Explore

Search

Wednesday, August 5, 2026, 10:04 pm

Wednesday, August 5, 2026, 10:04 pm

LATEST NEWS

The specified slider does not exist.

Lifestyle

दीपक तले अंधेरा: जिस अखबार ने देश को चेताया, उसी के दफ्तर में वर्षों तक अखबार पर खाते रहे खाना

अब समय आ गया है कि जागरूकता की शुरुआत दूसरों से नहीं, स्वयं से करें

विशेष लेख | दिलीप कुमार पुरोहित

एक अखबार का दफ्तर। रात के लगभग नौ-दस बजे का समय। डिनर ब्रेक होता है। संपादकीय विभाग के आठ-दस साथी अपने-अपने टिफिन खोलते हैं। कोई रोटी निकालता है, कोई सब्जी, कोई सलाद। जगह कम होती है, इसलिए पुराने अखबार बिछा दिए जाते हैं। रोटियां उन्हीं पर रखी जाती हैं, सब्जी के डिब्बे भी वहीं टिक जाते हैं। खाना खत्म होता है, अखबार कूड़ेदान में चला जाता है।

यह सिलसिला एक-दो दिन नहीं, महीनों नहीं, बल्कि वर्षों तक चलता रहा।

फिर एक दिन उसी मीडिया समूह के डिजिटल प्लेटफॉर्म पर एक खबर प्रकाशित होती है—अखबार पर रखकर या अखबार में लपेटकर भोजन करना स्वास्थ्य के लिए खतरनाक हो सकता है। छपाई की स्याही में मौजूद कुछ रसायन, भारी धातुएं तथा अखबार की अस्वच्छ सतह गर्म और तैलीय भोजन के संपर्क में आकर भोजन तक पहुंच सकती है। खाद्य सुरक्षा विशेषज्ञ और FSSAI लंबे समय से ऐसी आदत से बचने की सलाह देते रहे हैं।

उस खबर को पढ़ते ही मन में एक ही विचार आया—

“दीपक तले अंधेरा।”

हम करोड़ों लोगों को जागरूक कर रहे थे, लेकिन अपने ही कार्यालय में वर्षों तक वही गलती दोहराते रहे।

आज मैं पूरी विनम्रता और आत्मस्वीकृति के साथ स्वीकार करता हूं कि उन संपादकीय साथियों में एक व्यक्ति मैं भी था। मैं भी अपने टिफिन की रोटियां पुराने अखबार पर रखकर खाता था। तब कभी यह एहसास नहीं हुआ कि जिस कागज पर पूरी दुनिया की खबरें छपती हैं, वह भोजन परोसने के लिए नहीं बना है।

यही इस लेख को लिखने का सबसे बड़ा कारण है।

उपदेश देना आसान, स्वयं बदलना कठिन

दूसरों को सलाह देना आसान है। ज्ञान बांटना भी आसान है। लेकिन उसी ज्ञान को अपने जीवन में उतारना सबसे कठिन काम है। आज यदि हम वास्तव में समाज को बदलना चाहते हैं तो शुरुआत अपने घर, अपने कार्यालय और अपनी आदतों से करनी होगी।

अखबार भोजन के लिए क्यों सुरक्षित नहीं?

कई लोगों का तर्क होता है कि “हम तो वर्षों से ऐसा कर रहे हैं, कुछ नहीं हुआ।” लेकिन चिकित्सा विज्ञान अनुभव नहीं, प्रमाण देखता है। विशेषज्ञों के अनुसार अखबार भोजन के संपर्क के लिए तैयार नहीं किया जाता। उसकी छपाई में प्रयुक्त स्याही, रंग, रसायन और अन्य पदार्थ गर्म, तैलीय या नम भोजन के संपर्क में आकर भोजन तक पहुंच सकते हैं। इसके अलावा पुराने अखबार कई हाथों से गुजरते हैं और उन पर धूल, गंदगी तथा सूक्ष्मजीव भी हो सकते हैं। इसलिए खाद्य सुरक्षा विशेषज्ञ स्पष्ट सलाह देते हैं कि अखबार का उपयोग भोजन लपेटने, परोसने या तले हुए खाद्य पदार्थों का अतिरिक्त तेल सोखने के लिए नहीं करना चाहिए।

यह केवल दुकानदारों की नहीं, हमारी भी जिम्मेदारी है

हम अक्सर सड़क किनारे समोसा, कचौरी, मिर्ची बड़ा, पकौड़े, मूंगफली या जलेबी खरीदते हैं। दुकानदार उन्हें अखबार में लपेट देता है। हम बिना कुछ कहे ले लेते हैं। यदि ग्राहक ही मना कर दे तो दुकानदार भी धीरे-धीरे सुरक्षित विकल्प अपनाएगा। परिवर्तन कानून से नहीं, आदत से आता है।

