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Saturday, December 6, 2025, 8:36 pm

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तपस्वी रत्न, ज्योतिष सम्राट, उपप्रवर्तक गुरुदेव श्री अमृत मुनि महाराज: एक साधना से भरा जीवन

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गुरुदेव उपप्रवर्तक अमृत मुनि म सा के 64वें जन्मदिन पर विशेष प्रस्तुति

लेखक डॉ वरुण मुनि Dlitt

भारतीय संत परंपरा में ऐसे विरले संत हुए हैं, जिन्होंने अपने जीवन को न केवल आत्म-कल्याण का साधन बनाया, बल्कि समाज के कल्याण और उत्थान के लिए भी अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया। ऐसे ही एक महान विभूति हैं, तपस्वी रत्न, ज्योतिष सम्राट, उपप्रवर्तक गुरुदेव श्री अमृत मुनि जी म सा। उनका जीवन ज्ञान, तपस्या, सेवा और साहित्य साधना का अद्भुत संगम है। आज, उनके 64वें जन्मोत्सव के पावन अवसर पर, हम उनके दिव्य जीवन और उनकी अतुलनीय साधना यात्रा का विस्तृत अवलोकन करते हैं।

जन्म और बाल्यकाल: संस्कारों की नींव

गुरुदेव श्री अमृत मुनि जी महाराज का जन्म राजस्थान की वीर भूमि पाली जिले के सारण गाँव में, संवत 1961 की ज्येष्ठ शुक्ला त्रयोदशी को हुआ था। उनका बचपन का नाम सम्पत था। उनके पिता जुगराज जी गुगलिया धर्मपरायण थे और माता प्यारी बाई (वर्तमान में पुष्पवती जी म सा) ममता की साक्षात् प्रतिमूर्ति थीं। पारिवारिक माहौल अत्यंत धार्मिक और संस्कारों से ओतप्रोत था। बचपन से ही सम्पत के मन में सत्य, अहिंसा और करुणा के बीज बो दिए गए थे। उनकी आँखों में एक विलक्षण तेज था और वाणी में मधुरता, जो हर किसी को अपनी ओर आकर्षित करती थी। माता पुष्पवती का त्याग साधना ने उनके बाल मन पर गहरा प्रभाव डाला। यह धार्मिक पृष्ठभूमि ही उनके भावी संत जीवन की नींव बनी। गाँव की गलियों में खेलते हुए भी उनका मन सदा धर्म की ओर मुड़ा रहता था, जो उनके वैराग्य की ओर प्रथम संकेत था।

दीक्षा और ज्ञानार्जन: एक नया अध्याय

सम्पत के जीवन में निर्णायक मोड़ तब आया जब उन्हें पूज्य गुरुदेव मरुधर केसरी श्री मिश्रीमल जी म सा का सान्निध्य प्राप्त हुआ। गुरु के प्रभाव से उनके भीतर वैराग्य की भावना और प्रबल हुई। सन् 1970 में, सम्पत ने गुरु चरणों में वैराग्य ग्रहण किया और आगम शास्त्रों के गहन अध्ययन में लीन हो गए। पाँच वर्षों तक उन्होंने निरंतर ज्ञान की गंगा में गोते लगाए, जिससे उनकी ज्ञान पिपासा शांत हुई और संयम के पथ पर चलने का उनका संकल्प दृढ़ हुआ।
विक्रम संवत 2032 (सन् 1975) की अक्षय तृतीया को, अजमेर जिले के पड़ांगा गाँव में, सेठ श्री रतन लाल जी प्रेम चंद जी चतर परिवार द्वारा निवेदित करने पर गुरु मिश्रीमल जी ने उन्हें दीक्षा प्रदान की। इसी दिन सम्पत को ‘अमृत मुनि’ का नया नाम मिला, जो उनके जीवन की नई पहचान बन गया। दीक्षा के बाद वे गुरु सुकन मुनि जी के प्रथम पट्ट शिष्य बने और गुरु भक्ति का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया। दीक्षा के उपरांत भी उनकी अध्ययन यात्रा अनवरत जारी रही। उन्होंने षट्दर्शन का गहन मनन किया, ज्योतिष शास्त्र का चिंतन किया और यंत्र-मंत्र का ज्ञान भी प्राप्त किया, जिससे उनके मन पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित हुआ।

तपस्या की महिमा: आत्म-शुद्धि का मार्ग

गुरुदेव श्री अमृत मुनि महाराज ने गुरुदेव से तपस्या की महिमा सीखी और उसे अपने जीवन में अक्षरशः उतारा। उन्होंने नियमों का कठोरता से पालन करते हुए अनेक कठिन तपस्याएँ कीं। उन्होंने दस मासखमण किए, एकादश वर्षीतप किया, और तिरेसठ दिनों तक निराहार रहकर कठोर साधना का व्रत लिया। उनकी तपस्या की अग्नि में उनका शरीर तपा और आत्मा शुद्ध हुई, जिससे उन्हें ज्ञान का प्रकाश प्राप्त हुआ। समाज ने उनकी इस अद्भुत तपस्या को नमन किया और उन्हें श्रमण संघ के द्वितीय आचार्य सम्राट श्री आनंद ऋषि जी म सा ने ‘तपस्वी रत्न’ की उपाधि से अलंकृत किया। उनकी तपस्या न केवल शारीरिक कष्ट का माध्यम थी, बल्कि आत्म-शुद्धि और आंतरिक शांति का भी मार्ग थी।

