(राइजिंग भास्कर के ग्रुप एडिटर डीके पुरोहित संवेदनशील कवि भी हैं। उनके गीतों के संग्रह मैं रहूं न रहूं से कुछ गीत यहां प्रस्तुत है। आपकी प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।)
मैं रहूं न रहूं
मैं रहूं न रहूं
मेरे गीत रहेंगे
तेरी जुबां से
मेरी कहानी कहेंगे
चांद ख्वाब है
सितारे बहुत दूर है
आसमां की झोली में
रोशनी भरपूर है
लेकिन यह दीप सदा
अंधेरे से लड़ेंगे
मैं रहूं न रहूं
मेरे गीत रहेंगे
जिंदगी का क्या भरोसा
कब सांस थमे
ऐ दोस्त याद कर लेना
हमारे ना होने पर हमें
शब्दों की सरगम
फिर किस्से कहेंगे
मैं रहूं न रहूं
मेरे गीत रहेंगे
जीवन तो है पहेली
मौत का प्रश्न मौन है
इस धरा पर शाश्वत
अमर रहा कौन है
जो दरिया में मिले
जाने किस धारा बहेंगे
मैं रहूं न रहूं
मेरे गीत रहेंगे
आज प्यार करें जी भर
कल तो बस आस है
जीवन की पनघट पर
भला कब बुझती प्यास है
घड़ा तैरता रहेगा
ये धारे यूं ही बहेंगे
मैं रहूं न रहूं
मेरे गीत रहेंगे।
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सिर्फ ये गम, ये नगमे मेरे हैं
ओ नकाबों में जीने वाले
भगवान खुदा सब तेरे हैं
इस भरी दुनिया में कहने को
सिर्फ ये गम, ये नगमे मेरे हैँ
मुझे न जन्नत की चाह है
न इस धरती से लगाव है
मुझे धूप में जलना है
तुझे भाेगना तेरे हिस्से की छांव है
जब यह माटी तुम्हें बुलाएगी
तुम जाने से घबराओगे
मैं तो मरा हुआ पहले से
ऐ खुदा क्या तुम बुलाओगे
रोशनी के रहबरों सुन लो
हमें प्यारे अंधेरे हैं
ओ नकाबों में जीने वाले
भगवान खुदा सब तेरे हैं
इस भरी दुनिया में कहने को
सिर्फ ये गम, ये नगमे मेरे हैं
ओ कुर्सी को पाने वालों
दौलत पर तुम मरते हो
अपराधों से करके कमाई
सजाओं से फिर डरते हो
मुझे न खोने का डर है
मैं सिर उठाए जीता हूं
तुम सुरा में डूबे रहते
मैं अपने गमों को पीता हूं
सुविधाएं सब तेरे लिए हैं
मेरे आंगन अश्कों के डेरे हैं
ओ नकाबों में जीने वाले
भगवान खुदा सब तेरे हैं
इस भरी दुनिया में कहने को
सिर्फ ये गम, ये नगमे मेरे हैं।
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बिन बंदगी जिंदगी जिए जा रहे
बिन बंदगी जिंदगी जीए जा रहे हैं
कोई आवारा झोंका दगा दे जाएगा
समंदर में उतरना कहां आसान है
पानी का दरिया भगा ले जाएगा
जिधर देखो उधर शैतान का डर है
जहां में महफूज कहां अपना घर है
कश्ती के पीछे पड़ी जालिम लहर है
तिनका भी यहां आग लगा जाएगा
बिन बंदगी जिंदगी जीए जा रहे हैं
कोई आवारा झोंका दगा दे जाएगा
जिसको मनाना है उससे रूठें हैं
ऐ दुनिया तेरे दस्तूर अनूठे हैं
एक सच्चा तो हजार झूठे हैं
अपनों के बीच ठगा जाएगा
बिन बंदगी जिंदगी जीए जा रहे हैं
कोई आवारा झोंका दगा दे जाएगा
किस्मत को कोसो चाहे हजार
उसी का है सुखी संसार
जो कर्म से करता आया है प्यार
बैरन सपना नींद से जगा जाएगा
बिन बंदगी जिंदगी जीए जा रहे हैं
कोई आवारा झोंका दगा दे जाएगा।
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दुनिया जहर पिलाती रही
दुनिया जहर पिलाती रही
हम अमृत लुटाते रहे
कांटों ने दिए लाख जख्म
फूल थे कि मुस्काते रहे
वो आदमी थे जिनका काम
अपनों से दगा करना रहा
हम तो कुछ थे ही नहीं
हमारा क्या जीना-मरना रहा
शून्य तो परिभाषित होता
इससे कम खुद को गिनाते रहे
दुनिया जहर पिलाती रही
हम अमृत लुटाते रहे
खुदा होता जो मैं तो
हर खता की सजा देता
जो होता भगवान तो
मौत का बिगुल बजा देता
शब्दों के रहे जो साधक
खुद को कागज पर गलाते रहे
दुनिया जहर पिलाती रही
हम अमृत लुटाते रहे
सोचता हूं कभी अकेले में
क्यों बनाते हैं इबादत के घर
क्या कमी है परमतत्व को
क्या कमी है उसके दर
मैं मूरख नादां सही
समझदार तर्क बताते रहे
दुनिया जहर पिलाती रही
हम अमृत लुटाते रहे
पत्थरों में पत्थर को पूजते
मीनारों में उसे पुकारा
चर्च-मंदिर-गुरुद्वारों में
क्यों ढूंढ़ते रहे सहारा
दुखियारे मां बाप को
क्यों न गले लगाते रहे
दुनिया जहर पिलाती रही
हम अमृत लुटाते रहे।
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मतलब के सब रिश्ते नाते
मतलब के सब रिश्ते नाते
मतलब का संसार है
पैसों का सब मोल लगाते
धन माया से प्यार है
दूर कहीं छूटा नारायण
कपट का सब व्यापार है
मतलब के सब रिश्ते नाते
मतलब का संसार है
आंख खोलकर देख ले बंदे
अच्छे नहीं यह गोरखधंधे
लालच के क्यों बुनता फंदे
प्रभु नाम में सार है
मतलब के सब रिश्ते नाते
मतलब का संसार है
आना जाना लगा यहां है
मोह माया में ठगा यहां है
ईश्वर ही बस सगा यहां है
बाकी सब कुछ बेकार है
मतलब के सब रिश्ते नाते
मतलब का संसार है
जीवन पर कब किसका दावा
जाने कब आ जाए बुलावा
दुनिया है बस एक छलावा
देह पल भर का शृंगार है
मतलब के सब रिश्ते नाते
मतलब का संसार है।
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