आज से मेरा पहला संकल्प

  1.  मैं अखबार पर रखकर भोजन नहीं करूंगा।
  2.  अखबार में लिपटा भोजन स्वीकार नहीं करूंगा।
  3.  दुकानदार से फूड-ग्रेड पेपर या सुरक्षित पैकिंग का आग्रह करूंगा।
  4.  अपने परिवार और मित्रों को भी जागरूक करूंगा।

अभियान की शुरुआत अपने घर से करें

हम अक्सर सरकार से उम्मीद करते हैं कि वह अभियान चलाए। लेकिन सबसे प्रभावी अभियान घर से शुरू होता है। यदि आज हर परिवार यह संकल्प ले ले कि—”हम अखबार पर खाना नहीं रखेंगे।”तो करोड़ों लोगों तक संदेश स्वतः पहुंच जाएगा।

क्या करें, क्या नहीं करें

करें
  • फूड-ग्रेड पेपर का उपयोग।
  • स्टील की प्लेट या डिब्बा।
  • कांच या चीनी मिट्टी के बर्तन।
  • केले के पत्ते जैसे सुरक्षित प्राकृतिक विकल्प।
न करें
  • अखबार पर खाना रखना।
  • अखबार में गर्म समोसे या कचौरी लेना।
  • तले हुए भोजन का तेल अखबार से सोखना।
  • बच्चों को अखबार पर भोजन परोसना।

बदलाव की शुरुआत मीडिया संस्थानों से भी हो

मीडिया केवल खबरें प्रकाशित करने वाला माध्यम नहीं है। वह समाज का शिक्षक भी है। यदि किसी मीडिया संस्थान में कर्मचारी आज भी अखबार पर भोजन करते हैं तो सबसे पहले वहीं यह परंपरा समाप्त होनी चाहिए।जिस संस्था ने समाज को जागरूक किया है, वही स्वयं भी उसका पालन करे—यही सबसे बड़ा संदेश होगा।

जानिए FSSAI क्या कहता है?

  • अखबार भोजन पैक करने या परोसने के लिए उपयुक्त सामग्री नहीं है।
  • छपाई की स्याही में ऐसे रसायन हो सकते हैं जो भोजन में स्थानांतरित हो सकते हैं।
  • गर्म और तैलीय भोजन में यह जोखिम अधिक माना जाता है।
  • खाद्य कारोबारियों को फूड-ग्रेड पैकेजिंग सामग्री का उपयोग करना चाहिए।

आत्मचिंतन का समय

आज इस लेख के माध्यम से मैं किसी व्यक्ति, संस्था या दुकानदार पर उंगली नहीं उठा रहा। मैं सबसे पहले स्वयं पर उंगली उठा रहा हूं। क्योंकि बदलाव की शुरुआत स्वीकारोक्ति से होती है। यदि मैं वर्षों तक यह गलती करता रहा और आज मुझे उसका एहसास हुआ है, तो यह मेरी जिम्मेदारी है कि मैं दूसरों को भी इसके प्रति जागरूक करूं।

राइजिंग भास्कर का जन-जागरूकता अभियान

“अखबार खबरों के लिए है, खाने के लिए नहीं”

राइजिंग भास्कर अपने सभी पाठकों से अपील करता है—

  • अपने घर से शुरुआत करें।
  • अपने बच्चों को यह आदत न सिखाएं।
  • दुकानदार से सुरक्षित पैकिंग की मांग करें।
  • जहां भी अखबार में खाद्य सामग्री दी जाए, विनम्रता से मना करें।
  • इस संदेश को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाएं।

मेरा संकल्प

आज मैं फिर एक बार सार्वजनिक रूप से अपना संकल्प दोहराता हूं—

“मैं आज से अखबार पर रखकर भोजन नहीं करूंगा, न अखबार में लिपटी खाद्य सामग्री स्वीकार करूंगा और न किसी को ऐसा करने के लिए प्रेरित करूंगा।”

यदि यह संकल्प केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक परिवार, एक मोहल्ला, एक शहर और फिर पूरा देश ले ले, तो शायद आने वाली पीढ़ियां हमें धन्यवाद देंगी। आइए, आज ही शुरुआत करें। क्योंकि जागरूकता का सबसे पहला कदम हमेशा अपने घर से उठता है।

ये खबर भी जरूर पढ़ें : 

जरूरत की खबर : अखबार में कभी न लपेटें खाना : इंक से कैंसर और फूड पॉइजनिंग का रिस्म, जाने फूड पैकेजिंग का सही और सुरक्षित तरीका

गौरत तिवारी की 19.06.26 को प्रकाशित खबर

 

 

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor