Explore

Search

Thursday, July 9, 2026, 7:26 am

Thursday, July 9, 2026, 7:26 am

LATEST NEWS

The specified slider does not exist.

Lifestyle

डीके पुरोहित के कुछ प्रतिनिधि गीत

(राइजिंग भास्कर के ग्रुप एडिटर डीके पुरोहित संवेदनशील कवि भी हैं। उनके गीतों के संग्रह मैं रहूं न रहूं से कुछ गीत यहां प्रस्तुत है। आपकी प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।)

मैं रहूं न रहूं

मैं रहूं न रहूं

मेरे गीत रहेंगे

तेरी जुबां से 

मेरी कहानी कहेंगे

चांद ख्वाब है

सितारे बहुत दूर है

आसमां की झोली में

रोशनी भरपूर है

लेकिन यह दीप सदा

अंधेरे से लड़ेंगे

मैं रहूं न रहूं

मेरे गीत रहेंगे

जिंदगी का क्या भरोसा

कब सांस थमे

ऐ दोस्त याद कर लेना

हमारे ना होने पर हमें

शब्दों की सरगम

फिर किस्से कहेंगे

मैं रहूं न रहूं

मेरे गीत रहेंगे

जीवन तो है पहेली

मौत का प्रश्न मौन है

इस धरा पर शाश्वत

अमर रहा कौन है

जो दरिया में मिले

जाने किस धारा बहेंगे

मैं रहूं न रहूं

मेरे गीत रहेंगे

आज प्यार करें जी भर

कल तो बस आस है

जीवन की पनघट पर

भला कब बुझती प्यास है

घड़ा तैरता रहेगा

ये धारे यूं ही बहेंगे

मैं रहूं न रहूं

मेरे गीत रहेंगे।

000

सिर्फ ये गम, ये नगमे मेरे हैं

ओ नकाबों में जीने वाले

भगवान खुदा सब तेरे हैं

इस भरी दुनिया में कहने को

सिर्फ ये गम, ये नगमे मेरे हैँ

मुझे न जन्नत की चाह है

न इस धरती से लगाव है

मुझे धूप में जलना है

तुझे भाेगना तेरे हिस्से की छांव है

जब यह माटी तुम्हें बुलाएगी

तुम जाने से घबराओगे

मैं तो मरा हुआ पहले से

ऐ खुदा क्या तुम बुलाओगे

रोशनी के रहबरों सुन लो

हमें प्यारे अंधेरे हैं

ओ नकाबों में जीने वाले

भगवान खुदा सब तेरे हैं

इस भरी दुनिया में कहने को

सिर्फ ये गम, ये नगमे मेरे हैं

ओ कुर्सी को पाने वालों

दौलत पर तुम मरते हो

अपराधों से करके कमाई

सजाओं से फिर डरते हो

मुझे न खोने का डर है

मैं सिर उठाए जीता हूं

तुम सुरा में डूबे रहते

मैं अपने गमों को पीता हूं

सुविधाएं सब तेरे लिए हैं

मेरे आंगन अश्कों के डेरे हैं

ओ नकाबों में जीने वाले

भगवान खुदा सब तेरे हैं

इस भरी दुनिया में कहने को

सिर्फ ये गम, ये नगमे मेरे हैं।

000

बिन बंदगी जिंदगी जिए जा रहे

बिन बंदगी जिंदगी जीए जा रहे हैं

कोई आवारा झोंका दगा दे जाएगा

समंदर में उतरना कहां आसान है

पानी का दरिया भगा ले जाएगा

जिधर देखो उधर शैतान का डर है

जहां में महफूज कहां अपना घर है

कश्ती के पीछे पड़ी जालिम लहर है

तिनका भी यहां आग लगा जाएगा

बिन बंदगी जिंदगी जीए जा रहे हैं

कोई आवारा झोंका दगा दे जाएगा

जिसको मनाना है उससे रूठें हैं

ऐ दुनिया तेरे दस्तूर अनूठे हैं

एक सच्चा तो हजार झूठे हैं

अपनों के बीच ठगा जाएगा

बिन बंदगी जिंदगी जीए जा रहे हैं

कोई आवारा झोंका दगा दे जाएगा

किस्मत को कोसो चाहे हजार

उसी का है सुखी संसार

जो कर्म से करता आया है प्यार

बैरन सपना नींद से जगा जाएगा

बिन बंदगी जिंदगी जीए जा रहे हैं

कोई आवारा झोंका दगा दे जाएगा।

000

दुनिया जहर पिलाती रही

दुनिया जहर पिलाती रही

हम अमृत लुटाते रहे

कांटों ने दिए लाख जख्म

फूल थे कि मुस्काते रहे

वो आदमी थे जिनका काम

अपनों से दगा करना रहा

हम तो कुछ थे ही नहीं

हमारा क्या जीना-मरना रहा

शून्य तो परिभाषित होता

इससे कम खुद को गिनाते रहे

दुनिया जहर पिलाती रही

हम अमृत लुटाते रहे

खुदा होता जो मैं तो

हर खता की सजा देता

जो होता भगवान तो

मौत का बिगुल बजा देता

शब्दों के रहे जो साधक

खुद को कागज पर गलाते रहे

दुनिया जहर पिलाती रही

हम अमृत लुटाते रहे

सोचता हूं कभी अकेले में

क्यों बनाते हैं इबादत के घर

क्या कमी है परमतत्व को

क्या कमी है उसके दर

मैं मूरख नादां सही

समझदार तर्क बताते रहे

दुनिया जहर पिलाती रही

हम अमृत लुटाते रहे

पत्थरों में पत्थर को पूजते

मीनारों में उसे पुकारा

चर्च-मंदिर-गुरुद्वारों में 

क्यों ढूंढ़ते रहे सहारा

दुखियारे मां बाप को

क्यों न गले लगाते रहे

दुनिया जहर पिलाती रही

हम अमृत लुटाते रहे।

000

मतलब के सब रिश्ते नाते

मतलब के सब रिश्ते नाते

मतलब का संसार है

पैसों का सब मोल लगाते

धन माया से प्यार है

दूर कहीं छूटा नारायण

कपट का सब व्यापार है

मतलब के सब रिश्ते नाते

मतलब का संसार है

आंख खोलकर देख ले बंदे

अच्छे नहीं यह गोरखधंधे

लालच के क्यों बुनता फंदे

प्रभु नाम में सार है

मतलब के सब रिश्ते नाते

मतलब का संसार है

आना जाना लगा यहां है

मोह माया में ठगा यहां है

ईश्वर ही बस सगा यहां है

बाकी सब कुछ बेकार है

मतलब के सब रिश्ते नाते

मतलब का संसार है

जीवन पर कब किसका दावा

जाने कब आ जाए बुलावा

दुनिया है बस एक छलावा

देह पल भर का शृंगार है

मतलब के सब रिश्ते नाते

मतलब का संसार है। 

000

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor