अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस 21 जून को लेकर राइजिंग भास्कर में रोज एक आलेख प्रकाशित किया जा रहा है. आज पेश है महर्षि पतंजलि पर आलेख.
राखी पुरोहित. जोधपुर
योग की परंपरा भारतवर्ष में सहस्राब्दियों से चली आ रही है, परंतु इसका शास्त्रीय, वैज्ञानिक और सार्वभौमिक रूप जिसने पूरी मानवता की चेतना को छुआ — वह स्वरूप महर्षि पतंजलि द्वारा प्रदत्त है। उन्होंने योग को केवल एक साधना नहीं, बल्कि मानव चेतना के जागरण का नवबीज बनाकर विश्व में अंकुरित किया। उनकी “योगसूत्र” कृति न केवल भारत बल्कि आज संपूर्ण विश्व में आध्यात्मिक और मानसिक स्वास्थ्य की दिशा में प्रकाशस्तंभ बन चुकी है।
इस आलेख में हम पतंजलि के जीवन, योग दर्शन, वैश्विक प्रभाव और समकालीन समाज में उसकी प्रासंगिकता को विस्तार से समझेंगे।
1. महर्षि पतंजलि: एक संक्षिप्त परिचय
महर्षि पतंजलि वैदिक काल के एक महान ऋषि और दार्शनिक थे। उनके व्यक्तित्व के अनेक आयाम हैं – वे संस्कृत व्याकरण, आयुर्वेद और योग तीनों ही क्षेत्रों में विख्यात माने जाते हैं। परंतु योग दर्शन में उनका योगदान अतुलनीय और कालातीत है।
उनकी प्रमुख कृतियाँ:
- योगसूत्र – योग दर्शन की आधारशिला
- महाभाष्य – संस्कृत व्याकरण पर ग्रंथ
- चरक संहिता पर टीका – आयुर्वेदिक चिकित्सा पर
पतंजलि ने योग को एक अनुशासित, वैज्ञानिक और सार्वभौमिक रूप में प्रतिपादित किया। वे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने योग को दर्शन के रूप में स्थापित किया और इसे मन और चेतना की चिकित्सा पद्धति बनाया।
2. योगसूत्र: विश्व चेतना की चाबी
पतंजलि का ‘योगसूत्र’ केवल 195 सूत्रों में योग के सार को समेटे हुए है। यह ग्रंथ योग को केवल आसन, प्राणायाम या ध्यान तक सीमित नहीं करता, बल्कि मानव जीवन के सम्पूर्ण रूपांतरण का मार्ग बताता है।
योगसूत्र की चार पाद (भाग):
- समाधि पाद – योग की परिभाषा और साधना का आरंभ
- साधन पाद – योग के साधन, अष्टांग योग की व्याख्या
- विभूति पाद – योग की सिद्धियाँ और चेतना का विकास
- कैवल्य पाद – आत्मा की स्वतंत्रता और मोक्ष
इन सूत्रों में पतंजलि ने चेतना को शुद्ध करने, आत्म-साक्षात्कार पाने और मोक्ष की ओर अग्रसर होने का मार्ग स्पष्ट किया।
प्रमुख सूत्र:
“योगः चित्तवृत्ति निरोधः”
(योग वह है जो चित्त की वृत्तियों को नियंत्रित करता है।)
यह सूत्र सीधे चेतना को संबोधित करता है। चित्त यानी मन, बुद्धि और अहं — इनकी वृत्तियों को शांत करके, चेतना को उसके मूल स्रोत से जोड़ने का प्रयास ही योग है।
3. योग को विज्ञान बनाने वाला दृष्टिकोण
जहाँ प्राचीन समय में योग को रहस्यवाद से जोड़कर देखा जाता था, वहीं पतंजलि ने इसे प्रायोगिक, अनुभवसिद्ध और क्रमबद्ध विज्ञान के रूप में स्थापित किया। उन्होंने योग को कारण-परिणाम के सिद्धांत, समीकरण, और मनोविज्ञान के साथ जोड़ा।
योग की वैज्ञानिकता:
- मानसिक शुद्धि के लिए यम-नियम
- शारीरिक स्वास्थ्य के लिए आसन-प्राणायाम
- आंतरिक संतुलन के लिए प्रत्याहार-धारणा
- चेतना विस्तार के लिए ध्यान-समाधि
यह सम्पूर्ण प्रक्रिया एक वैज्ञानिक प्रयोग की भाँति है, जिसमें साधक स्वयं प्रयोगकर्ता और चेतना प्रयोगशाला है।
4. योग का वैश्विक विस्तार: पतंजलि से लेकर आज तक
पतंजलि ने जो बीज बोया, वह सदियों तक भारत में फलता-फूलता रहा। आधुनिक काल में योग गुरु जैसे स्वामी विवेकानंद, परमहंस योगानंद, श्री अरविंद, और स्वामी रामदेव जैसे योगाचार्यों ने इस बीज को विश्व चेतना की भूमि में रोपित किया।
संयुक्त राष्ट्र में योग की स्वीकृति:
- 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस घोषित किया गया (2014)
- 180 से अधिक देशों में योग अभ्यास
