अंतराष्ट्रीय श्रेया क्लब की भव्य ऑनलाइन काव्य गोष्ठी सम्पन्न
राखी पुरोहित. जोधपुर
साहित्य की सुदीर्घ परंपरा में नारी स्वर हमेशा से शक्ति, संवेदना और सृजन का पर्याय रहा है। इसी शृंखला में अंतरराष्ट्रीय श्रेया क्लब द्वारा आयोजित एक ऑनलाइन अंतरराष्ट्रीय काव्य गोष्ठी ने स्त्री स्वर को नई ऊँचाई दी और साहित्यिक अभिव्यक्ति की नई दिशाएँ खोलीं।
इस विशिष्ट आयोजन में भारत सहित विदेशों से 18 प्रतिभाशाली कवयित्रियों ने भाग लिया। इस अवसर पर विविध साहित्यिक विषयों पर स्वरचित कविताएँ प्रस्तुत की गईं — कहीं मातृत्व की ममता छलकी, कहीं नारी शोषण पर प्रहार किया गया, कहीं राष्ट्र के लिए समर्पण की पुकार सुनाई दी, तो कहीं पर्यावरण संरक्षण की चेतना गूँजी।
????️ आयोजन की संरचना और सजीवता
गोष्ठी का सफल संचालन राखी पुरोहित ने किया, जिन्होंने हर कवयित्री की प्रस्तुति को भावपूर्ण भूमिका के साथ जोड़ा, जिससे कार्यक्रम की प्रवाहमयी ऊर्जा बनी रही।
संस्थापक डॉ. अर्चना श्रेया ने अपने स्वागत उद्बोधन में कहा:
“कविता केवल शब्दों की सजावट नहीं, बल्कि संवेदना का आईना है। जब महिलाएँ अपनी चेतना को शब्दों में ढालती हैं, तो वह कविता नहीं, चेतावनी, दर्पण और बदलाव की चिंगारी बन जाती है।”
???? मुख्य अतिथि और अतिथि वक्ताओं की गरिमामयी उपस्थिति
मुख्य अतिथि प्रेमलता रसबिंदु (गोरखपुर) ने इस अवसर पर कहा:
“कविता वह शक्ति है, जो समाज को भीतर से झकझोरती है। आज की स्त्रियाँ सिर्फ लिख नहीं रहीं, वे सामाजिक बदलाव की अग्रदूत बन रही हैं।”
विशेष अतिथि डॉ. प्रतिभा गर्ग (सिंगापुर) ने अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण से विचार साझा करते हुए कहा:
“भाषा की सीमाएँ मिट रही हैं। ऑनलाइन मंचों ने विश्वभर की स्त्रियों को एक साझा साहित्यिक मंच दिया है, जहाँ वे अपने अनुभव साझा कर रहीं हैं।”
आलोचक की भूमिका में डॉ. आनंदीसिंह रावत ने हर कविता की साहित्यिक समीक्षा की, उसके प्रतीक, भाषा-शैली और प्रभाव पर सारगर्भित टिप्पणी करते हुए कहा:
“कविताओं में स्त्रियों की आवाज़ न केवल भावुक थी, बल्कि वैचारिक रूप से परिपक्व और रचनात्मक दृष्टिकोण से समृद्ध थी।” अध्यक्षता चंदा गुप्ता ने की. राखी पुरोहित ने कल तलक थे जो हमारे वो हमारे ना रहे… गीत सुनाया.
???? विषय-विविधता और साहित्यिक स्वरूप
गोष्ठी में प्रस्तुत कविताएँ न केवल भावनात्मक थीं, बल्कि गंभीर सामाजिक सरोकारों को रेखांकित करती रहीं। प्रस्तुत विषयों की झलक:
देशभक्ति पर कविताएँ: मातृभूमि के प्रति आस्था, बलिदान की चेतना और नई पीढ़ी को देशसेवा का संदेश।
माँ पर केंद्रित रचनाएँ: मातृत्व की अनुपम ममता, त्याग और अंतर्मन की गहराइयों को उजागर करतीं पंक्तियाँ।
नारी शोषण: सामाजिक रूढ़ियों, हिंसा, मौन पीड़ा और नारी जागरण की पुकार।
भक्ति रस: राम, कृष्ण, शिव और देवी स्वरूपों को समर्पित भजनों जैसे भाव, जिसमें भक्ति में डूबी भावनाएँ मुखर हुईं।
पर्यावरण चेतना: प्रकृति के विनाश की ओर इशारा करती कविताएँ, साथ ही हरियाली बचाने का आग्रह।
???? सांस्कृतिक संरचना और सहभागिता
सांस्कृतिक प्रभारी तनुजा शुक्ला ने कार्यक्रम के पारंपरिक पक्षों की देखरेख करते हुए सुनिश्चित किया कि कविताओं की प्रस्तुति के दौरान भारतीय सांस्कृतिक तत्व भी उभरें। आयोजन की संयोजक मीता लुनिवाल ने कार्यक्रम के तकनीकी और समयबद्ध संचालन को अत्यंत सुचारु रूप से निभाया।
डॉ. स्वर्णरेखा मिश्रा, शिखा पांडे, डॉ. संजीदा खानम सहित सभी कवयित्रियों ने अपने विशिष्ट स्वर में सामाजिक, भावनात्मक और वैचारिक विषयों पर कविताएँ प्रस्तुत कीं, जिनमें एक ओर भारतीय लोकबिंब उभरे, तो दूसरी ओर आधुनिक यथार्थ के सशक्त चित्र भी रचे गए।
✍️ कुछ झलकियाँ प्रतिभागी कवयित्रियों की कविताओं से
“मैं चुप नहीं रहूँगी अब, हर अन्याय के विरुद्ध बोलूँगी,
तेरे तमाचे नहीं डराएंगे, मैं नारी हूँ, टूटकर भी फिर से डोलूँगी…”
“माँ! तेरे आँचल में बसी गाथा है बलिदानों की,
तेरे आँसू भी प्रार्थना हैं, तेरी मुस्कान संजीवनी…”
“हवा में जहर घुला है, पेड़ रो रहे हैं,
क्या अब भी नहीं जागोगे, जब जंगल भी पूछ रहे हैं…”
???? साहित्यिक मंचों की नई दिशा
अंतरराष्ट्रीय श्रेया क्लब जैसे मंच आज आधुनिक तकनीक के साथ साहित्यिक परंपरा को जोड़ रहे हैं। इस आयोजन ने यह प्रमाणित कर दिया कि साहित्य केवल पन्नों पर सिमटा विषय नहीं, बल्कि डिजिटल मंचों पर सजीव और सशक्त संवाद बन चुका है।
डॉ. अर्चना श्रेया ने समापन वक्तव्य में कहा:
“यह आयोजन केवल एक गोष्ठी नहीं था, यह नारी चेतना, सामाजिक संवाद और साहित्यिक उत्तरदायित्व की त्रिवेणी था। हम इसे हर माह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आगे बढ़ाने का संकल्प लेते हैं।”





