चिंता नहीं, बल्कि पूरे समाज के स्वास्थ्य से जुड़ा प्रश्न है।
क्यों खतरनाक है अखबार में खाना रखना?
अखबार की छपाई में उपयोग होने वाली स्याही (Printing Ink) केवल रंग नहीं होती। इसमें कई प्रकार के रसायन और औद्योगिक तत्व शामिल हो सकते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार इनमें—
- मिनरल ऑयल
- रंगद्रव्य (Pigments)
- सॉल्वेंट
- रेजिन
- विभिन्न रासायनिक यौगिक
- पुनर्चक्रित कागज में मौजूद अशुद्धियां
शामिल हो सकती हैं। जब गर्म समोसा, जलेबी, कचौरी, पराठा, पकौड़ी या मिठाई सीधे अखबार के संपर्क में आती है, तो गर्मी और तेल के कारण इन रसायनों के भोजन में स्थानांतरित होने की संभावना बढ़ जाती है।
स्वास्थ्य पर क्या पड़ सकता है असर?
विशेषज्ञ मानते हैं कि लगातार ऐसे खाद्य पदार्थों का सेवन करने से कई प्रकार के स्वास्थ्य जोखिम उत्पन्न हो सकते हैं—
- पाचन तंत्र की गड़बड़ी
- लीवर पर प्रतिकूल प्रभाव
- किडनी पर असर
- हार्मोनल असंतुलन
- बच्चों में विकास संबंधी समस्याएं
- लंबे समय तक संपर्क रहने पर कुछ रसायनों से कैंसर का जोखिम बढ़ने की आशंका
हालांकि हर बार अखबार में रखा भोजन खाने से तुरंत बीमारी होना आवश्यक नहीं है, लेकिन बार-बार ऐसा होना स्वास्थ्य के लिए सुरक्षित नहीं माना जाता।
FSSAI ने क्या कहा है?
भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि—
- अखबार में खाद्य पदार्थ नहीं रखे जाएं।
- रिसाइकल कागज का सीधे खाद्य पदार्थों के संपर्क में उपयोग न किया जाए।
- खाद्य पदार्थ केवल फूड ग्रेड पैकेजिंग सामग्री में ही दिए जाएं।
- दुकानदार और खाद्य व्यवसायी उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य की जिम्मेदारी समझें।
FSSAI का कहना है कि समाचार पत्र छापने वाली स्याही खाद्य उपयोग के लिए नहीं बनाई जाती।
कानून क्या कहता है?
भारत में खाद्य सुरक्षा का संचालन Food Safety and Standards Act, 2006 तथा उसके अंतर्गत बनाए गए नियमों के अनुसार होता है। यदि कोई खाद्य व्यवसायी ऐसे तरीके अपनाता है जिससे भोजन असुरक्षित हो जाए या खाद्य सुरक्षा मानकों का उल्लंघन हो, तो उसके विरुद्ध कार्रवाई की जा सकती है।
उल्लंघन की प्रकृति के अनुसार—
- लाइसेंस निलंबित किया जा सकता है।
- लाइसेंस निरस्त किया जा सकता है।
- सुधार नोटिस जारी किया जा सकता है।
- आर्थिक दंड लगाया जा सकता है।
- गंभीर मामलों में अभियोजन भी चलाया जा सकता है।
यदि असुरक्षित भोजन के कारण किसी व्यक्ति को गंभीर नुकसान होता है, तो Food Safety and Standards Act, 2006 की विभिन्न धाराओं के अंतर्गत भारी जुर्माना, कारावास अथवा दोनों का प्रावधान है। दंड की मात्रा उल्लंघन की प्रकृति और उसके परिणाम पर निर्भर करती है।
किन मामलों में कितना दंड हो सकता है?
(Food Safety and Standards Act, 2006 के विभिन्न प्रावधानों के अनुसार)
- खाद्य सुरक्षा मानकों का उल्लंघन – परिस्थितियों के अनुसार आर्थिक दंड।
- असुरक्षित भोजन बेचने पर – गंभीरता के अनुसार जुर्माना।
- गंभीर स्वास्थ्य क्षति होने पर – कारावास और जुर्माना।
- मृत्यु होने की स्थिति में – कठोर दंड तथा कई लाख रुपये तक का जुर्माना।
नोट: वास्तविक दंड मामले की परिस्थितियों और संबंधित धाराओं के अनुसार सक्षम न्यायालय अथवा प्राधिकरण तय करता है।
फिर भी क्यों जारी है यह प्रथा?
विशेषज्ञ मानते हैं कि इसके पीछे कई कारण हैं—
- जागरूकता की कमी
- कम लागत
- पुरानी आदत
- निगरानी का अभाव
- छोटे दुकानदारों की आर्थिक मजबूरी
- उपभोक्ताओं द्वारा विरोध न करना
सबसे अधिक कहां दिखाई देता है यह चलन?