- पश्चिमी चिकित्सा पद्धति में योग का सम्मिलन
आज पतंजलि के योगसूत्र से प्रेरित होकर लाखों लोग योग को जीवन शैली बना चुके हैं।
5. पतंजलि का योग और मानव चेतना का नवजागरण
क. मानसिक रोगों से मुक्ति
चिंता, अवसाद, तनाव, भय — ये सभी मानसिक वृत्तियाँ पतंजलि के अनुसार चित्त को दूषित करती हैं। योग उन्हें शुद्ध करता है।
ख. आत्मबोध और मोक्ष
योग चेतना को शरीर और मन के पार ले जाकर आत्मा की अनुभूति कराता है। यह अनुभव ही “कैवल्य” यानी पूर्ण मुक्ति है।
ग. विश्व बंधुत्व की स्थापना
योग हमें सिखाता है कि सबका मूल एक ही है — आत्मा। इस दृष्टि से विश्व में शांति, सहयोग और समरसता की भावना जन्म लेती है।
6. अष्टांग योग: चेतना को पुष्पित करने का मार्ग
महर्षि पतंजलि ने अष्टांग योग के माध्यम से चेतना की यात्रा को क्रमबद्ध किया:
| अंग | अर्थ | चेतना पर प्रभाव |
|---|---|---|
| यम | नैतिक अनुशासन | सामाजिक और मानसिक संतुलन |
| नियम | आत्म-अनुशासन | आंतरिक शुद्धि |
| आसन | शरीर की स्थिति | स्थिरता और ऊर्जा संचय |
| प्राणायाम | श्वास का नियंत्रण | जीवन ऊर्जा का जागरण |
| प्रत्याहार | इंद्रियों का नियंत्रण | ध्यान की तैयारी |
| धारणा | एकाग्रता | मानसिक शक्ति का विकास |
| ध्यान | ध्यानावस्था | अंतःकरण की गहराई में प्रवेश |
| समाधि | पूर्ण तादात्म्य | आत्मा और परमात्मा का मिलन |
यह क्रम मात्र साधना नहीं, बल्कि चेतना के बीज को अंकुरित कर ब्रह्मत्व तक पहुँचाने का मार्ग है।
7. पतंजलि का योगदान: शाश्वत और समकालीन
शाश्वत मूल्य:
- मनुष्य की आंतरिक शांति की खोज
- प्रकृति और आत्मा के बीच संतुलन
- जीवन को अर्थपूर्ण और पूर्ण बनाना
समकालीन प्रभाव:
- शिक्षा में योग का समावेश
- कॉर्पोरेट में ध्यान और माइंडफुलनेस
- चिकित्सा में योग-आधारित थेरेपी
8. पतंजलि और भारत का सांस्कृतिक गौरव
भारत के ऋषियों ने मानव चेतना की जो गहराई में जाकर खोज की, वह पश्चिमी विज्ञान आज धीरे-धीरे समझ रहा है। महर्षि पतंजलि ने उस ज्ञान को व्यवस्थित और संहिताबद्ध किया। इसीलिए योग भारत की “सांस्कृतिक विश्वगाथा” का ऐसा अध्याय है जो पूरी मानवता के लिए उपयोगी है।
9. योग: भारत से विश्व तक चेतना की यात्रा
| चरण | स्थान | योग का स्वरूप |
|---|---|---|
| प्राचीन युग | भारत | साधना, तप, समाधि के रूप में योग |
| मध्ययुगीन युग | तिब्बत, चीन | ध्यान और तंत्र योग |
| औपनिवेशिक युग | पश्चिमी देश | रहस्यवाद, योग-शिविर, स्वास्थ लाभ |
| आधुनिक युग | संपूर्ण विश्व | वैज्ञानिक, शैक्षणिक और स्वास्थ्यदायी योग |
10. निष्कर्ष: पतंजलि का योग — चेतना का क्रांति सूत्र
महर्षि पतंजलि ने योग को एक व्यक्तिगत साधना से ऊपर उठाकर वैश्विक चेतना का नवबीज बनाया। इस बीज को उन्होंने विज्ञान, दर्शन, अनुशासन और आत्मबोध के जल से सींचा। आज यह बीज एक ऐसा वटवृक्ष बन चुका है जिसकी छाया में मानवता तनाव से मुक्ति, शांति की खोज, आत्मा की यात्रा और विश्वबंधुत्व के स्वप्न देख रही है।
उनका योग केवल शरीर की लचकता नहीं, चेतना की स्थिरता है। वह केवल आसन नहीं, आत्मा के अनुभव की प्रक्रिया है। पतंजलि का योग — एक व्यक्तिगत अभ्यास नहीं, बल्कि मानव सभ्यता के उत्थान की सार्वभौमिक चाबी है।
???? बॉक्स: महर्षि पतंजलि के 5 प्रेरक सूत्र
- योगः चित्तवृत्ति निरोधः – योग मन की वृत्तियों को रोकने का नाम है।
- अभ्यास वैराग्याभ्यां तन्निरोधः – अभ्यास और वैराग्य से चित्त शांत होता है।
- सत्कर्य सिद्धिः क्रियायोगेन – सत्कर्मों से सिद्धि की प्राप्ति होती है।
- स्वाध्यायात् इष्टदेवतासंप्रयोगः – स्वाध्याय से ईश्वर से संपर्क होता है।
- ध्यान हेयास्तद्वृत्तयः – ध्यान से मन की सभी बाधाएँ दूर की जाती हैं।