स्व-साधना और पर-कल्याण: एक प्रेरणादायक जीवन

गुरुदेव का जीवन केवल आत्म-कल्याण तक ही सीमित नहीं रहा। मध्यरात्रि में दो बजे उठकर जप-साधना करने के साथ-साथ, वे समाज सुधार के कार्यों में भी सक्रिय रहे। उन्होंने व्यसन मुक्ति का संदेश फैलाया, स्वाध्याय के महत्व को समझाया, और सामाजिक उन्नयन व जीव दया के लिए लोगों को प्रेरित किया। उनके प्रयासों से अनेक गौशालाएँ निर्मित हुईं, जहाँ असहाय जीवों को आश्रय मिला। उन्होंने विद्यालय खोले, जहाँ ज्ञान का दीपक जलाया गया, और चिकित्सालय बनवाए, जहाँ रोगियों को स्वास्थ्य लाभ मिला। स्थानक निर्माण में भी उन्होंने अपना परम पुरुषार्थ दिया, जिससे धर्म और साधना के केंद्र स्थापित हुए।
वे नित्य नंदीसूत्र और सुखविपाक सूत्र का स्वाध्याय करते हैं, जिससे ज्ञान की गंगा निरंतर प्रवाहित होती रहती है और जन-जन पवित्र होते हैं। उनकी साधना की गहराई अत्यंत अद्भुत और प्रेरणादायक है। वे हर क्षण को उपयोगी बनाते हैं और अपने जीवन को सार्थक दिशा देते हैं। उनकी आँखों में एक दिव्य तेज और वाणी में ओज है, जो हर किसी को उनके व्यक्तित्व से प्रभावित करता है। वे किसी से द्वेष नहीं करते, प्रेम का झरना झरता रहता है, और उनका हृदय करुणा से भरा रहता है। उनकी क्षमाशीलता और विनम्रता की धारा सबको अपनी ओर आकर्षित करती है।

साहित्य सृजन: ज्ञान की कलम

गुरुदेव श्री अमृत मुनि महाराज केवल संत ही नहीं, बल्कि एक महान कवि और साहित्यकार भी हैं। गुरु मरुधर केसरी का आशीर्वाद उन पर रहा है जिससे बाल्यावस्था से ही उनकी कलम चली और उन्होंने कई नीतिपरक पदों की रचना की। उनके अंतर्मन में साहित्य का एक झरना बहता है, जहाँ से ज्ञान और अनुभव को शब्दों में पिरोते हुए अनेक कृतियों का सृजन हुआ।
उन्होंने पचास से अधिक कृतियाँ रची हैं, जो साहित्य कोश में मील के पत्थर मानी जाती हैं। गद्य और पद्य दोनों विधाओं में उनकी कलम चली है। उन्होंने अछूते विषयों पर भी लेखनी चलाई। उनकी साधना में कभी कोई बाधा नहीं आई, और वे सुबह-शाम धर्म साधना के साथ-साथ लेखन कार्य भी जारी रखते हैं। उन्होंने ग्रंथों, आगमों और पुराणों का गहन अध्ययन किया और ‘श्री अमृत जैन रामायण’ को दोहा-छंद में रचा, जो एक ऐतिहासिक सृजन है। इसी प्रकार, उन्होंने ‘जैन महाभारत’ को भी दोहे में छंदबद्ध किया है। उनकी ये कृतियाँ न केवल धार्मिक महत्व रखती हैं, बल्कि साहित्यिक दृष्टि से भी उच्च कोटि की हैं। वे साम्प्रदायिकता के बंधन से सदा ऊपर रहे हैं और सद्भावना के दीप जलाए हैं, यही उनका मूल संदेश है।

गुरुदेव श्री अमृत मुनि महाराज का जीवन एक खुली किताब की तरह है, जिससे हर कोई सहज ही ज्ञान का पाठ सीख सकता है। उनकी साधना, सेवा और समर्पण की ज्योति युगों-युगों तक लोगों को प्रेरित करती रहेगी। वे तपस्वी रत्न, ज्योतिष सम्राट, शासन के ध्रुव तारे, तेजस्वी साधक और मरुधर कुल के नयन सितारे हैं। उनकी वाणी से ज्ञान का अमृत झरता है, जिसे श्रोता उनके सन्मुख बैठकर ग्रहण करते हैं, और उनकी लेखनी से दूर बैठे पाठक भी जागृत होते हैं। वे सिद्धहस्त लेखक, महान जीवन द्रष्टा, मानवता के पुजारी और ज्ञान के सिद्ध पुरुष हैं। साहित्य के सजग कलमकार और ज्योतिष शास्त्र के ज्ञाता होने के साथ-साथ, वे सामाजिक समरसता की जलती हुई मशाल हैं।
आज, उनके 64वें जन्मोत्सव के पावन अवसर पर, हम सभी उनके चरणों में शत-शत नमन, वंदन और अभिनंदन करते हैं। उनकी कृपा सदा हम पर बनी रहे और हम उनके दिखाए गए मार्ग पर चलकर अपने जीवन को सार्थक बना सकें। गुरुदेव श्री अमृत मुनि महाराज का जीवन हम सभी के लिए एक शाश्वत प्रेरणा स्रोत है।

(जैसा कि बोरुंदा के सोहन लाल वैष्णव को राइजिंग भास्कर के लिए बताया)

Rising Bhaskar
Author: Rising Bhaskar


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