- चाय की दुकानें
- कचौरी और समोसा विक्रेता
- पकौड़ी और चाट स्टॉल
- मिठाई की दुकानें
- मंदिरों में प्रसाद वितरण
- मेलों और धार्मिक आयोजनों में खाद्य वितरण
किन चीजों को कभी अखबार में नहीं रखना चाहिए?
- गर्म समोसा
- कचौरी
- जलेबी
- मिठाई
- पूड़ी
- पराठा
- पकौड़ी
- नमकीन
- प्रसाद
- फल
- बेकरी उत्पाद
क्या विकल्प उपलब्ध हैं?
आज बाजार में कई सुरक्षित विकल्प उपलब्ध हैं—
- फूड ग्रेड पेपर
- बटर पेपर
- फूड ग्रेड पेपर बैग
- केले के पत्ते (जहां संभव हो)
- प्रमाणित फूड पैकेजिंग शीट
- फूड ग्रेड बॉक्स
- कम्पोस्टेबल पैकेजिंग
राजस्थान में क्या किया जा सकता है?
यदि राज्य स्तर पर विशेष अभियान चलाया जाए तो उल्लेखनीय सुधार संभव है।
सुझाव
- प्रत्येक जिले में विशेष निरीक्षण अभियान।
- नगर निकाय और खाद्य विभाग की संयुक्त कार्रवाई।
- धार्मिक स्थलों पर विशेष जागरूकता।
- स्कूलों में खाद्य सुरक्षा अभियान।
- दुकानदारों का प्रशिक्षण।
- पहली गलती पर चेतावनी, दोबारा उल्लंघन पर कड़ी कार्रवाई।
- पंचायत स्तर तक जनजागरूकता कार्यक्रम।
- बाजार संघों की सहभागिता।
उपभोक्ता क्या करें?
- अखबार में रखा भोजन लेने से मना करें।
- दुकानदार से फूड ग्रेड पैकिंग की मांग करें।
- बच्चों को भी इसके नुकसान बताएं।
- यदि कहीं लगातार नियमों का उल्लंघन हो रहा हो तो खाद्य सुरक्षा विभाग को सूचना दें।
- धार्मिक आयोजनों में भी सुरक्षित पैकेजिंग अपनाने का आग्रह करें।
व्यापारियों की भी जिम्मेदारी
व्यापारी समाज का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। थोड़ी-सी बचत के लिए यदि असुरक्षित पैकेजिंग अपनाई जाती है तो उसका दुष्परिणाम ग्राहकों के स्वास्थ्य पर पड़ सकता है। सुरक्षित पैकेजिंग अपनाना केवल कानूनी दायित्व नहीं, बल्कि सामाजिक उत्तरदायित्व भी है।
जागरूकता ही सबसे बड़ा समाधान
सिर्फ नियम बना देने से परिवर्तन नहीं आता। परिवर्तन तब आता है जब—
- उपभोक्ता जागरूक हों,
- व्यापारी जिम्मेदार हों,
- प्रशासन सक्रिय हो,
- समाज सहयोग करे।
एक जागरूक नागरिक की छोटी-सी अपील भी हजारों लोगों को सुरक्षित भोजन अपनाने के लिए प्रेरित कर सकती है। यही सामाजिक चेतना किसी बड़े जनआंदोलन का आधार बन सकती है।
राइजिंग भास्कर की अपील
“सुरक्षित भोजन चुनें, स्वस्थ जीवन अपनाएं। अखबार पढ़ने के लिए है, भोजन परोसने के लिए नहीं।
आज से संकल्प लें—न हम अखबार में भोजन लेंगे, न किसी को देने देंगे।” देश आज खाद्य सुरक्षा के क्षेत्र में लगातार आगे बढ़ रहा है। FSSAI के नियम केवल कानूनी औपचारिकताएं नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों के स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए बनाए गए हैं। यदि समाज, व्यापारी, प्रशासन और उपभोक्ता मिलकर इनका पालन करें तो अनगिनत लोगों को अनजाने स्वास्थ्य जोखिमों से बचाया जा सकता है। एक छोटी-सी आदत बदलना कठिन नहीं है। अगली बार जब कोई समोसा, मिठाई, प्रसाद या नाश्ता अखबार में लपेटकर दे, तो विनम्रता से कहें—“कृपया इसे फूड-ग्रेड पैकिंग में दें।” यही छोटा कदम सुरक्षित भारत और स्वस्थ राजस्थान की दिशा में बड़ा परिवर्तन ला सकता है।
Author: Dilip Purohit
Group Editor


